8.7 करोड़ युवा नौकरी, पढ़ाई और या ट्रेनिंग से बाहर! इतने प्रतिशत कर रहे हैं घर के काम

नीति आयोग की नई स्किल विकास रिपोर्ट के मुताबिक करीब 87 करोड़ युवा शिक्षा, रोजगार और प्रशिक्षण से बाहर हैं. इनमें लगभग 88% युवा घरेलू कामों में लगे हुए हैं. खासकर महिलाओं को स्किल विकास और रोजगार से जुड़ने में कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.

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इतने प्रतिशत युवा कर रहे हैं घर का काम. इतने प्रतिशत युवा कर रहे हैं घर का काम.

रौशनी चक्रवर्ती

  • नई दिल्ली,
  • 22 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 11:41 AM IST

भारत में स्किल विकास की परेशानी केवल बेरोजगारी तक सीमित नहीं है. नीति आयोग की नई रिपोर्ट रीइमैजिनिंग स्किलिंग फॉर विकसित भारत @2047 के मुताबिक, 15 से 29 साल की उम्र के करीब 8.7 करोड़ युवा ऐसे हैं जो न तो पढ़ाई कर रहे हैं, न नौकरी में हैं और न ही किसी तरह की ट्रेनिंग ले रहे हैं. इन्हें NEET आबादी कहा जाता है. 

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इनमें बेरोजगार युवा भी शामिल हैं. रिपोर्ट के अनुसार, यह संख्या रिपोर्ट में शामिल कुल आबादी का करीब 11% है. हालांकि, इसमें नौकरी की तलाश कर रहे लोगों को शामिल नहीं किया गया है. फिर आता है वो आंकड़ा जो इसे और भी कठिन बना देता है. इस ग्रुप के लगभग 88% लोग घरेलू कामों में लगे हुए हैं. 

इतना ही नहीं, रिपोर्ट में 8.7 करोड़ युवाओं में पुरुषों और महिलाओं की अलग-अलग संख्या नहीं बताई गई है. हालांकि, महिलाओं को लेकर किए गए अलग विश्लेषण से साफ होता है कि घरेलू जिम्मेदारियां, आने-जाने की दिक्कत और नौकरी तक पहुंच की कमी भारत में  स्किल विकास की बड़ी चुनौतियां हैं. इसलिए इन मुद्दों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. 

ये केवल बेरोजगार युवा की कहानी नहीं 

रिपोर्ट में इन युवाओं को चार अन्य प्रमुख समूहों के साथ रखा गया है—स्कूली छात्र, उच्च शिक्षा हासिल कर रहे छात्र, औपचारिक और अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले लोग और महिलाएं. ये पांचों समूह मिलकर करीब 60 करोड़ नागरिकों का प्रतिनिधित्व करते हैं. नीति आयोग के अनुसार, कौशल विकास को सिर्फ नौकरी जाने के बाद की प्रक्रिया नहीं माना जाना चाहिए. इसमें व्यक्ति की स्कूल से शुरुआत, हायर एजुकेशन, नौकरी, श्रम बाजार से बाहर रहने का समय और दोबारा काम पर लौटने की संभावना तक की पूरी जर्नी को ध्यान में रखा जाना चाहिए. हालांकि, जो युवा पहले ही पढ़ाई छोड़ चुके हैं या व्यवस्था से बाहर हैं, उन्हें वापस से व्यवस्था में लौटने के सुझाव दिए गए हैं. 

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क्या है इसके लिए बड़ी परेशानी? 

कई लोगों के लिए समस्या ट्रेनिंग सेंटर तक पहुंचने से पहले ही शुरू हो जाती है. रिपोर्ट के मुताबिक पैसों की कमी, ट्रेनिंग के दौरान होने वाली कमाई का नुकसान, पहले की पढ़ाई पर हो चुका खर्च और अपनी सुविधा के अनुसार सीखने के विकल्पों की कमी लोगों को कौशल विकास से दूर रख सकती है. महिलाओं के लिए ये मुश्किलें और बढ़ जाती हैं. घर और परिवार की जिम्मेदारियां, बच्चों या परिवार की देखभाल, सुरक्षा की चिंता और आने-जाने की दिक्कत उनके लिए कौशल प्रशिक्षण और रोजगार तक पहुंच को और मुश्किल बना देती हैं. 

महिलाओं के लिए और बड़ी है परेशानी

रिपोर्ट में महिलाओं को एक अलग और महत्वपूर्ण वर्ग के रूप में शामिल किया गया है. महिलाओं से जुड़े आंकड़ों में घरेलू जिम्मेदारियों की भूमिका खास तौर पर महत्वपूर्ण है. नीति आयोग के मुताबिक, केवल 3% महिलाएं औपचारिक नौकरियों में हैं, जबकि 71% महिलाएं या तो अनौपचारिक काम कर रही हैं या ऐसी युवाओं की श्रेणी में हैं जो शिक्षा, रोजगार और प्रशिक्षण से बाहर हैं. बाधाएं केवल प्रशिक्षण पाठ्यक्रम उपलब्ध होने तक सीमित नहीं हैं. 

