गुजरात चुनाव की वो सबसे अहम बात जिसपर तय होगी जीत और हार

इन दावेदारियों के बीच जो एक चीज़ इस चुनाव में सबसे ज़्यादा मुखर और प्रत्यक्ष दिखी वो है लोगों का गुस्सा. चुनाव से पहले अपने दौरे के दौरान कई अलग अलग हिस्सों और वर्गों के लोगों से जो बातचीत की, उसमें भाजपा के प्रति असंतोष साफ दिखाई दे रहा था.

Advertisement
गुजरात चुनाव की सबसे अहम बात! गुजरात चुनाव की सबसे अहम बात!

पाणिनि आनंद

  • नई दिल्ली,
  • 14 दिसंबर 2017,
  • अपडेटेड 2:58 PM IST

गुजरात के चुनाव में जीत के अपने अपने दावे हैं और दोनों ही पार्टियां, भाजपा और कांग्रेस बहुमत से कम का दावा करने को तैयार नहीं. भाजपा के पास प्रधानमंत्री मोदी जैसा चेहरा है. वो मोदी के नाम पर वोट मांग रही है और जीत का दावा भी कर रही है. उसे विश्वास है कि 22 साल से राज्य में जो सत्ता कायम रही है, लोगों का विश्वास उसमें बना रहेगा.

Advertisement

वहीं कांग्रेस इस उम्मीद पर कायम है कि गुजरात में मोदी की अनुपस्थिति और भाजपा की राज्य सरकार से लोगों का मोहभंग उसके लिए संजीवनी साबित होगा और कांग्रेस भाजपा को राज्य में हरा देगी. इन दावेदारियों के बीच जो एक चीज़ इस चुनाव में सबसे ज़्यादा मुखर और प्रत्यक्ष दिखी वो है लोगों का गुस्सा. चुनाव से पहले अपने दौरे के दौरान कई अलग अलग हिस्सों और वर्गों के लोगों से जो बातचीत की, उसमें भाजपा के प्रति असंतोष साफ दिखाई दे रहा था.

पाटीदार आंदोलन ही नहीं, आर्थिक सुधार और राज्य की शासन व्यवस्था को लेकर भी लोगों में खासा गुस्सा रहा. हालांकि पिछले तीन चुनावों से भाजपा के प्रति लोगों में गुस्सा दिखता रहा है लेकिन यह गुस्सा मोदी के रास्ते को रोक पाने में विफल रहा है. पिछले दो चुनावों में लोग गुस्सा तो थे लेकिन भाजपा से बेहतर विकल्प के तौर पर वो किसी और दल को स्वीकार नहीं कर सके. लेकिन इस बार के चुनाव में गुस्सा व्यक्तिगत है, मुखर है और बहुआयामी है.

Advertisement

क्या वोटों में बदलेगा गुस्सा

और यही वो कारण है जो भाजपा को रह-रहकर विचलित करता रहा है. पूरे गुजरात चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री मोदी की बेचैनी और भाषणों का सार इसी बेचैनी की चुगली करता नज़र आता है. यही हाल भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और पार्टी के बाकी नेताओं का भी रहा.

लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न फिर भी वहीं का वहीं है. कि गुजरात के लोगों में ये जो मुखर गुस्सा दिखाई दे रहा है, क्या वो वोटों में तब्दील हो पाएगा. क्या वाकई लोग अपने गुस्से को वोटिंग मशीन के विकल्पों में स्थानान्तरित कर पाएंगे. क्या इसबार का गुस्सा इतना ज़्यादा है कि लोग कांग्रेस को जिताने के लिए नहीं, भाजपा को हटाने के लिए आमादा है. अगर ऐसा है तो भाजपा के लिए यह बहुत बुरी ख़बर है. और अगर ऐसा नहीं है तो भाजपा के लौट आने पर बहुत आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

दरअसल, यह गुस्सा कांग्रेस के लिए एक ज़मीन की तरह है. इस ज़मीन से कांग्रेस सत्ता परिवर्तन का कारक बन सकती है. लेकिन कांग्रेस का संकट यह है कि अमित शाह के प्रबंधन और भाजपा के मजबूत संगठन जैसी स्थिति उसकी राज्य में है नहीं. वोट डलवा पाना और बूथों को संभाल पाना चुनाव में सबसे अहम काम होता है. लेकिन इसके लिए कांग्रेस के पास ईमानदारी से लड़ने वाले कार्यकर्ता हैं क्या?

Advertisement

एक स्थिति और हो सकती है कि लोगों का गुस्सा इतना ज़्यादा है कि उन्हें कांग्रेस के बूथ प्रबंधन तक की चिंता नहीं है और वो बदलाव ही चाहते हैं. यह स्थिति भी कांग्रेस के पक्ष में जाएगी. लेकिन गुस्सा अगर वोट में तब्दील नहीं हुआ है या गुस्से से भरा वोटर घर बैठ गया है तो कांग्रेस सबकुछ जीतने का दावा करते हुए भी हारी हुई दिख सकती है.

भाजपा, दरअसल, कांग्रेस से नहीं, राज्य के लोगों के इसी गुस्से से विचलित है.

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »