ये सीक्वल है या स्कीम... सोने के अंडे की तलाश में अपनी मुर्गियों के पेट फाड़ता बॉलीवुड

बॉलीवुड की एक दिक्कत है... एक फिल्म कामयाब होते ही, उसके फॉर्मुले को निचोड़ कर हिट्स बटोरने की कोशिशें शुरू हो जाती हैं. यूनिवर्स, फ्रैंचाइजी और सीक्वल फिल्में इसी की देन हैं.मगर अब ऑडियंस इससे ऊबने लगी है. इसका सबूत भी इस साल खूब मिला है.

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सीक्वल और यूनिवर्स की भूलभुलैया में राह से भटका बॉलीवुड (Photo: ITGD) सीक्वल और यूनिवर्स की भूलभुलैया में राह से भटका बॉलीवुड (Photo: ITGD)

सुबोध मिश्रा

  • नई दिल्ली ,
  • 28 नवंबर 2025,
  • अपडेटेड 8:30 AM IST

वो नेटवर्क मार्केटिंग वाली स्कीमें याद हैं ना आपको? एक वक्त था जब हर आदमी आपको ऐसी किसी चेन में जोड़ देना चाहता था. एक प्रोडक्ट खरीदो, चेन में जुड़ो. फिर किसी को वो प्रोडक्ट चिपकाओ और खुद भी 5-10 पर्सेंट कमाओ. बॉलीवुड आजकल नेटवर्क मार्केटिंग स्टाइल का अपना एक वर्जन बना चुका है. एकदम गाजियाबाद स्टाइल में... यूनिवर्स ही यूनिवर्स, फ्रैंचाइजी ही फ्रैंचाइजी, सीक्वल ही सीक्वल. 

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मेकर्स पक्का करना चाहते हैं कि बिजनेस लगातार बना रहे. इस चक्कर में हर उस फिल्म से एक यूनिवर्स-एक फ्रैंचाइजी निचोड़ लेना चाहते हैं जो इतिहास में कभी भी हिट रही हो. डर का माहौल है— कहीं किसी दिन 'आलम आरा' का सीक्वल ना अनाउंस हो जाए. कहीं देश की पहली फीचर फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' का सिनेमेटिक यूनिवर्स ना बनने लगे. मगर राजेश खन्ना ने कभी एक फिल्म में गाया था 'ये पब्लिक है, ये सब जानती है.' और पब्लिक अब मेकर्स की ये 'स्कीम' समझने लगी है. 2025 इस मामले में बॉलीवुड के लिए आंखें खोल देने वाला साल है. सवाल ये है कि क्या इंडस्ट्री आंखें खोलकर सच देखना चाहती है?

80 साल पहले आ चुका था सीक्वल का आईडिया
बॉलीवुड में सीक्वल फिल्मों का आईडिया करीब 80 साल पुराना है. मगर ये आईडिया, प्रॉफिट के लिए फिल्ममेकर्स की डेस्पिरेशन से निकला हुआ ही है. 1935 में फियरलेस नाडिया की फिल्म 'हंटरवाली' तगड़ी ब्लॉकबस्टर थी. वाडिया मूवीटोन प्रोडक्शन बैनर चलाने वाले वाडिया ब्रदर्स के लिए उस वक्त ये सबसे बड़ी हिट थी. 40s के दशक की शुरुआत में, वाडिया मूवीटोन का ग्राफ नीचे जाने लगा. वाडिया ब्रदर्स के होमी वाडिया (जो नाडिया के पति भी थे) ने प्रोडक्शन हाउस को संभालने के लिए एक लास्ट आईडिया लगाया. 

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उन्होंने 'हंटरवाली' का सीक्वल बनाया 'हंटरवाली की बेटी'. और इस तरह हिंदी फिल्मों में सीक्वल के आईडिया की एंट्री हुई. नाडिया खुद एक्शन और स्टंट्स के मामले में एक ब्रांड थीं और 'हंटरवाली' उनकी आइकॉनिक फिल्म थी. होमी वाडिया को लगा होगा कि जब वो सीक्वल बनाएंगे तो ये सब फैक्टर काम करेंगे. ये फैक्टर्स कुछ हद तक चले भी. 'हंटरवाली की बेटी' को भी दर्शक मिले. मगर ये उतनी बड़ी हिट नहीं थी, जितनी पहली फिल्म थी. 

