याद कीजिए वो दौर, जब हर कोई चाहता था कि उनका बच्चा डिजिटल क्लासरूम में पढ़े. स्कूलों की फीस के साथ डिजिटल क्लासेज का खर्च भी अभिभावकों के बजट से कटने लगा. बच्चों के हाथों में लैपटॉप और टैबलेट देखना जैसे एक सपना बन गया था. एक ऐसी सोच धीरे धीरे समाज में पैठ बनाने लगी कि बच्चों के हाथों में कॉपी-किताब की जगह लैपटॉप और टैबलेट दो, तभी वो हाइटेक बनेंगे!
लेकिन आज, जब दुनिया एआई (AI) की रफ्तार से दौड़ रही है, सब कुछ चुटकी बजाते ही स्क्रीन पर बदल रहा है. ठीक ऐसे समय में समंदर पार से आई एक खबर हमें ठिठककर सोचने पर मजबूर कर रही है.
'द टेलीग्राफ यूके' में एक खबर छपी है कि कैसे ब्रिटेन के सबसे हाई-प्रोफाइल और महंगे बोर्डिंग स्कूलों में से एक 'विंचेस्टर कॉलेज' (जिसकी फीस सालाना करीब 62,100 पाउंड यानी लगभग 68 लाख रुपये से ज्यादा है) ने क्लासरूम्स में लैपटॉप का इस्तेमाल लगभग बंद कर दिया है. जी हां, वही स्कूल जहां से ऋषि सुनक और जॉन कीट्स जैसी हस्तियां पढ़कर निकली हैं, उसने अब 'पेन और पेपर' यानी पुरानी वाली पारंपरिक पढ़ाई का दामन दोबारा थाम लिया है.
क्यों लिया ये बड़ा यू-टर्न?
विंचेस्टर कॉलेज की पहली महिला हेडमास्टर एलिजाबेथ स्टोन का कहना है कि क्लासरूम में लैपटॉप पढ़ाई में 'मदद' कम और 'डिस्ट्रैक्शन' (ध्यान भटकाने का जरिया) ज्यादा बन रहे थे. एलिजाबेथ स्टोन ने साफ कह दिया कि अब लैपटॉप को 'डिफॉल्ट' (यानी पहली पसंद) बनाकर काम नहीं चलेगा. अगर किसी टीचर को लैपटॉप इस्तेमाल कराना है, तो पहले साबित करना होगा कि इससे बच्चे की पढ़ाई में कोई ठोस और बड़ा फायदा हो रहा है. अगर बिना स्क्रीन के काम चल सकता है, तो बात वहीं खत्म!
स्क्रीन हटाओ, हॉकी-फुटबॉल वापस लाओ
स्कूल प्रशासन ने पाया कि सुबह की पहली क्लास में पढ़ाई कम और ईमेल-मैसेज चेक करने का 'स्पाइक' (तूफान) ज्यादा आता था. बच्चे होमवर्क करते वक्त यूट्यूब देख रहे होते थे, फुटबॉल रील्स में खोए रहते थे या आपस में चैट कर रहे होते थे. लेकिन जैसे ही स्क्रीन को बाहर का रास्ता दिखाया गया, जादू की तरह बदलाव देखने को मिला. बच्चे अब क्लास में ज्यादा ध्यान दे रहे हैं और अपना होमवर्क भी तेजी से खत्म कर रहे हैं.
असली बचपन की वापसी
होमवर्क जल्दी खत्म होने के बाद बच्चों के पास पूल, फुटबॉल खेलने और आपस में घुलने-मिलने का वक्त बच रहा है. हेडमास्टर कहती हैं कि बच्चों के बीच पुराने जमाने के खेल फिर से लौट आए हैं! इस पाबंदी का नतीजा यह हुआ कि 2026 के जीसीएसई (GCSE) एग्जाम में 95 फीसदी बच्चों ने टॉप ग्रेड्स (7 से 9) हासिल किए, जो पिछले साल 93 फीसदी थे.
एआई के दौर में कागज-कलम की तसल्ली
बेशक, विशेष जरूरतों वाले (स्पेशल एजुकेशन नीड्स) बच्चों या एआई/3D मॉडलिंग जैसी चुनिंदा तकनीकों के लिए ही अब वहां कंप्यूटर का इस्तेमाल होगा. बाकी आम पढ़ाई के लिए वही पुराना कागज और कलम ही आबाद रहेगा. ब्रिटेन की शैडो एजुकेशन सेक्रेटरी लौरा ट्रॉट ने तो यहां तक कह दिया कि जब बड़े-बड़े प्राइवेट स्कूल बच्चों के दिमाग को बचाने के लिए क्लासरूम से स्क्रीन हटा रहे हैं, तो सरकारी स्कूलों को भी नींद से जागना चाहिए.
वैसे ये खबर महज एक खबर नहीं, बल्कि इस बात का आईना है कि तकनीक जितनी भी आगे निकल जाए, इंसान के दिमाग के विकसित होने का जो मूल तरीका है, वो है पढ़ना, सोचना और हाथ से लिखना, उसका कोई विकल्प नहीं हो सकता. विकास का पहिया घूमकर यू-टर्न ले चुका है. अब देखना यह है कि क्या बाकी दुनिया भी इस सबक से कुछ सीखेगी या स्क्रीन के मोहपाश में ही उलझी रहेगी?
आजतक एजुकेशन डेस्क