केशव-निषाद-राजभर... NDA की ये तिकड़ी अखिलेश के लिए रोज ला रही सिरदर्द!

उत्तर प्रदेश में चुनावी तपिश के साथ ही सियासत गर्मा गई है. सपा प्रमुख अखिलेश यादव के खिलाफ एनडीए के ओबीसी नेताओं की तिकड़ी फ्रंटफुट पर उतरकर मोर्चा खोल दिया है. अखिलेश यादव को दलित-पिछड़ा विरोधी कठघरे में खड़े करने की कोशिश तेज हो गई है?

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केशव-निषाद-राजभर की तिकड़ी कैसे अखिलेश यादव पर हमलावर (Photo-ITG) केशव-निषाद-राजभर की तिकड़ी कैसे अखिलेश यादव पर हमलावर (Photo-ITG)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 19 जून 2026,
  • अपडेटेड 12:37 PM IST

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का भले ही औपचारिक ऐलान न हुआ हो, लेकिन सियासी बिसात अभी से ही बिछाई जाने लगी है. लोकसभा चुनाव में सपा ने पीडीए समीकरण के जरिए बीजेपी को मात देने में सफल रहे थे. अब चुनावी तपिश बढ़ने के साथ ही डिप्टीसीएम केशव प्रसाद मौर्य, संजय निषाद और ओम प्रकाश राजभर की तिकड़ी इन दिनों अखिलेश यादव के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है और सपा के 'पीडीए फार्मूले' को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं? 

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अखिलेश यादव 2024 के फार्मूले से ही 2027 का चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं. सपा की कोशिश पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के साथ ब्राह्मण वोटों को जोड़ने की है. इसके अलावा अखिलेश यादव इन दिनों 'विजन इंडिया' के जरिए बीजेपी के कोर वोटबैंक माने जाने वाले व्यापारियों को अपने पाले में करने की रणनीति है. 

सपा एक मजबूत सोशल इंजीनियरिंग के साथ विधानसभा चुनाव में उतरना चाहती है, जिसके समझते हुए बीजेपी ने अपने ओबीसी नेताओं की एक पूरी फौज सियासी रण में उतार दिया है. इसी के तहत केशव प्रसाद से लेकर संजय निषाद और ओम प्रकाश राजभर हर रोज अखिलेश की सियासी केमिस्ट्री पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं. 

अखिलेश के सिरदर्द बने राजभर
योगी सरकार में मंत्री और सुभासपा प्रमुख ओम प्रकाश राजभर ने 2022 में सपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था, लेकिन सरकार बनने के बाद बीजेपी के साथ हो गए थे. वो पूर्वांचल से आते हैं और राजभर समाज के बड़े चेहरे माने जाते हैं. ओबीसी के मुद्दे पर राजभर आक्रमक रहते हैं. 2024 में एनडीए को बिगड़े हुए समीकरण को दुरुस्त करने के मद्देनजर से ओमप्रकाश राजभर  एक तरफ सपा में बगावत की चिंगारी भड़का रहे हैं तो दूसरी ओर अखिलेश के पीडीए पर सवाल उठाना शुरू कर दिया है. 

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राजभर यह कह रहे हैं कि सपा में बहुत जल्द बगावत होने वाली है, तमाम लोकसभा सांसद अखिलेश यादव का साथ छोड़ देंगे. इसके लिए कभी बलिया के किसी नेता की तरफ इशारा करते हैं तो कभी मुरादाबाद की सांसद रूची वीरा की तरफ इशारा करते हैं. साथ ही सपा के पीडीए फार्मूले को कठघरे में  खड़ा कर रहे हैं. राजभर ने कहा कि पीडीए का मतलब 'पीट देगा अहीर' और 'पीट देगा अल्पसंख्यक' है. 

ओम प्रकाश राजभर कहते हैं कि सपा नेताओं को यह गलतफहमी नहीं पालनी चाहिए कि वो दलितों पर होने वाले अत्याचारों के मामलों को सार्वजनिक नहीं करेंगे. उन्होंने कहा कि यूपी पुलिस के आंकड़े बताता हैं कि प्रदेश में दलितों और शोषितों पर अत्याचार करने के मामले में सबसे ज्यादा यादव और मुस्लिम लोग हैं. ओपी राजभर ने दलित उत्पीड़न के आंकड़े भी गिना रहे हैं. इस तरह राजभर बताना चाहते हैं कि दलितों पर होने वाले अत्याचार यादव और मुस्लिम कर रहे हैं, जो सपा का वोटबैंक है. 

