भारत के बड़े शहरों में अपने सपनों का आशियाना खरीदना आम आदमी के जीवन की सबसे बड़ी पूंजी और सबसे बड़ा सपना होता है, लेकिन आज यही सपना लाखों परिवारों के लिए एक कभी न खत्म होने वाला इंतजार बन चुका है.
मुंबई, दिल्ली-एनसीआर और बेंगलुरु जैसे महानगरों में नामी बिल्डरों के चमचमाते विज्ञापनों, बड़े-बड़े फिल्मी सितारों या भरोसेमंद चेहरों द्वारा किए जाने वाले प्रचार और आकर्षक 'नो ईएमआई टिल पजेशन' जैसे ऑफर्स के जाल में फंसकर लोग अपनी जिंदगी भर की कमाई दांव पर लगा देते हैं.
खरीदार अक्सर बिल्डर के रसूख और कागजी दावों की चकाचौंध में छिपे वित्तीय संकट, अधूरे प्रोजेक्ट्स के इतिहास और जमीनी हकीकतों को भांप नहीं पाते, जिसका नतीजा यह होता है कि भारी-भरकम बुकिंग राशि और बैंक लोन की किश्तें चुकाने के बाद भी वे सालों-साल सिर्फ कोर्ट-कचहरी और अधूरे ढांचे के चक्कर काटने को मजबूर हो जाते हैं. इस तरह के बड़े रियल एस्टेट फ्रॉड और गलत बिल्डरों के चंगुल से खुद को बचाने के लिए खरीदारों को बेहद सतर्क और कानूनी रूप से जागरूक होने की जरूरत है.
आजतक रेडियो के शो प्रॉपर्टी से फायदा में रियल एस्टेट एक्सपर्ट प्रदीप मिश्रा ने बताया कि बिल्डर के फ्रॉड से कैसे बचें वो बताते हैं- 'रेरा (RERA) निश्चित रूप से खरीदारों के लिए एक बहुत बड़ा सुरक्षा कवच है, लेकिन यह कोई अचूक या 'कम्प्लीट शील्ड'नहीं है, जिसके भरोसे आंखें मूंदकर बैठ जाया जाए.' प्रदीप मिश्रा ने साफ किया है कि गुरुग्राम जैसे शहरों में रेरा रजिस्ट्रेशन होने के बावजूद कई अफोर्डेबल हाउसिंग प्रोजेक्ट्स अटके हुए हैं. क्योंकि कुछ डेवलपर्स ने फर्जी दस्तावेज जमा करके भी रेरा नंबर हासिल कर लिया.
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फ्रॉड से कैसे बचें
वो बताते हैं जब हम ₹100 की छोटी सी चीज खरीदते वक्त भी इतनी जांच-पड़ताल और मोलभाव करते हैं, तो जिंदगी भर की सबसे बड़ी एसेट खरीदते समय सिर्फ सरकारी सर्टिफिकेट पर भरोसा करना समझदारी नहीं है. मौजूदा समय में रेरा के सामने मैनपावर की कमी, फैसलों में देरी और आदेशों को जमीनी स्तर पर लागू न करवा पाने जैसी बड़ी चुनौतियां हैं, जिससे बिल्डरों के मन से रेरा का डर धीरे-धीरे कम हो रहा है. इसलिए, धोखाधड़ी से बचने की असली जिम्मेदारी खुद खरीदार की है, क्योंकि पैसा आपका लग रहा है, किसी और का नहीं.
प्रदीप बताते हैं बिल्डर या प्रोजेक्ट के 'रेड फ्लैग्स' को पहचानने और खुद को सुरक्षित रखने के लिए खरीदारों को अपने स्तर पर कड़े कदम उठाने होंगे. किसी भी प्रोजेक्ट में निवेश करने से पहले डेवलपर के वित्तीय रिकॉर्डऔर उस पर मौजूद कर्ज की गहराई से जांच करें. केवल नए-नवेले चमचमाते और पेंट किए हुए प्रोजेक्ट्स को देखकर न बहकें, बल्कि उस बिल्डर द्वारा पहले डिलीवर किए जा चुके प्रोजेक्ट्स में खुद जाएं और वहां रह रहे लोगों से वास्तविक फीडबैक लें कि बिल्डर की 'आफ्टर सेल्स सर्विस' और कंस्ट्रक्शन क्वालिटी कैसी है, क्योंकि कई सोसायटियां 3-4 साल में ही जर्जर होने लगती हैं.
इसके अलावा, सबसे महत्वपूर्ण कदम यह है कि आप जमीन के मालिकाना हक यानी 'टाइटल डीड' को खुद अपने स्तर पर वेरीफाई करें. रेरा को एक बेंचमार्क या शुरुआती फिल्टर जरूर मानें, लेकिन अंतिम फैसला लेने से पहले जमीनी हकीकतों, कागजातों और बिल्डर के पिछले रिकॉर्ड की खुद तस्दीक करना ही फ्रॉड से बचने का एकमात्र अचूक तरीका है.
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