अमेरिकी हमले रुकने के बाद ईरान ने फिर से खोली अपनी अंडरग्राउंड मिसाइल साइट्स

ईरान ने अमेरिका-इजरायल की बमबारी के बावजूद अपने अंडरग्राउंड मिसाइल ठिकानों को दोबारा खोल लिया है. बुलडोजर-ट्रकों से 50 टनलें खोलकर सड़कें सुधार ली गई हैं. इससे ईरान इजरायल पर फिर भारी मिसाइल हमले कर सकता है.

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पीले घेरे में दिख रहे रास्ते अंडरग्राउंड मिसाइल सिटी के गेट हैं, जिन्हें खोला गया है. (Photo: Airbus/IRGC) पीले घेरे में दिख रहे रास्ते अंडरग्राउंड मिसाइल सिटी के गेट हैं, जिन्हें खोला गया है. (Photo: Airbus/IRGC)

ऋचीक मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 01 जून 2026,
  • अपडेटेड 9:41 AM IST

ईरान ने अपने अंडरग्राउंड मिसाइल ठिकानों को तेजी से दोबारा खोल रहा है, जिससे वह इजरायल और मध्य पूर्व के अन्य देशों पर लंबी दूरी की मिसाइलें फिर से दागने की स्थिति में पहुंच गया है. यह घटना अमेरिका और इजरायल की महंगी बमबारी योजना की कमजोरी को उजागर करती है. 

हफ्तों तक चले हमलों में अमेरिका और इजरायल ने सड़कों को नष्ट कर दिया था और टनल के प्रवेश द्वारों को मिट्टी से ढक दिया था, लेकिन अब सीएनएन द्वारा देखी गई सैटेलाइट तस्वीरों से पता चलता है कि ईरान ने साधारण बुलडोजर और डंप ट्रकों की मदद से इन बाधाओं को पार कर लिया है.

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इससे साफ है कि सिर्फ टनल के मुंह बंद करने से ईरान की मिसाइल क्षमता को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता. विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान के पास अब भी काफी मिसाइल स्टॉक है. लॉन्चर और क्रू तैयार हैं. 

इस पूरे संघर्ष के दौरान ईरान ने बड़ी मुश्किलों के बीच काम किया. अमेरिका और इजरायल बार-बार खुदाई के उपकरणों पर हमला करते रहे, फिर भी ईरान ने टनल के प्रवेश द्वार खोलने का काम जारी रखा. युद्ध के समय मिसाइल लॉन्च की दर बहुत कम हो गई थी, लेकिन पूरी तरह बंद नहीं हुई. अब युद्धविराम के सात हफ्ते बीतने के बाद ईरान की खुदाई और मरम्मत की गति बहुत तेज हो गई है.

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सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका और इजरायल द्वारा हमला किए गए 18 अंडरग्राउंड मिसाइल फैसिलिटी के 69 टनल दरवाजों में से 50 अब दोबारा खोल दिए गए हैं. सड़कों की मरम्मत भी हो चुकी है जहां गड्ढे भरे गए हैं और कुछ जगहों पर नई पेविंग भी की गई है. यह सब दिखाता है कि ईरान की सेना और इंजीनियरिंग टीम कितनी सक्षम और दृढ़ है.

ईरान की भूमिगत मिसाइल सुविधाओं का महत्व

ईरान लंबे समय से अपने मिसाइल कार्यक्रम को मजबूत कर रहा है. उसके पास भूमिगत बंकर और टनल हैं जो पहाड़ों और जमीन के अंदर बने हैं. इनका मकसद दुश्मन के हमलों से बचना है. ये ठिकाने इतने गहरे और मजबूत हैं कि सामान्य बमों से उन्हें पूरी तरह नष्ट करना बहुत मुश्किल है. 

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अमेरिका और इजरायल ने रणनीति बनाई कि टनल के मुंह बंद कर दिए जाएं और पहुंचने वाली सड़कें तोड़ दी जाएं, ताकि मिसाइल लॉन्चर बाहर न निकल सकें. यह रणनीति शुरुआत में कामयाब रही और ईरान की मिसाइल फायरिंग की क्षमता पर असर पड़ा. लेकिन अब साफ हो गया है कि यह सिर्फ अस्थाई समाधान था.

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ईरान ने साधारण उपकरणों से काम किया. बुलडोजर मिट्टी हटाते रहे, डंप ट्रक मलबा ले जाते रहे. इस काम के दौरान उनके कर्मी जान जोखिम में डालकर काम करते रहे क्योंकि हमले होते रहते थे. फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी. ईरान के पास पहले से ही काफी मिसाइलों का भंडार है. अगर उत्पादन रुक भी जाए तो मौजूदा स्टॉक और लॉन्चर से हमले जारी रखे जा सकते हैं. जेम्स मार्टिन सेंटर फॉर नॉनप्रोलिफरेशन स्टडीज के रिसर्च एसोसिएट सैम लेयर ने कहा कि ईरान लॉन्चर और क्रू के जरिए मिसाइलें दागता रहेगा.

अमेरिकी बमबारी की रणनीतिक कमजोरियां

अमेरिकी सेना रणनीतिक रूप से मजबूत हमले करने में सक्षम है. उसने ईरान की मिसाइल ताकत को दबाने और उन्हें जिंदा दफनाने में सफलता हासिल की. लेकिन अगर इस सफलता के साथ कोई ठोस रणनीतिक लक्ष्य और जीत का स्पष्ट प्लान न हो तो यह सामरिक सफलता रणनीतिक असफलता बन जाती है. सैम लेयर का कहना है कि अमेरिका को युद्ध के उद्देश्यों को स्पष्ट रूप से तय करना चाहिए था. सिर्फ टैक्टिकल सफलताएं हासिल करने से लंबे समय में समस्या हल नहीं होती.

