समझ नहीं आ रहा कि मुझे ज्यादा अचंभा किस बात पर हुआ― जसवंत सिंह खालड़ा और पंजाब पुलिस के फेक एनकाउंटर्स की कहानी पर? या इस बात पर कि इन कहानियों पर बनी फिल्म कई सालों से थिएटर्स में आने की जंग लड़ते-लड़ते आखिरकार एक दिन नए नाम के साथ अचानक ओटीटी पर आ गई!
दोनों बातों में अपनी तरह की हताशा और उम्मीद है. और डायरेक्टर हनी त्रेहान की ‘सतलुज’ ऐसी ही हताश करने वाली, शॉक करने वाली और थोड़ी सी उम्मीद देने वाली फिल्म है. पर इन सबसे ज्यादा ये पंजाब की भोगी सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक के बीच, इंसानों के राक्षस बन जाने की कहानी है. ‘सतलुज’ उन कहानियों में से एक है जो विश्वास दिलाती हैं कि राक्षस कोई मिथकीय किरदार नहीं हैं― इंसान जब अपने हित को पूरा करने के लिए अपने अंदर की इंसानियत को मार डालता है तो वही राक्षस हो जाता है!
यहां देखें 'सतलुज' का ट्रेलर
दूसरी तरफ, आपको कहानी में गायब होते लोगों के परेशान परिवार दिखते हैं. ऐसा ही एक परिवार अपने बेटे को खोजने पर खर्चने के लिए बैंक से भारी लोन लेता नजर आता है. बैंक के ऑफिसर जसवंत सिंह (दिलजीत दोसांझ) ने बड़ी मजबूरी देखते हुए लोन अप्रूव कर दिया है. यानी जसवंत अभी तक हालात को देख तो रहा है, लेकिन समझ नहीं रहा.
जसवंत के एक दोस्त को पुलिस ने उग्रवादी बताकर मार दिया था. मानसिक संतुलन खो चुकी उसकी मां भी अब गायब है. उसे खोजने चले जसवंत को अब हालात की असली समझ आनी शुरू होती है. ऐसे गुमशुदा लोगों की आखिरी खबर अब पुलिस की थानों में नहीं मिलती, अस्पतालों में भी नहीं, वहां के शव गृहों में भी नहीं. खबर मिलती है श्मशानों में, जहां पुलिस ने ‘लावारिस’ बताकर उनकी लाशें जला दी हैं. श्मशानों की भी मजबूरी है कि उन्हें लकड़ियां मरने वालों के नाम बताकर मिलती हैं, इसलिए उनके रिकॉर्ड मेंटेन करने जरूरी हैं.
श्मशान में जसवंत ऐसे ‘लावारिस’ शवों की गिनती देखकर चौंक जाता है. उनमें से कई ऐसे हैं जिनके घरवाले उन्हें ‘लापता’ जानकर खोजने में लगे हैं. पंजाब पुलिस में ‘आतंकवादी’ मारने के बदले प्रमोशन के इस खेल को सामने लाना जसवंत का मकसद है. तीन जिले की श्मशानों में ही उसे 2000 से ज्यादा ऐसे ‘लावारिस’ नाम मिले हैं जिनके अंतिम संस्कार गुपचुप तरीके से कर दिए गए.
इस खेल का खुलासा करने चला जसवंत, ह्यूमन-राइट्स की एक लंबी जंग शुरू करता है लेकिन एक दिन खुद गायब हो जाता है. उनकी पत्नी परमजीत (गीतिका विद्या ओहल्यान) ने उनके इस मिशन का मोर्चा तो संभाल लिया है, मगर क्या उनका पति लौटेगा? पंजाब पुलिस ने अपने सबसे खूंखार ऑफिसर एस पी सुग्गा (सुविंदर विक्की) को जसवंत को रोकने के काम पर लगाया था.
जसवंत को खोजने और पूरे मामले की तह तक जाने के लिए दिल्ली ने सीबीआई टीम भेजी है, जिसे ऑफिसर समुद्र सिंह (अर्जुन रामपाल) लीड कर रहे हैं. क्या जसवंत मिलेगा? क्या पंजाब पुलिस की दरिंदगी सामने आएगी? क्या उन परिवारों को न्याय मिलेगा जो आज भी अपने लड़कों को खोज रहे हैं, मगर उनके नाम किसी श्मशान के रजिस्टर में लिखे हैं और वो भी ‘लावारिस’ बताकर.
झिंझोड़ कर रख देगी ‘सतलुज’
‘सतलुज’ की मेन कहानी तो अपनी जगह भयानक है ही, लेकिन डायरेक्टर हनी त्रेहान आपको एक ऐसी जगह खड़ा कर देते हैं जो चिराग तले अंधेरे की कहानी है. उग्रवाद को रोकने, जवाब देने में पुलिस ऑफिसर कैसे जल्लाद बन गए ये कहानी देखने में भयानक लगती है. वो जो कुछ कर रहे हैं उसे लेकर उनमें रत्ती भर कोई दया भाव या अपराध बोध नहीं है. ‘लोकतंत्र के रखवाले’ होने का नशा उन्हें कबका राक्षस बना चुका है इसका उन्हें कोई एहसास भी नहीं है. उस दौर में पुलिस जो कर रही है वो उनका मिशन नहीं, पैशन बन चुका है. ‘सतलुज’ इसी को सबसे भयानक तरीके से दिखाती है.
