अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु सामग्री को सौंपने और तनाव कम करने को लेकर एक संभावित डील की खबरें तो आ रही हैं, लेकिन इस कूटनीतिक सफलता के सामने एक ऐसा संकट खड़ा हो गया है जिसने दुनिया भर के सैन्य रणनीतिकारों को चिंता में डाल दिया है.
ईरान ने अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के डर से दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बड़े पैमाने पर नौसैनिक बारूदी सुरंगें बिछा दी हैं. हालांकि दोनों देश एक मेज पर आकर समझौते के करीब पहुंच रहे हैं, लेकिन असली और सबसे खतरनाक सवाल यह है कि इस व्यस्त समुद्री रास्ते में बिछाई गई बारूदी सुरंगों को साफ करने का जानलेवा जिम्मा कौन उठाएगा?
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जब तक इन अदृश्य खतरों को समंदर से पूरी तरह हटा नहीं दिया जाता, तब तक किसी भी व्यापारिक जहाज या तेल टैंकर का यहां से गुजरना आत्मघाती साबित हो सकता है.
वैश्विक व्यापार की जीवनरेखा पर ईरान की सैन्य घेराबंदी
होर्मुज जलडमरूमध्य कोई आम समुद्री रास्ता नहीं है; यह दुनिया की आर्थिक नब्ज है. हालिया तनाव के दौरान ईरान ने न केवल इस रास्ते को बंद कर दिया, बल्कि अमेरिकी घुसपैठ को रोकने के लिए पानी के भीतर घातक बारूदी सुरंगों का जाल बिछा दिया.
इन नौसैनिक माइंस की खासियत यह होती है कि ये पानी की सतह के नीचे छिपी रहती हैं. जैसे ही कोई बड़ा जहाज इनके संपर्क में आता है या इनके करीब से गुजरता है, ये एक भीषण विस्फोट के साथ पूरे जहाज को डुबो देती हैं. ट्रंप प्रशासन ने ईरान के साथ यूरेनियम नष्ट करने और इस रास्ते को दोबारा खुलवाने की बात तो मान ली है, लेकिन इन खतरनाक सुरंगों को हटाए बिना यह रास्ता सिर्फ कागजों पर ही खुला माना जाएगा.
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डी-माइनिंग: समंदर में मौत से खेलने जैसा जटिल मिशन
समुद्र से बारूदी सुरंगों को खोजना और उन्हें निष्क्रिय करना दुनिया के सबसे कठिन, खर्चीले और समय लेने वाले सैन्य ऑपरेशन्स में से एक है. इसके लिए बेहद एडवांस सोनार तकनीक, पानी के भीतर काम करने वाले रिमोट ड्रोन और विशेषज्ञ गोताखोरों की आवश्यकता होती है. चूंकि ईरान ने ये माइंस हाल के हफ्तों में बेहद हड़बड़ी और गुप्त तरीके से बिछाई हैं, इसलिए इसका कोई सटीक नक्शा भी उपलब्ध नहीं है.
विशेषज्ञों का कहना है कि समुद्री लहरों और तेज धाराओं के कारण ये माइंस अपनी मूल जगह से खिसक कर अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग के बीच में आ चुकी होंगी. ऐसे में एक-एक माइंस को ढूंढकर फटना या नष्ट करना किसी टेढ़ी खीर से कम नहीं है. इस प्रक्रिया में महीनों का समय लग सकता है.
कौन बांधेगा बिल्ली के गले में घंटी? जिम्मेदारी से कतरा रहे देश
इस संकट ने एक नया कूटनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है कि इस खतरनाक सफाई अभियान का नेतृत्व कौन करेगा? अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के कुछ अधिकारियों का मानना है कि चूंकि ये सुरंगें ईरान ने बिछाई हैं, इसलिए समझौते की शर्तों के तहत इन्हें हटाने की पहली जिम्मेदारी भी तेहरान की ही होनी चाहिए. लेकिन ईरान के पास इस स्तर की आधुनिक 'माइन-स्वीपिंग' तकनीक और संसाधन नहीं हैं.
यदि अमेरिकी नौसेना या उसके सहयोगी देश (जैसे ब्रिटेन या फ्रांस) अपने जहाजों को इस काम के लिए होर्मुज में उतारते हैं, तो उनके खुद के सैनिकों और जहाजों पर चौबीसों घंटे हमले या दुर्घटना का खतरा बना रहेगा. कोई भी देश इस बेहद जोखिम भरे काम में अपने सैनिकों की जान दांव पर लगाने को आसानी से तैयार नहीं हो रहा है.
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जब तक साफ नहीं होगा समंदर, थमी रहेगी तेल की सप्लाई
इस अनिश्चितता का सीधा और भयानक असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ रहा है. अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों और बीमा फर्मों ने साफ कर दिया है कि जब तक अमेरिकी नौसेना या कोई अन्य वैश्विक टास्क फोर्स स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को पूरी तरह सुरक्षित घोषित नहीं कर देती, तब तक वे अपने अरबों डॉलर के तेल टैंकरों को इस रास्ते में नहीं भेजेंगे.
जहाजों के न निकलने से वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की भारी किल्लत हो सकती है, जिससे पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान छू सकती हैं. सीधे शब्दों में कहें तो, वॉशिंगटन और तेहरान के बीच की यह 'शांति डील' तब तक अधूरी है, जब तक कि होर्मुज के मुहाने पर तैर रहे बारूदी संकट का स्थाई समाधान नहीं ढूंढ लिया जाता.
ऋचीक मिश्रा