इसी तरह 90s के अंत में पर्दे पर धुंधले पड़ रहे देव आनंद ने भी एक कोशिश की. उन्होंने 1996 में अपनी आइकॉनिक हिट 'ज्वेल थीफ' (1967) का सीक्वल बनाया था. पहली फिल्म के ऑलमोस्ट 30 साल बाद. ये फिल्म, 'द रिटर्न ऑफ ज्वेल थीफ' 
बुरी तरह फ्लॉप साबित हुई थी. मगर 2000s की शुरुआत ने सीक्वल को एक ट्रेंड बना दिया. 'स्टाइल' और 'एक्सक्यूज मी', 'कोई मिल गया' के सीक्वल, फरहान अख्तर की 'डॉन', 'धूम' और 'हेराफेरी' जैसी फिल्में फ्रैंचाइजी मॉडल की बड़ी कामयाबी थीं. तबतक चीजें इसलिए ठीक थीं कि मेकर्स अपने लीडिंग किरदारों या थीम को कनेक्ट करने पर ध्यान दे रहे थे.

बात बिगड़नी तब शुरू हुई जब कहानियों को जबरदस्ती फ्रैंचाइजी में ढालने की कोशिश होने लगी. दिल में उतरने वाली ऑरिजिनल कहानियों को भी घुमा-फिराकर एक 'यूनिवर्स' या 'स्पिरिचुअल सीक्वल' में फंसाना, दर्शकों को खटकने लगा. अब ये आईडिया सेचुरेशन पर है. जनता फिल्म की अनाउंसमेंट से ही समझ जाती है कि ये उन्हें थिएटर्स तक जबरदस्ती खींचने की एक 'स्कीम' है. पिछली कहानी का विस्तार नहीं. इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण यश राज फिल्म्स का स्पाई यूनिवर्स है. 

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यूनिवर्स का उबाऊपन 
सलमान खान की 'एक था टाइगर' से स्पाई यूनिवर्स की शुरुआत मानी जाती है. पर 'एक था टाइगर' और इसके सीक्वल 'टाइगर जिंदा है' तक, इस 'यूनिवर्स' वाले आईडिया ने शक्ल नहीं ली थी. सलमान की ये दोनों फिल्में तगड़ी ब्लॉकबस्टर थीं. ऋतिक रोशन और टाइगर श्रॉफ के धमाकेदार एक्शन वाली 'वॉर' (2019) भी जब आई थी, तो ऑरिजिनल स्टोरी वाला सॉलिड प्रोडक्ट थी. 2023 में शाहरुख खान की 'पठान' से यश राज ने इन फिल्मों को यूनिवर्स की शक्ल दी. और अपनी पिछली स्पाई फिल्मों को भी इस यूनिवर्स में लिंक करना शुरू कर दिया.

दो साल बाद, हाल ये है कि सलमान खान की 'टाइगर 3', पिछली दो 'टाइगर' फिल्मों से बहुत कमजोर बहुत कमजोर निकली. बॉक्स ऑफिस पर भी और कंटेंट के मामले में भी. रिव्यूज और जनता की राय बताती है कि कंटेंट ने ही निराश किया, इसलिए बॉक्स ऑफिस कलेक्शन भी गोते खा गया. यही हाल इस साल 'वॉर 2' का भी हुआ. एक समय अनुमान लगाया जा रहा था कि ये साल की सबसे बड़ी बॉलीवुड फिल्म होगी. 

मगर 'वॉर 2', पहली फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाने से ज्यादा, एक्सेल शीट पर बिजनेस प्रॉफिट के लिए तैयार किया गया प्रोजेक्ट लग रही थी... एक पैन इंडिया ब्लॉकबस्टर वाला प्रोजेक्ट! बॉलीवुड से एक सुपरस्टार ऋतिक रोशन तो हैं ही. साउथ से एक बड़ा नाम भी होना चाहिए— जूनियर एनटीआर आ गए. पहली फिल्म में ऋतिक-टाइगर वाले गाने की तरह, इस बार ऋतिक-एनटीआर का गाना आ गया. पिछली फिल्म में ऋतिक-टाइगर के गुरु-चेला एंगल की तरह, इस बार भी दोनों हीरोज का गुरु-चेला मोमेंट आ गया. 'दोस्त बने दुश्मन' एंगल पहली फिल्म की तरह इस बार भी दोहरा दिया गया. 

