अपना खुद का घर या प्रॉपर्टी खरीदना हर इंसान के जीवन का सबसे बड़ा सपना और सबसे बड़ा निवेश होता है, लेकिन थोड़ी सी जल्दबाजी, कम कीमत का लालच या अधूरी जानकारी खरीदार को एक ऐसी कानूनी और वित्तीय मुसीबत में डाल सकती है, जिससे निकलना नामुमकिन हो जाता है.
अक्सर लोग अनजाने में कुछ ऐसी गलतियां कर बैठते हैं, जिसका फायदा उठाकर कुछ लोग उनकी जीवनभर की गाढ़ी कमाई हड़प लेते हैं. यदि आप भी कोई प्रॉपर्टी खरीदने का प्लान बना रहे हैं, तो बाजार के नियमों और अपनी सुरक्षा के प्रति जागरूक होना आपके लिए बेहद जरूरी है.
रेरा के आने से पहले जब कानून बेहद कमजोर थे और लोग अपनी जीवनभर की पूंजी लगाने के बाद भी सालों-साल अपने घर के पजेशन के लिए भटकते थे. आज भी कुछ लोग इन पुराने और अटके हुए प्रोजेक्ट्स के कारण भारी मानसिक और वित्तीय तनाव झेल रहे हैं. वहीं, रेरा कानून लागू होने के बाद पिछले 7-8 वर्षों में बाजार में काफी रिफाइनमेंट और संरचनात्मक सुधार आया है. रेरा ने आम खरीदारों को एक ऐसा मजबूत फोरम और सुरक्षा कवच दिया है, जिससे मनमानी करने वाले बिल्डर्स की हरकतों पर लगाम लगी है.
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गलत फैसला लेने से बचें
इसके बावजूद, प्रॉपर्टी खरीदते समय अक्सर लोग अपने बजट की मजबूरी को ध्यान में रखकर गलत फैसले ले लेते हैं. जब बड़े और नामी बिल्डर्स के प्रोजेक्ट्स बजट से बाहर हो जाते हैं, तो लोग सेकंड-ग्रेड या छोटे स्थानीय बिल्डर्स की तरफ रुख करते हैं और इसी प्रक्रिया में सबसे बड़ी गलती तब होती है, जब लोग अनऑथराइज्ड कॉलोनियों के जाल में फंस जाते हैं. इन प्रतिबंधित इलाकों में आज भी भ्रामक विज्ञापनों का खेल धड़ल्ले से चल रहा है, जहां लोग आकर्षक दावों और कम कीमतों के झांसे में आकर यह बुनियादी जांच करना भूल जाते हैं कि उस तथाकथित बिल्डर या प्रोजेक्ट के पास कानूनी अप्रूवल्स हैं भी या नहीं.
इस गंभीर समस्या से बचने के लिए रियल एस्टेट एक्सपर्ट्स की सबसे पहली और बुनियादी सलाह यह है कि किसी भी नए प्रोजेक्ट में एक भी रुपया निवेश करने से पहले उसका रेरा (RERA) रजिस्ट्रेशन नंबर जरूर चेक करें. पैन इंडिया के स्तर पर रेरा का नियम बेहद सख्त है. यदि कोई भी बिल्डर 500 वर्ग मीटर या उससे बड़े भूखंड पर काम कर रहा है, या अपने प्रोजेक्ट में 8 घर/फ्लैट बना रहा है, तो उसके लिए रेरा अथॉरिटी के पास पंजीकरण कराना कानूनी रूप से अनिवार्य है. यह 500 स्क्वायर मीटर का दायरा इतना छोटा है कि कोई भी वास्तविक और वैध काम करने वाला बिल्डर इसके बिना बाजार में टिक ही नहीं सकता, इसलिए बिना रेरा नंबर वाले प्रोजेक्ट्स से पूरी तरह दूरी बनाना ही समझदारी है.
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इसके साथ ही प्रॉपर्टी बाजार में निवेश करते समय खरीदारों को यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि वे किस मार्केट में पैसा लगा रहे हैं, क्योंकि प्राइमरी और सेकेंडरी मार्केट में सतर्कता के पैरामीटर्स बिल्कुल अलग होते हैं. प्राइमरी मार्केट वह है जहां आप सीधे बिल्डर से नया या अंडर-कंस्ट्रक्शन फ्लैट खरीदते हैं, जहां आपको पूरी तरह रेरा के नियमों, बिल्डर-बायर एग्रीमेंट और सरकारी अप्रूवल्स पर भरोसा करना होता है. दूसरी तरफ सेकेंडरी मार्केट है, जहां खरीदारी इंडिविजुअल टू इंडिविजुअल होती है. एक्सपर्ट्स के अनुसार, रिसेल मार्केट में अमूमन धोखाधड़ी या प्रोजेक्ट अटकने की गुंजाइश काफी कम होती है क्योंकि प्रॉपर्टी पहले से भौतिक रूप से वजूद में होती है और उसका टाइटल क्लियर होता है.
हालांकि, दिल्ली और दिल्ली-NCR जैसे बड़े शहरों में 'बिल्डर फ्लोर्स' खरीदते समय या किसी अन्य जगह खाली जमीन लेते समय अप्रूवल्स, चेन ऑफ डॉक्यूमेंट्स और स्थानीय निगमों के पैरामीटर्स बिल्कुल अलग और पेचीदा हो जाते हैं. इसलिए वहां टाइटल डीड, पूर्व लोन (NOC) और प्रॉपर्टी टैक्स की रसीदें जांचने में अतिरिक्त सावधानी बरतने की सख्त जरूरत होती है.
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