संजय निषाद भी सपा पर हमलावर
योगी सरकार में मंत्री और निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद भी फ्रंटफुट पर उतर गए हैं और अखिलेश यादव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. उन्होंने कहा कि सपा के कई बड़े नेता उनके संपर्क में हैं. राजभर से दो हाथ आगे निकलते हुए निषाद कहते हैं कि सपा के 25 सांसद हमारे संपर्क में है, जिसके जरिए बता रहे हैं कि सपा में बड़ी फूट होने वाली है. 

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संजय निषाद सिर्फ सपा में फूट की बात ही नहीं कर रहे हैं बल्कि सपा के पीडीए पर भी सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं. संजय निषाद कहते हैं कि सपा ने पीडीए के नाम पर पिछड़ों के अधिकारों पर डाका डालने का काम किया है. समाजवादी पार्टी सिर्फ तुष्टीकरण की राजनीति कर रही है. दलित-पिछड़ों का वोट लेकर मुस्लिमों के लिए काम करती है.

मंत्री संजय निषाद कह कहा था कि कुछ दल एक वर्ग विशेष की आवाज उठाते हैं. विशेष वर्ग का मतलब यादव और मुस्लिम से है. कहते हैं कि पीडीए में निषाद, मझवार, गोंड और खरवार जैसी जातियों की बात अखिलेश यादव नहीं करते हैं. इस तरह से संजय निषाद बता रहे हैं कि कैसे अखिलेश यादव का पीडीए कुछ विशेष जाति का है, जिसमें अतिपिछड़ी जातियों की बात नहीं होती. इस तरह से सपा के पीडीए पर निशाना साध रहे हैं. 

केशव मौर्य पीडीए पर उठा रहे सवाल
बीजेपी के सबसे बड़े ओबीसी चेहरा यूपी में केशव प्रसाद मौर्य माने जाते हैं. बीजेपी के साथ मौर्य, शाक्य, सैनी और कुशवाहा वोटों को जोड़ने में उनका रोल काफी अहम रहा है. इसी का नतीजा है कि 2017 में बीजेपी की सरकार बनी तो केशव मौर्य डिप्टीसीएम बनाए गए. 2022 में चुनाव हारने के बाद भी केशव मौर्य को डिप्टीसीएम के पद पर बनाए रखा गया, लेकिन 2024 में उनका सजातीय वोट बीजेपी से छिटका है और सपा के साथ गया है. ऐसे में अब केशव मौर्य आक्रामक तरीके से सपा के पीडीए फॉर्मूले पर हमलावर हो गए हैं. 

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डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि पीडीए का असली नाम परिवार डेवलपमेंट एजेंसी है. वो पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को एक बड़ा छलावा और छद्म राजनीति करार देते रहे हैं. केशव मौर्य का कहना है कि सपा का 'पीडीए' एक चुनावी रणनीति और धोखा है, जिसका वास्तविक धरातल से कोई लेना-देना नहीं है. वो कहते रहे हैं कि सपा सिर्फ यादव और मुसलमानों के लिए काम करती है, सपा शुरू से दलित विरोधी रही है. 

एनडीए की तिकड़ी अखिलेश की टेंशन
केशव प्रसाद मौर्य बीजेपी के बड़े नेता हैं और सूबे में ओबीसी चेहरा हैं. इसी तरह ओम प्रकाश राजभर और संजय निषाद बीजेपी के सहयोगी हैं. राजभर से लेकर निषाद और केशव मौर्य को सियासी अहमियत ओबीसी नेता होने के नाते मिली है. यही वजह है कि अब एनडीए के तीनों ओबीसी नेताओं ने सपा और अखिलेश यादव के खिलाफ सिर्फ आक्रमक ही नहीं बल्कि सपा के पीडीए फॉर्मूले पर सवाल उठा रहे हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि 2027 में अखिलेश यादव अगर पीडीए वोटों को एकजुट रखने में सफल रहे तो सत्ता को बचाए रखना मुश्किल हो जाएगा. 

सपा की पूरी रणनीति पीडीए फार्मूले पर ही 2027 के चुनाव लड़ने की है. इसीलिए केशव-राजभर और निषाद की तिकड़ी ने सपा को दलित-ओबीसी विरोधी कठघरे में खड़ी करने में जुट गई है. ऐसे में अखिलेश यादव के लिए अपने समीकरण को बचाए रखना मुश्किल हो रहा है. अब देखना है शह-मात के खेल में कौन किस पर भारी पड़ता है. 

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