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ये प्लानिंग इतनी स्पष्ट थी कि टीजर-ट्रेलर में ही जनता ने इसे पकड़ लिया. 'वॉर 2' स्पाई यूनिवर्स के खाते में सबसे कमजोर कलेक्शन वाली फिल्म बनकर दर्ज हो गई. 'वॉर' और 'एक था टाइगर' अगर अपनी-अपनी जगह, अपनी कहानियों के साथ ईमानदारी बरतते हुए आगे बढ़तीं, तो ये शायद 'यूनिवर्स' वाले दौर से ज्यादा कमातीं. और दर्शकों का प्यार भी बना रहता. मगर जो हुआ वो बिल्कुल सोने के अंडे देने वाली मुर्गी की कहानी जैसा है. मेकर्स ने अपनी सबसे प्रोडक्टिव मुर्गी का ही पेट चीर दिया. सोने के अंडे की आस में!

बॉक्स ऑफिस पर तगड़ी कमाई कर चुके हॉरर-यूनिवर्स की लेटेस्ट फिल्म 'थामा' के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. इंटरवल तक माहौल जमा चुकी कहानी को सेकंड हाफ में 'यूनिवर्स' से जोड़ने में कहानी इतनी घुमानी पड़ी कि बना-बनाया मजा डिस्टर्ब हो गया. आयुष्मान खुराना और रश्मिका मंदाना जैसे बड़े नामों के बावजूद 'थामा' ने, इसी यूनिवर्स की 7 साल पुरानी पहली फिल्म 'स्त्री' से थोड़ा ही ज्यादा कलेक्शन किया. 

यूनिवर्स वाली फिल्मों में रोहित शेट्टी का कॉप यूनिवर्स पिछले साल आई 'सिंघम अगेन' से ही स्ट्रगल करता दिखने लगा था. बॉक्स ऑफिस पर इन फिल्म यूनिवर्स का हाल इस बात का भी सबूत है कि जनता एक ही तरह की कहानियों में फंसा महसूस करने लगी है. और मेकर्स इस बात को समझने की कोशिश भी नहीं कर रहे. यही हाल सीक्वल फिल्मों का भी हो रहा है. 

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सीक्वल फिल्मों की बाढ़
2025 में एक दर्जन से ज्यादा सीक्वल आ चुके हैं. मगर इन्हें मिल रहा रिस्पॉन्स साफ दिखाता है कि सीक्वल बनाने की बेचैनी में मेकर्स अब जबरदस्ती फिल्में बना रहे हैं. हाल ही में बॉलीवुड की एकमात्र एडल्ट कॉमेडी फ्रैंचाइजी 'मस्ती 4' का बॉक्स ऑफिस पर बुरा हश्र हुआ है. अजय देवगन ने इस साल 4 फिल्में की हैं, जिनमें से 3 उनकी पिछली फिल्मों के सीक्वल हैं. उनकी लेटेस्ट रिलीज 'दे दे प्यार 2' बॉक्स ऑफिस पर 'एवरेज' कहलाने के लिए स्ट्रगल कर रही है. 'सन ऑफ सरदार 2' फ्लॉप हो चुकी है. 'रेड 2' अकेली हिट है मगर इसे पहली फिल्म जैसा पॉजिटिव रिस्पॉन्स नहीं मिला. 

अक्षय कुमार ने भी इस साल 3 सीक्वल्स के साथ कुल 4 फिल्में की हैं. उनकी एकमात्र ऑरिजिनल फिल्म 'स्काईफोर्स' को ट्रेड में फ्लॉप माना जाता है. बाकी तीन फिल्मों 'जॉली एलएलबी 3', 'हाउसफुल 5' और 'केसरी चैप्टर 2' ने अपनी पिछली फिल्मों से काफी कम कमाई की. जहां इन तीनों सीरीज की पिछली फिल्में बॉक्स ऑफिस के भरोसे हिट रही थीं, जबकि नए सीक्वल बड़ी मुश्किल से खींच-खांच के हिट कहला सके. वो भी जब ओटीटी और फलाना-ढिकाना राइट्स का गणित जोड़ा गया तब. वरना सिर्फ रिपोर्टेड बजट और बॉक्स ऑफिस से जोड़ा जाए तो मैटर फंसा हुआ ही है.  