‘सतलुज’ की खासियत है कि ये केवल ‘रियल घटनाओं पर आधारित फ़िल्म’ नहीं है, बेहतरीन थ्रिलर भी है. फर्स्ट हाफ में लापता लोगों की सच्चाई खोजते जसवंत, और सेकंड हाफ में जसवंत को खोजते समुद्र सिंह की कहानियां बहुत ग्रिपिंग सस्पेंस थ्रिलर हैं. मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या और पंजाब से जुड़ी रियल घटनाओं को ‘सतलुज’ ने जितनी सच्चाई के साथ रखा है, उससे पता लगता है कि सेंसर बोर्ड क्यों 4 सालों से इसे सर्टिफिकेट नहीं दे रहा था.
कनाडा और विदेशों में पंजाब पुलिस की बर्बरता का चिट्ठा खोलने जसवंत को ‘एंटी नेशनल’ कहना, इंसानियत की भावना से उपजे उसके मिशन को ‘पंजाब को बदनाम करने की साजिश’ बताना, अपने खिलाफ उठ रही आवाजों को दबाने के लिए लगाए जा रहे हथकंडे और बाहर से आई सीबीआई की मुश्किलें बढ़ा रही पंजाब पुलिस का दुस्साहस देखकर आप शॉक रह जाएंगे कि― पुलिसवालों को मिली बेलगाम ताकत क्या कर सकती है. ये बातें 30 साल पुरानी इस कहानी को आज के लिए भी रेलिवेन्ट बनाती हैं.
दिलजीत दोसांझ के शानदार एक्टिंग टैलेंट से शायद ही कोई अनजान हो, मगर ‘सतलुज’ में उनकी परफॉर्मेंस आपको इमोशनली झिंझोड़ देगी. एक भी चीज अपने पक्ष में न होने के बावजूद लड़ने का साहस दिखाते जसवंत के रोल में उन्होंने अपने करियर की बेस्ट परफॉर्मेंस दी है. उनकी संजीदगी, ठहराव, एक्सप्रेशंस में सहजता बरतने के हुनर ने ‘सतलुज’ को बहुत दमदार बना दिया है. कुलजीत नाम के कैरेक्टर के साथ उनका एक सीन आपको हॉन्ट करता रहेगा. पुलिस कैद के सीन्स दिलजीत के हुनर की मिसाल हैं.
‘धुरंधर’ में बाप बेटे के रोल में दिख चुके सुविंदर विक्की और अर्जुन रामपाल ने भी अपने सीन्स को बहुत दमदार बना दिया है. करीब 5 साल पहले बनी है ये फ़िल्म अगर वक्त पर आ गई होती तो इन दोनों के हिस्से न जाने और कितना दमदार काम होता. इनके टकराव वाले सीन्स में फ़िल्म बहुत इंटेंस है. जसवंत की पत्नी के रोल में गीतिका ने एक बार फिर दिखाया है कि क्यों उन्हें और ज़्यादा काम मिलना चाहिए. सुविंदर के साथ उनके बात करने का सीन आपके रोंगटे खड़े कर देगा.
‘सतलुज’ टेक्निकली भी ब्रिलियंट फ़िल्म है. इसकी सिनेमेटोग्राफी आपको वो पंजाब दिखाती है जो आपको बहुत कम दिखता है. लाइटिंग, साउंड, बैकग्राउंड स्कोर और मेकअप तक सबकुछ कहानी के नैरेटिव, टोन और मूड को दिमाग पर मंडराते रहने वाला एक्सपीरियंस बना देता है. जसवंत की लड़ाई और पंजाब पुलिस के इस कांड की कहानी जब मैंने जीवन में पहली बार पढ़ी थी तभी ये हफ्तों तक दिलोदिमाग को तंग करती रही थी― आखिर कोई इंसान इतना दरिंदा कैसे बन सकता है कि उसे दूसरे इंसान पर एक जानवर जितना भी तरस न आए? आखिर एक इंसान में वो जुनून और साहस कैसे जन्म लेता होगा जो ऐसी दरिंदगी के बीच भी सच के लिए सिर उठा देता होगा?
ये दिलचस्प है कि हाल ही में दिलजीत की ‘मैं वापस आऊंगा’ ने पंजाब का एक ऐसा दर्द उकेरा था जिसे कई बार बाकी भारत के लोग नहीं समझ पाते. इस बार दिलजीत पंजाब के उस दर्द का चेहरा बने हैं जिसकी लोगों को खबर भी नहीं है. डायरेक्टर हनी त्रेहान इस फिल्म के लिए खूब तारीफों और प्रेम के हकदार हैं. जी5 ऐसा ओटीटी प्लेटफॉर्म है जिसका सब्सक्रिप्शन लोगों के पास बाकी प्लेटफॉर्म्स से कम मिलता है, लेकिन ‘सतलुज’ के लिए अगर आप महीने भर वाला प्लान भी लेंगे तो यकीन मानिए आपको पैसों की पूरी वैल्यू मिलेगी.
सुबोध मिश्रा