The Odyssey Review: क्रिस्टोफर नोलन का मास्टरपीस, साल का सबसे शानदार सिनेमैटिक अनुभव होगा साबित

हॉलीवुड के दिग्गज डायरेक्टर क्रिस्टोफर नोलन की फिल्म 'द ओडिसी' थिएटर्स में रिलीज हो चुकी है और इसे देखकर सिर्फ एक ही बात जेहन में आती है— 'दिस इज़ सिनेमा'. 2 घंटे 55 मिनट की ये फिल्म कमाल के विजुअल्स, शानदार बैकग्राउंड स्कोर और दमदार परफॉर्मेंस से आपको वो एक्सपीरियंस देगी जिसके लिए बड़ा पर्दा बना है.

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'द ओडिसी' रिव्यू (Photo: ITGD) 'द ओडिसी' रिव्यू (Photo: ITGD)

सुबोध मिश्रा

  • नई दिल्ली ,
  • 17 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 11:54 AM IST
फिल्म:द ओडिसी
4.5/5
  • कलाकार : मैट डेमन, एन हैथवे, टॉम हॉलैंड, जेंडाया, जॉन बर्नथल, हिमेश पटेल, चार्लीज थेरॉन
  • निर्देशक :क्रिस्टोफर नोलन

होमर नाम का कोई असल शख्स कभी हुआ या नहीं, इस पर विवाद है. होमर ने वो शानदार महागाथा ओडिसी लिखी या नहीं, किसी ने नहीं देखा. लेकिन क्रिस्टोफर नोलन की द ओडिसी आपकी आंखों के सामने है. हमने द ओडिसी देखी, आंखें जितनी खुल सकती थीं, उतनी खोलकर देखी और जैसा मार्टिन स्कॉरसीसी का वो पॉपुलर मीम कहता है― ‘दिस इज़ सिनेमा’!

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एक योद्धा नहीं, एक युद्ध की कहानी

प्राचीन ग्रीस की सबसे बड़ी माइथोलॉजिकल कहानियों में से एक ओडिसी की तुलना अक्सर भारत के महाकाव्य महाभारत से होती है. मुझे इसके बारे में थोड़ी सी जानकारी थी, पढ़ाई के कारण. लेकिन इसपर बेस्ड द ओडिसी के एक्सपीरियंस में खलल न पड़े इसलिए मैंने टीजर-ट्रेलर्स से दूरी बनाए रखी और ये कहा जा सकता है कि बड़ी-स्क्रीन पर इसका रिवॉर्ड मिला.

द ओडिसी में नोलन ने लेजेंड्री ट्रोजन वॉर के बाद ग्रीस के सबसे शानदार योद्धा ओडिसियस (मैट डेमन) की घर वापसी की कहानी दिखाई है. एक महाकाव्य को परफेक्टली सूट करने वाले विजुअल्स, उन विजुअल्स को एक अद्भुत संसार में बदलने वाला म्यूजिक और किरदारों की कन्वर्सेशन को फिलॉसॉफी में बदलने वाले डायलॉग— नोलन वो जादू बुनने में कामयाब हुए हैं जो आपको 2 घंटे 55 मिनट सीट से बांधे रखता है.

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कहानी सिर्फ ओडिसियस की नहीं है, उसकी पत्नी पेनेलोपी (एन हैथवे) की है जो एक दशक से अपने पति का इंतजार कर रही है, जबकि उसके महल में रोजाना उससे शादी करने की आस में मर्दों की भीड़ जुटी रहती है. कहानी ओडिसियस के बेटे टेलेमेकस (टॉम हॉलैंड) की है, जो खुद को काबिल युवराज साबित करने के संघर्ष में जुटा है, लेकिन उस टीनेजर लड़के को अपने महावीर पिता के पैमाने पर खरा उतरना है, जिसके जिंदा होने की भी अब कोई आस नहीं है.

क्या ओडिसियस वापस लौट पाएगा? और लौटेगा तो क्या वो वही ओडिसियस रहेगा जो एक असंभव लगने वाली जीत के लिए युद्ध लड़ने निकला था? क्या लौटने पर उसे उसका राज्य इथाका वैसा ही मिलेगा जैसा था? क्या ये एक योद्धा की 'होम कमिंग' होगी या युद्ध की आग बुझने के बाद उसकी राख ढो रहे एक इंसान की?

इन सबसे बढ़कर नोलन की द ओडिसी उन सैकड़ों बहादुर लड़ाकों की कहानी है जो ओडिसियस के साथ ट्रोजन वॉर में थे. उनमें से कुछ ओडिसियस के साथ घर लौटने के मिशन पर भी चले थे. क्या वो भी ओडिसियस के साथ लौट पाएंगे?

असली बिग-स्क्रीन मैजिक

ओडिसी जैसे महाकाव्य को एक फिल्म में देखने की बात से अधिकतर दर्शकों को यही चिंता थी कि क्या नोलन इस सागर को गागर में भर पाएंगे? लेकिन सबसे पहले उनकी इस क्रिएटिव चॉइस के लिए तारीफ बनती है कि उन्होंने ट्रोजन वॉर को अपना फोकस पॉइंट नहीं बनाया. इसलिए जिन्हें द ओडिसी में नोलन के स्टाइल में ये वॉर देखने की उम्मीद है, उन्हें थोड़ी निराशा होगी. मगर नोलन का फोकस ओडिसियस के घर लौटने की जर्नी और रास्ते भर में उसे मिले अनुभवों की कहानी है.