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ए-लिस्ट स्टार्स के सीक्वल और बड़े प्रोडक्शन हाउस के 'यूनिवर्स' तो चल नहीं रहे. उसी में हिमेश रेशमिया अपनी फिल्म 'एक्स्पोजे' (2014) का एक स्पिन-ऑफ बैडऐस रवि कुमार' लेकर आ गए थे. टाइगर श्रॉफ के ठंडे दौर में उनकी सिग्नेचर फ्रैंचाइजी 'बागी' ने भी साथ नहीं दिया. 'बागी 4' बुरी तरह फ्लॉप हो गई.

बॉलीवुड लवर्स में ये चर्चा चलती रहती है कि अचानक से साउथ की फिल्में कैसे इतनी बड़ी हो गईं. इस सवाल का जवाब और दर्शकों का मूड समझने के लिए एक बहुत आसान टेस्ट है— 'बाहुबली', 'KGF' या 'कांतारा' आपने देखी ही हैं. और बॉलीवुड फिल्मों के सीक्वल भी आपने देखे हैं. क्या साउथ की इन तीन सीक्वल फिल्मों में आपको ऐसा लगा कि दोनों पार्ट्स की कहानी कनेक्ट नहीं होती या जबरदस्ती आगे बढ़ी है? क्या पहली फिल्म में ही आपको पता नहीं चला था कि अगला पार्ट भी आएगा? 

स्पष्ट दिखता है कि 'बाहुबली', 'KGF' या 'कांतारा' को सीक्वल के हिसाब से प्लान किया गया है. क्या ये प्लानिंग आपको कभी भी बॉलीवुड के किसी यूनिवर्स, किसी सीक्वल या किसी भी फ्रैंचाइजी में दिखी? जवाब आप जानते ही हैं! इसलिए बॉलीवुड के तमाम सीक्वल और यूनिवर्स एक स्कीम की तरह लगने लगे हैं. ये ऑरिजिनल पॉपुलर कहानी के नाम पर आपको थिएटर बुलाकर एक और फिल्म में चिपका देने वाली स्कीम है. और फिल्म भी ऐसी कि कहानी का सिर-पैर, पिछली फिल्म से मेल ही नहीं खाता. किरदार बदल जाते हैं, सेटिंग बदल जाती है, एक्टर्स बदल जाते हैं. और आजकल तो अक्सर डायरेक्टर भी बदल जाते हैं.

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अब तो इस माइंडसेट का नुकसान खुद बड़े मेकर्स की अच्छी फिल्मों को होने लगा है. सिद्धांत चतुर्वेदी और तृप्ति डिमरी की 'धड़क 2' असल में एक अच्छी कहानी लेकर आई थी. लेकिन मेकर्स ने फ्रैंचाइजी बेनिफिट के लालच में इसपर ऐसी फिल्म का टाइटल चिपका दिया, जिसकी वैसे भी कोई रिकॉल वैल्यू नहीं है. 2018 में आई 'धड़क' कामयाब जरूर थी, मगर इसमें ऐसा कुछ नहीं था कि इसे आज कोई याद करता हो. या इसके नाम पर एक नई कहानी देखना चाहे. ऊपर से पहली फिल्म में जब लीडिंग किरदार मर ही गए थे, तो सीक्वल किस बात का होगा... ये आईडिया दर्शकों को भी कन्फ्यूज करने वाला था. 

बॉलीवुड को ये बात कौन समझाए! कौन समझाए कि अब आपकी इस स्कीम से जनता ऊबने लगी है. हर कामयाब फिल्म के मॉडल को रिपीट कर लेने की खुजली में, इंडस्ट्री ऊबाऊ फिल्मों की फैक्ट्री बन चुकी है. और यही वजह है कि दर्शक ऑरिजिनल कंटेंट की आस में साउथ से हॉलीवुड तक की फिल्म लाइब्रेरी खंगालने लगे हैं— कहीं से कुछ तो ऑरिजिनल मिले! बॉलीवुड से तो अब एक्साइटिंग ऑरिजिनल कहानियां कब निकलेंगी ये कोई ज्योतिष या वैज्ञानिक ही बता सकता है.

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