भारत में घर खरीदने के लिए ज्यादातर लोग लोन लेते हैं. जिसके लिए सालों-साल हर महीने ईएमआई भरने का एक लंबा सिलसिला चलता है, लेकिन जिंदगी हमेशा एक जैसी नहीं चलती, नौकरी छूटना, बिजनेस में भारी घाटा, या कोई गंभीर मेडिकल इमरजेंसी जैसी अप्रत्याशित परिस्थितियां किसी के भी सामने आ सकती हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि अगर कोई व्यक्ति लगातार अपनी होम लोन की किस्तें नहीं चुका पाता, तो क्या बैंक तुरंत उसके घर को जब्त कर उसे सड़क पर ला खड़ा करता है. आइए समझते हैं कि होम लोन डिफॉल्ट के मामलों में कानूनी प्रक्रिया क्या है और एक उपभोक्ता के रूप में आपके पास क्या रास्ते होते हैं.
जब आपकी ईएमआई मिस होती है, तो बैंक सीधे आपके घर पर ताला नहीं लगाता, इसके लिए एक पूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य होता है. अगर आपकी एक या दो किस्तें मिस हुई हैं, तो बैंक इसे एक अस्थायी समस्या मानता है. इस दौरान बैंक आपको एसएमएस, ईमेल या फोन कॉल के जरिए याद दिलाता है. इसे 'माइनर डिफॉल्ट' की श्रेणी में रखा जाता है. इस चरण पर बैंक केवल आपसे लेट पेमेंट पेनल्टी वसूलता है.
अगर आप लगातार 3 महीने तक एक भी ईएमआई नहीं चुकाते हैं, तो आरबीआई (RBI) के दिशा-निर्देशों के अनुसार बैंक आपके लोन अकाउंट को NPA (Non-Performing Asset) घोषित कर देता है. असली कानूनी कार्रवाई यहीं से शुरू होती है. लोन अकाउंट के एनपीए बनने के बाद बैंक सरफेसी एक्ट, 2002 (SARFAESI Act) के तहत कार्रवाई शुरू करता है. यह कानून बैंकों को अदालत जाए बिना बंधक रखी गई संपत्ति को अपने नियंत्रण में लेने का अधिकार देता है.
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इसके तहत बैंक सबसे पहले कर्जदार को धारा 13(2) के तहत 60 दिनों का डिमांड नोटिस भेजता है. इस नोटिस में साफ लिखा होता है कि आपके पास अपने सभी बकाये का भुगतान करने के लिए 60 दिन का समय है.
पजेशन और ऑक्शन का नोटिस
यदि कर्जदार उन 60 दिनों के भीतर भी भुगतान नहीं करता या बैंक को कोई संतोषजनक जवाब नहीं देता, तो बैंक संपत्ति का सिंबॉलिक पजेशन ले लेता है. इसके बाद बैंक संपत्ति के मूल्यांकन के बाद एक 30 दिनों का पब्लिक ऑक्शन नोटिस जारी करता है. यानी एनपीए घोषित होने के बाद भी कानूनन आपको लगभग 105 दिनों का ग्रेस पीरियड मिलता है, जिससे पहले बैंक आपकी संपत्ति को नीलाम नहीं कर सकता.
डिफॉल्ट होने पर भी आपके पास होते हैं ये अधिकार
एक कर्जदार के रूप में आपको यह जानना बेहद जरूरी है कि डिफॉल्टर होने के बाद भी कानूनन आपके मानवाधिकार या कानूनी अधिकार खत्म नहीं होते. बैंक बिना पूर्व लिखित नोटिस दिए आपकी संपत्ति पर कब्जा नहीं कर सकता. नीलामी से पहले अखबारों में विज्ञापन देना और आपको रिजर्व प्राइस की जानकारी देना अनिवार्य है. मान लीजिए आपका लोन बकाया ₹40 लाख था और बैंक ने आपके घर को ₹60 लाख में नीलाम किया. ऐसी स्थिति में बैंक नीलामी के खर्च और अपने ₹40 लाख काटने के बाद, बचे हुए ₹20 लाख आपको लौटाने के लिए कानूनी रूप से बाध्य है.
आरबीआई (RBI) की गाइडलाइंस के अनुसार, बैंक के रिकवरी एजेंट आपको मानसिक रूप से प्रताड़ित या डरा-धमका नहीं सकते. वे केवल सुबह 8 बजे से शाम 7 बजे के बीच ही आपसे संपर्क कर सकते हैं. दुर्व्यवहार की स्थिति में आप शिकायत कर सकते हैं. यदि आपको लगता है कि बैंक ने गलत तरीके से कार्रवाई की है, तो सरफेसी एक्ट की धारा 17 के तहत आप बैंक के नोटिस के खिलाफ 45 दिनों के भीतर डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल (DRT) में अपील दायर कर सकते हैं.
जब्ती और नीलामी से बचने के क्या उपाय हैं?
अगर आप सचमुच वित्तीय संकट में हैं, तो बैंक से भागने या छिपने के बजाय सीधे संवाद करना सबसे समझदारी भरा कदम है. बैंक भी कानूनी पचड़ों और नीलामी से बचना चाहते हैं, इसलिए वे कुछ विकल्प देते हैं.
लोन रीस्ट्रक्चरिंग: आप बैंक से लोन की अवधि बढ़ाने का अनुरोध कर सकते हैं. इससे आपकी मासिक ईएमआई का बोझ कम हो जाएगा.
मोरेटोरियम या ग्रेस पीरियड: यदि आपकी नौकरी चली गई है, तो आप बैंक को जेनुइन प्रूफ दिखाकर कुछ महीनों की मोहलत मांग सकते हैं, जहां आपको केवल ब्याज या कुछ समय के लिए कोई भुगतान नहीं करना होता.
संपत्ति खुद बेचना: अगर आपको लगता है कि आप आगे ईएमआई नहीं दे पाएंगे, तो बैंक की सहमति से आप खुद उस मकान के लिए खरीदार ढूंढ सकते है. खुद बेचने पर आपको बाजार की सही कीमत मिलेगी, जिससे आप बैंक का लोन चुकाकर बची हुई रकम अपने पास रख सकते हैं.
बैंक का अंतिम उद्देश्य आपका घर छीनना नहीं, बल्कि अपना पैसा वसूलना होता है. इसलिए, होम लोन डिफॉल्ट होने पर घर तुरंत जब्त नहीं होता.
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