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ये अनुभव एक नया चश्मा बनते हैं जिससे ओडिसियस जीवन और जिंदा इंसानों में इंसानियत की परख करता नजर आता है. रास्ते में उसकी टुकड़ी का सामना एक राक्षस से विशाल मानवों से, एक मायावी जादूगरनी और भयानक समंदर से होता है. जिंदा रहते ही किसी माइथोलॉजिकल योद्धा का दर्जा पा चुके ओडिसियस के ये एक्सपीरियंस एक शानदार सिनेमैटिक संसार रचते हैं.

द ओडिसी का स्क्रीनप्ले शुरुआत में नैरेटिव बुनने के लिए थोड़ा वक्त लेता है, लेकिन नोलन इस बात को लेकर पूरी तरह सतर्क लगते हैं कि फिल्म ड्रैग न करने लगे. इसलिए कैरेक्टर्स और कहानी की परतें खोलते ठहराव भरे सीन्स के साथ ही एड्रेनलिन बढ़ाने वाला कोई सीन भी मिलता है.

प्यार, पॉलिटिक्स, पावर, प्रकृति, और पुरुषों की वीरता पर फिल्म के डायलॉग कोट्स जैसे लगते हैं. ट्रोजन वॉर कहानी में पूरी तरह नहीं है, लेकिन उतना है जो ओडिसियस की कहानी के लिए जरूरी है. वॉर के उतने हिस्से में, होमकमिंग के एडवेंचर में ओडिसियस की बहादुरी और उसकी कैरेक्टर स्टडी में फिल्म नहीं चूकती.

होयटे वान होयटेमा की सिनेमैटोग्राफी किसी टाइम मशीन जैसी है और आपको जैसे उस वक्त में ले जाकर खड़ा कर देती है जहां ये सब घट रहा है. लडविग योरानसोन का म्यूजिक हाथ पकड़ कर आपको सीन्स के मूड में खींच लेता है. इफेक्ट्स और प्रोडक्शन डिजाइन द ओडिसी की माइथोलॉजिकल साइड को ग्रैंड एक्सपीरियंस बनाने वाले हैं.

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मैट डेमन की परफॉर्मेंस ओडिसियस को वो किरदार बना देती है जो आपकी सहानुभूति, खेद और सम्मान पूरी तरह डिजर्व करता है. हेलेन ऑफ ट्रॉय के रोल में लुपिता न्योङ्गो की कास्टिंग की काफी आलोचना हुई थी, उनके रंग को लेकर. वो डिबेट्स साहित्य वालों के लिए छोड़कर, उनकी परफॉर्मेंस देखने लायक है.

ग्रीक देवी एथेना के रोल में जेंडाया को क्यों कास्ट किया गया है, ये भी सवाल था, लेकिन ये जवाब फिल्म में ही देखने लायक है. ट्रोजन वॉर को लीड करने वाले आगामेमनन के भाई, स्पार्टा के राजा मेलेनोस के रोल में जॉन बर्नथल एक बार फिर दमदार काम से इंप्रेस करते हैं. हिमेश पटेल की आंखें उनकी परफॉर्मेंस को अद्भुत बनाती हैं. कैलिप्सो के रोल में चार्लीज थेरॉन को देखकर सांसें थम सकती हैं!

कास्ट की परफॉर्मेंस हो, या फिल्ममेकिंग की टेक्निकल मजबूती और राइटिंग का जादू... द ओडिसी साल के सबसे शानदार सिनेमैटिक अनुभवों में से एक साबित होगी. द ओडिसी की एक बड़ी आलोचना लैंग्वेज को लेकर हो रही थी कि फिल्म में कहानी के दौर के हिसाब की नहीं, बल्कि आज जैसी साउंड करने वाली इंग्लिश ज्यादा है. शुरुआत में ये बात थोड़ी सी तो खटकती है, मगर फिर नोलन साहब के जादू का असर इतना तगड़ा हो जाता है कि आप बाकी सारी बातें साइड रख देते हैं.

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एक अच्छी बात ये भी है कि फिल्म देखने के लिए ओडिसी-होमर-ग्रीक माइथोलॉजी की गूढ़ समझ की जरूरत नहीं है. ऊपर से इस बार नोलन ने ऐसी पहेलियां भी नहीं बुझाई हैं कि कोई दर्शक खुद को उनकी फिल्म देखने के लिए 'एलिजिबल' न समझे!

द ओडिसी फील करके देखने वाली फिल्म है और ये आपकी नजर पूरी तरह डिजर्व करती है. अगर किसी को फिल्म में कुछ कमी भी दिखेगी, तो भी इसका एक्सपीरियंस वो यकीनन याद रखेगा. तो किसी और की राय से बेहतर है पहली फुर्सत में अपने पास की सबसे बड़ी और बेस्ट स्क्रीन पर द ओडिसी देख डालिए.

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