क्या पाकिस्तानी बेस का इस्तेमाल ईरान में जासूसी के लिए करता था अमेरिका?

अमेरिका ने पाकिस्तानी बेस मुख्य रूप से सोवियत संघ (U-2 कांड, 1960) और अफ़ग़ानिस्तान युद्ध (शमसी बेस, 2001-2011) के लिए इस्तेमाल किए हैं. ईरान पर सीधी जासूसी या हमले का कोई पक्का सबूत नहीं. अफवाहें पाकिस्तान ने खारिज की हैं. आज अमेरिका कतर (अल उदैद), UAE, बहरीन और डिएगो गार्सिया जैसे खाड़ी बेस से ईरान पर निगरानी रखता है.

Advertisement
बलूचिस्तान में मौजूद शमसी एयरबेस का इस्तेमाल अमेरिका बरसों करता रहा है. (File Photo: Reuters) बलूचिस्तान में मौजूद शमसी एयरबेस का इस्तेमाल अमेरिका बरसों करता रहा है. (File Photo: Reuters)

ऋचीक मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 09 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 12:58 PM IST

अमेरिका और ईरान के बीच दशकों से तनाव चल रहा है. ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम, क्षेत्रीय प्रभाव और अमेरिकी सहयोगियों (इजरायल, सऊदी अरब) पर हमलों को लेकर दोनों देश आमने-सामने रहते हैं. 2025-2026 में तनाव चरम पर पहुंच गया, जब अमेरिका ने ईरान के न्यूक्लियर साइट्स पर हमले किए.

इस बीच सोशल मीडिया और कुछ खबरों में दावे चले कि अमेरिका ने इन ऑपरेशनों के लिए पाकिस्तान के एयर बेस या एयरस्पेस का इस्तेमाल किया. लेकिन क्या यह सच है? आज अमेरिका ईरान के खिलाफ कौन से बेस इस्तेमाल करता है? आइए समझते हैं.

Advertisement

यह भी पढ़ें: पाकिस्तान का फाइटर जेट JF-17 थंडर... ब्लंडर या PR वंडर, बढ़ती मांग पर उठ रहे सवाल

कोल्ड वॉर दौर (1950-1990): मुख्य रूप से सोवियत संघ के खिलाफ

अमेरिका और पाकिस्तान के सैन्य रिश्ते पुराने हैं. कोल्ड वॉर में पाकिस्तान अमेरिका का करीबी सहयोगी था.

पेशावर (बदाबेर बेस)

1950-60 के दशक में अमेरिका ने पेशावर के पास बदाबेर बेस पर जासूसी सुविधाएं बनाईं. यहां से U-2 जासूस विमान उड़ाए जाते थे, जो सोवियत संघ पर नजर रखते थे. 1 मई 1960 को एक U-2 विमान पेशावर से उड़ा और सोवियत संघ ने इसे मार गिराया. पायलट गैरी पावर्स पकड़े गए. यह बड़ा अंतरराष्ट्रीय कांड बना.

यह ऑपरेशन पूरी तरह सोवियत संघ के खिलाफ था. ईरान का कोई सीधा कनेक्शन नहीं. हालांकि पाक-ईरान सीमा पास होने से कुछ INCIDENTAL निगरानी संभव थी, लेकिन इसका कोई सबूत नहीं. 1970 तक अमेरिका ने बदाबेर बेस खाली कर दिया.

Advertisement

अन्य कोल्ड वॉर सुविधाएं: अमेरिका को पाकिस्तान से कुछ लॉजिस्टिक सपोर्ट मिला, लेकिन मुख्य फोकस सोवियत संघ और बाद में अफगानिस्तान (1979 सोवियत इनवेजन) था. ईरान पर टारगेटेड जासूसी का कोई रिकॉर्ड नहीं.

9/11 के बाद (2001-2011): अफगानिस्तान युद्ध और ड्रोन ऑपरेशन

2001 में अल-कायदा के हमलों के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला किया. पाकिस्तान ने अमेरिका को सपोर्ट दिया और कई बेस इस्तेमाल की अनुमति दी.

यह भी पढ़ें: ईरान के पास अमेरिकी सैन्य बेड़ा पिछले साल से भी बड़ा... क्या अब होगा हमला?

शमसी एयरफील्ड (बलूचिस्तान)

यह सबसे चर्चित बेस रहा है. 2001 से 2011 तक CIA ने यहां से ड्रोन हमले किए. पाकिस्तान के ट्राइबल एरिया और अफगानिस्तान में तालिबान-अलकायदा पर. बलूचिस्तान ईरान से सटा होने से कुछ पुरानी अफवाहें थीं कि यहां से ईरान पर भी सर्विलांस होता था. लेकिन आधिकारिक दस्तावेज और जांच बताते हैं कि इसका इस्तेमाल सिर्फ अफगानिस्तान ऑपरेशन के लिए था. ईरान पर कोई पक्का सबूत नहीं.

2011 में नाटो हमले में पाकिस्तानी सैनिक मारे गए. इसके बाद पाकिस्तान ने अमेरिका को शमसी बेस खाली करने को कहा. दिसंबर 2011 तक अमेरिका ने बेस छोड़ दिया.