ईरान ने दिखा दिया कि सस्ते और साधारण उपकरणों से महंगे हथियारों और हवाई हमलों का मुकाबला किया जा सकता है. सैटेलाइट तस्वीरों में साफ दिख रहा है कि गड्ढे भरे जा चुके हैं, सड़कें सुधर गई हैं और टनल खुल गए हैं. इससे ईरान की मिसाइल क्षमता फिर से बढ़ गई है. अब वह लंबी दूरी की मिसाइलों से इजरायल और क्षेत्र के अन्य देशों को निशाना बना सकता है.

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स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर समझौता और अनिश्चित भविष्य

ईरान और अमेरिका के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दोबारा खोलने पर अस्थाई समझौता हो गया है. लेकिन इस समझौते के बावजूद विस्तृत बातचीत में कई महीने लग सकते हैं. अगर दुश्मनी फिर शुरू हुई तो ईरान की मिसाइल ताकत एक बड़ा खतरा बनेगी. ईरान का मिसाइल कार्यक्रम पिछले कई दशकों से चल रहा है.

वह बैलिस्टिक मिसाइलें बना रहा है जो सैकड़ों किलोमीटर दूर तक मार कर सकती हैं. इनमें से कई भूमिगत ठिकानों में रखी जाती हैं ताकि दुश्मन उन्हें आसानी से नष्ट न कर सके. इस बार के संघर्ष में ईरान ने साबित कर दिया कि उसकी तैयारी कितनी मजबूत है. युद्ध के दौरान उसकी फायरिंग दर कम जरूर हुई लेकिन पूरी तरह रुक नहीं पाई. अब युद्धविराम के बाद वह और मजबूत होकर उभरा है.

ईरान की इंजीनियरिंग क्षमता  

ईरान की सफलता उसके इंजीनियरों और सैनिकों की मेहनत और साहस को दर्शाती है. उन्होंने जान पर खेलकर काम किया. अमेरिकी और इजरायली हमलों के बावजूद वे खुदाई करते रहे. अब जब युद्ध थमा है तो उन्होंने गति बढ़ा दी है. 18 सुविधाओं में से ज्यादातर जगहों पर काम पूरा हो चुका है. सड़कें न केवल गड्ढों से भरी गई हैं बल्कि कुछ को नई सतह भी दी गई है ताकि भारी मिसाइल लॉन्चर आसानी से गुजर सकें.

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यह दिखाता है कि आधुनिक युद्ध में सिर्फ महंगे हथियार ही काफी नहीं होते. रणनीति, तैयारी और दृढ़ इच्छाशक्ति भी उतनी ही जरूरी है. ईरान ने साबित किया कि अगर जमीन के अंदर मजबूत ठिकाने हों और स्टॉक पर्याप्त हो तो दुश्मन की हवाई श्रेष्ठता के बावजूद लड़ाई जारी रखी जा सकती है.

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सैम लेयर जैसे विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका की सेना दुनिया की सबसे ताकतवर है. वह जरूरत पड़ने पर किसी भी जगह और समय पर हमला कर सकती है. लेकिन ईरान के मामले में सिर्फ टैक्टिकल सफलता हासिल करने से काम नहीं चलेगा. अगर रणनीतिक लक्ष्य स्पष्ट न हों तो युद्ध लंबा खिंच सकता है और महंगा पड़ सकता है.

पेंटागन के प्रवक्ता शॉन पार्नेल ने सीएनएन के सवालों का जवाब नहीं दिया. उन्होंने पहले वाला बयान दोहराया कि अमेरिकी सेना दुनिया की सबसे शक्तिशाली है. राष्ट्रपति के आदेश पर हर काम करने में सक्षम है. वास्तविकता यह है कि ईरान की मिसाइल क्षमता को पूरी तरह खत्म करना आसान नहीं है.

मिडिल ईस्ट में शांति की उम्मीदें

वर्तमान में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खोलने पर बात चल रही है. अगर यह सफल रहा तो तेल आपूर्ति सामान्य हो सकेगी और क्षेत्र में तनाव कुछ कम हो सकता है. लेकिन ईरान की बढ़ती मिसाइल क्षमता एक बड़ी चिंता बनी हुई है. इजरायल और अन्य देश सतर्क हैं. अगर बातचीत असफल रही और दुश्मनी बढ़ी तो नई जंग छिड़ सकती है जिसमें ईरान पहले से ज्यादा तैयार दिख रहा है.

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ईरान की अर्थव्यवस्था और मिसाइल कार्यक्रम पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का असर पड़ा है, लेकिन फिर भी उसने अपनी क्षमता बनाए रखी है. यह पूरा मामला युद्ध की प्रकृति को समझने का सबक है. आधुनिक हथियारों के दौर में भी पुराने जमाने के उपकरण जैसे बुलडोजर और ट्रक काम आ सकते हैं.

रणनीति सिर्फ हमला करने की नहीं बल्कि लंबे समय तक टिके रहने की भी होनी चाहिए. ईरान ने दिखाया कि वह दबाव में टूटने वाला नहीं है. अमेरिका और उसके सहयोगियों को अपनी रणनीति पर फिर से विचार करना होगा. 

ईरान की यह सफलता पूरे मध्य पूर्व के सुरक्षा समीकरण को बदल सकती है. लंबी दूरी की मिसाइलें फिर से तैयार हैं और ठिकाने सक्रिय हो चुके हैं. अब शांति वार्ता कितनी सफल होती है, यह देखना बाकी है. लेकिन एक बात साफ है - सिर्फ बमबारी से समस्याओं का हल नहीं निकलता. 

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