सर्वेक्षण में शामिल 68% महिलाएं अंशकालिक कौशल प्रशिक्षण को पसंद करती हैं, जबकि 30% महिलाएं कम अवधि के कोर्स करना चाहती हैं. रिपोर्ट के शोध में यह भी पता चला है कि कई महिलाओं के विकल्प परिवार की देखभाल, पारिवारिक अपेक्षाओं और सुरक्षा की चिंताओं से सीमित होते हैं. यहां तक कि घर से कुछ किलोमीटर दूर स्थित ट्रेनिंग सेंटर तक पहुंचना भी उनके लिए मुश्किल हो सकता है. 

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कुछ दूर की दूरी करना भी हो जाता है मुश्किल 

रिपोर्ट में संगीता का उदाहरण बहुत कुछ कहता है. 

उसकी कम उम्र में शादी हो जाती है, बच्चे होते हैं और वह कोई हुनर ​​सीखना चाहती है ताकि अतिरिक्त आमदनी कर सके लेकिन पारिवारिक अपेक्षाओं, सुरक्षा संबंधी चिंताओं और देखभाल की जिम्मेदारियों की वजह से वह दूर यात्रा नहीं कर सकती या पूरे दिन के किसी कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सकती. 

पढ़ाई पूरी करने के बाद क्या? 

यहीं पर रिपोर्ट का बड़ा विचार भी सामने आता है. नीति आयोग का कहना है कि सीखना एक ऐसी प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए, जिसमें पढ़ाई बीच में छूटने के बाद व्यक्ति सिस्टम से पूरी तरह बाहर हो जाए. इसके बजाय शिक्षा, कौशल विकास और नौकरी के बीच कई बार जुड़ने, बाहर निकलने और दोबारा जुड़ने के रास्ते होने चाहिए. जो युवा सिस्टम से बाहर हैं, वे छोटे कोर्स, माइक्रो-सर्टिफिकेट, अप्रेंटिसशिप या दूसरे मान्यता प्राप्त कार्यक्रमों के जरिए दोबारा लौट सकते हैं. इससे वे नए स्किल सीखकर फिर से पढ़ाई या नौकरी से जुड़ सकते हैं. इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि भारत में कितनी ट्रेनिंग सीटें हैं. यह भी देखना जरूरी है कि क्या लोग ट्रेनिंग सेंटर तक पहुंच सकते हैं, उसका खर्च उठा सकते हैं और अपनी घरेलू जिम्मेदारियों के साथ ट्रेनिंग का समय निकाल सकते हैं. 

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मजबूरी के कारण छोड़ देती है स्कूल 

रिपोर्ट में एक ऐसी महिला के बारे में बताया गया है, जो घर के मजबूरियों और कम उम्र में शादी की वजह से स्कूल छोड़ देती है और इस श्रेणी में आ जाती है. बाद में उसे एक उपयुक्त प्रशिक्षण केंद्र मिलता है, वह स्किल वाउचर का उपयोग करती है, एक छोटा कोर्स करती है और फिर अपना खुद का बिजनेस शुरू करने से पहले अंशकालिक काम करने लगती है. 

क्या है सबसे बड़ी परेशानी? 

बात यहीं पर खत्म नहीं होती है. रिपोर्ट का मुख्य तर्क है कि भारत की कौशल विकास व्यवस्था को यह समझना होगा कि लोग शिक्षा और नौकरी के बीच आते-जाते रहते हैं. कोई व्यक्ति पारिवारिक कारणों से पढ़ाई छोड़ सकता है, तो किसी को परिवार की देखभाल के लिए नौकरी छोड़नी पड़ सकती है. कुछ लोग नौकरी के साथ छोटा कोर्स कर सकते हैं, जबकि कुछ लोग कई साल बाद दोबारा पढ़ाई शुरू करना चाहते हैं. 

इसी वजह से रिपोर्ट गैर-रेखीय शिक्षा, जीवनभर कौशल सीखने और रोजगार के बेहतर अवसरों पर जोर देती है. इसमें सिर्फ यह नहीं देखा जाएगा कि कितने लोगों ने कोर्स पूरा किया, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि लोगों को नौकरी मिली या नहीं, उनके कौशल में प्रगति हुई या नहीं और उन्हें स्थायी आजीविका मिल पाई या नहीं. 

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शायद यही 8.7 करोड़ युवाओं के आंकड़े की सबसे बड़ी अहमियत है. 
यह सिर्फ बेरोजगार युवाओं की संख्या नहीं है. यह बताता है कि कितने युवा अभी शिक्षा से रोजगार तक पहुंचने वाले सामान्य रास्ते से बाहर हैं. इसमें घरेलू जिम्मेदारियां भी बड़ी भूमिका निभाती हैं. रिपोर्ट का समाधान केवल ज्यादा ट्रेनिंग कोर्स शुरू करना नहीं है. जरूरत ऐसी व्यवस्था बनाने की है, जिसमें लोग पढ़ाई छोड़ने के बाद दोबारा लौट सकें, नए स्किल सीख सकें और काम शुरू कर सकें और हर बार उन्हें सबकुछ शुरुआत से शुरू न करना पड़े. 

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