  • जैकोबाबाद (शाहबाज एयर बेस): स्पेशल फोर्सेस और लॉजिस्टिक्स के लिए.  
  • दल्बंदिन और समुंगली: लॉजिस्टिक सपोर्ट. ये सभी अफगानिस्तान युद्ध के लिए थे.

2011 के बाद अमेरिका के पास पाकिस्तान में कोई स्थाई बेस नहीं. रिश्ते खराब हुए और ड्रोन ऑपरेशन भी कम हो गए.

Advertisement

सोशल मीडिया पर दावे, सरकार ने खारिज किए

2025 में अमेरिका ने ईरान पर हमले किए. 2026 में तनाव बढ़ने पर अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में बड़ी तैनाती की. इसी दौरान सोशल मीडिया पर दावे चले... 

अमेरिकी विमान पाकिस्तान के शमसी, नूर खान (चकलाला, रावलपिंडी), दल्बंदिन, पसनी बेस पर उतरे. पाकिस्तान ने एयरस्पेस या बेस दिए ताकि अमेरिका ईरान पर हमला कर सके.

यह भी पढ़ें: क्या है Iran की अंडरग्राउंड मिसाइल सिटी... जहां रखी जाती हैं मिसाइलें और सुसाइड ड्रोन

पाकिस्तान सरकार ने इन सभी दावों को सख्ती से खारिज किया...

जनवरी 2026 में सूचना मंत्रालय ने कहा कि पाकिस्तानी क्षेत्र या शमसी बेस का ईरान के खिलाफ कभी इस्तेमाल नहीं हुआ. कोई अमेरिकी फोर्स यहां नहीं है. 

विदेश मंत्रालय ने बयान दिया कि पाकिस्तान अपना क्षेत्र, एयरस्पेस या जल क्षेत्र ईरान के खिलाफ किसी हमले के लिए नहीं देगा. पाकिस्तान ने अमेरिकी हमलों की सार्वजनिक निंदा भी की.

फैक्ट-चेक रिपोर्ट्स (डॉन, ट्रिब्यून आदि) ने कहा कि ये दावे बेबुनियाद हैं. कोई ठोस सबूत नहीं.

कुछ विश्लेषक कहते हैं कि पाकिस्तान सार्वजनिक रूप से निंदा करता है लेकिन चुपके से मदद कर सकता है, लेकिन इसका भी कोई पक्का प्रमाण नहीं है. आधिकारिक स्टैंड स्पष्ट इनकार है.

आज अमेरिका ईरान के खिलाफ कौन-कौन से बेस इस्तेमाल करता है? 

Advertisement

2026 में ईरान से तनाव के कारण अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में बड़ी सैन्य तैनाती की है. मुख्य बेस खाड़ी देशों में हैं (CENTCOM के तहत)... 

यह भी पढ़ें: ईरान की नई मिसाइल की रेंज में यूरोप के कई शहर, पूरा इजरायल और अमेरिकी बेस... जानिए कितनी खतरनाक

  • अल उदैद एयर बेस (कतर) - अमेरिका का सबसे बड़ा बेस. लगभग 10,000 सैनिक. यहां से फाइटर जेट, ड्रोन, सर्विलांस विमान उड़ते हैं.
  • बहरीन - अमेरिकी नेवी का 5th फ्लीट हेडक्वार्टर. समुद्री निगरानी और ऑपरेशन.
  • संयुक्त अरब अमीरात (UAE) - कई बेस, जहां जेट और ड्रोन तैनात.
  • कुवैत - कैंप अरिफजन और अन्य. लॉजिस्टिक्स और ग्राउंड फोर्सेस.
  • सऊदी अरब - हाल में फिर अनुमति मिली. कुछ बेस पर अमेरिकी सैनिक.
  • इराक - ऐन अल असद बेस. कुछ तैनाती.
  • जॉर्डन और सीरिया - छोटी तैनाती.
  • डिएगो गार्सिया (हिंद महासागर, ब्रिटिश द्वीप) - 7 दूर से B-2 स्टेल्थ बॉम्बर ऑपरेशन. 2025-2026 हमलों में इसका बड़ा रोल.
  • एयरक्राफ्ट कैरियर्स - अरब सागर या खाड़ी में तैनात (जैसे USS अब्राहम लिंकन या अन्य). दर्जनों जहाज और विमान.

इनके अलावा अतिरिक्त एयर डिफेंस सिस्टम (THAAD, पैट्रियट) तैनात किए गए हैं. पाकिस्तान का कोई बेस या एयरस्पेस इसमें शामिल नहीं.

हकीकत क्या है?

Advertisement

इतिहास में अमेरिका ने पाकिस्तानी बेस मुख्य रूप से सोवियत संघ और अफगानिस्तान के खिलाफ इस्तेमाल किए. ईरान पर सीधे टारगेटेड जासूसी या ऑपरेशन का कोई पक्का सबूत नहीं. शमसी जैसे बेस की निकटता से अफवाहें उड़ीं, लेकिन आधिकारिक रिकॉर्ड कुछ और कहते हैं. 2025-2026 अफवाहें पाकिस्तान ने सख्ती से खारिज कीं. आज अमेरिका खाड़ी देशों और हिंद महासागर के बेस से ईरान पर नजर रखता और ऑपरेशन चलाता है.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement