खिचड़ी के बीच बिहार में क्यों है दही चूड़ा खाने की परंपरा... इमोशन से भरी इस प्लेट का क्या है इतिहास

दही-चूड़ा भारत की प्राचीन धान आधारित कृषि सभ्यता का हिस्सा है, जो यात्रा, संरक्षण और सामाजिक समरसता का प्रतीक रहा है. यह भोजन न केवल पोषण देता है बल्कि लोकसंस्कृति, धार्मिक अनुष्ठान और सामूहिक उत्तरदायित्व को भी दर्शाता है.

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बिहार में दही चूड़ा खाने की परंपरा रही है बिहार में दही चूड़ा खाने की परंपरा रही है

विकास पोरवाल

  • नई दिल्ली,
  • 15 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 10:03 AM IST

दही-चूड़ा का मूल भारत की धान आधारित कृषि सभ्यता में है. गंगा, कोसी, सोन, गंडक और महानदी की घाटियां, जो हजारों वर्षों से अपनी उपजाऊ मिट्टी में धान उगाती रही हैं, वहां की जमीन में सहजता के साथ चिवड़े का विकास हुआ. धान को वेदों में धन का प्रतीक, समृद्धि और ऐश्वर्य से जोड़कर देखा गया है. ऋग्वेद के श्रीसूक्त में धन की देवी श्री (लक्ष्मी) को धान्या भी कहा गया है और उनसे कामना की गई है कि धान के भंडार हमेशा भरे रहें. इसलिए धान ही धन रहा है. जब मुद्रा (रुपये-पैसे) का चलन नहीं था तो समाज के बहुत बड़े हिस्से के लिए धान ही लेन-देन का जरिया था. 
 
इसी धान को भूनकर, कूटकर और चपटा कर लेना केवल भोजन की तकनीक नहीं थी, बल्कि भविष्य की भूख से सुरक्षा का उपाय था. चूड़ा महीनों तक सुरक्षित रहता, हल्का होता और यात्रा में आसानी से ले जाया जा सकता था. यात्राएं जो भारतीय दर्शन का हिस्सा हुआ करती थीं और इन यात्राओं में ऊर्जा देने वाला साथी था चूड़ा.

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एतरेय ब्राह्मण में यात्रा का दर्शन
एतरेय ब्राह्मण में सूक्ति है 'चरैवेति, चरैवेति!' यानी चलते रहो, चलते रहो. क्योंकि चलना ही ज्ञान पाने का तरीका है. चलते रहने वाला मधुर फल पाता है, चलते रहने वाला मीठे अंजीर का स्वाद चखता है. सूर्य के इस सौंदर्य को देखो, जो चलते रहने के कारण कभी थकता नहीं है और कोई उससे आंखें नहीं मिला सकता है.

यात्रा और दर्शन की इस संस्कृति को धान या चूड़े ने ही जिंदा रखा है. धान स्थिर संपत्ति का प्रतीक रहा है और चूड़ा उस स्थिरता को संजोये रखने का जरिया. दूसरी ओर, दही भारतीय पशुपालन संस्कृति का प्रतीक है. ऋग्वेद में ‘दधि’ का जिक्र केवल भोजन के रूप में नहीं, बल्कि शुद्धता और सात्त्विकता के प्रतीक के रूप में मिलता है. ब्राह्मण ग्रंथों और गृह्यसूत्रों में दही को शुभ माना गया, यज्ञ, व्रत और अतिथि-सत्कार में इसका स्थान रहा. जब धान की स्थिरता और दही की पवित्रता एक साथ मिली, तब दही-चूड़ा जैसा लोकभोज जन्मा.

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लोक संस्कृति का भोजन है दही चूड़ा
दही-चूड़ा लोकसंस्कृति का ऐसा भोजन है जो केवल स्वाद या पोषण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समय, समाज और याद को अपने भीतर समेट कर बढ़ता रहा. यह किसी शाही रसोई की खोज नहीं, न किसी महान रसोइए की ईजाद, इसका जन्म खेत, खलिहान, पशुपालन, यात्रा और साधना के बीच हुआ. यही कारण है कि दही-चूड़ा को समझने के लिए इतिहास के पन्नों के साथ-साथ लोककथाओं, यात्रियों के वृत्तांत और ग्रामीण जीवन की परतों में उतरना पड़ता है.

मेगस्थनीज अपनी भारत यात्रा के दस्तावेजों में दर्ज करता है कि आम भारतीय समाज सिर्फ बोलचाल, बात-व्यवहार में ही सरल नहीं है. वह खाने-पीने की आदतों में भी सरल है.यात्री एक पोटली में चावल को अलग-अलग किस्मों में रखते हैं और भूख लगने पर आराम से किसी पेड़ के नीचे या कुएं के पास खा सकते हैं. वह दूध पर बहुत निर्भर हैं जो उनके लिए आसानी से मिल जाता है.

दही-चूड़ा दोनों ही संरक्षण के प्रतीक है. दूध बहुत दिनों तक नहीं ठहर सकता, लेकिन जब इसे दही बना दिया जाए तो इसकी शेल्फ लाइफ दूध से अधिक हो जाती है. इसी तरह धान सीधे तौर पर तो नहीं खाया जा सकता है, लेकिन जब इसे उबालकर कूटकर चिवड़ा बना दिया जाए तो इसकी भी शेल्फ लाइफ लंबी हो जाती है. ऋग्वेद में जौ और चावल के भोजन का जिक्र है.
शतपथ ब्राह्मण में दही का प्रयोग धार्मिक संदर्भों में मिलता है. लोकसंस्कृति अक्सर ग्रंथों के समानांतर चलती है. जो भोजन ऋषि आश्रमों और गृहस्थी में सहज था, वही आगे चलकर लोकभोज बना. चूड़ा, दरअसल, उसी चावल का लोक-रूप है जो बिना पकाए भी खाया जा सकता है.

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प्राचीन और मध्यकालीन भारत में यात्राएँ लंबी और कठिन होती थीं, ऐसे में जो भोजन जल्दी उपलब्ध हो, हल्का हो, बिना आग के खाया जा सके वही जीवनरक्षक बनता था.

संयम और करुणा का भोजन दही चूड़ा
लोककथाओं में दही-चूड़ा अक्सर संयम और करुणा का भोजन बनकर आता है. एक लोकप्रसंग में कहा जाता है कि अकाल के समय गांव की स्त्रियों ने घर-घर से थोड़ा-थोड़ा चूड़ा और दही इकट्ठा कर लोगों को खिलाया. यह कथा बताती है कि दही-चूड़ा सामूहिक उत्तरदायित्व का प्रतीक रहा है. साधुओं और सन्यासियों के लिए भी यह प्रिय भोजन रहा, न पकाने का झंझट, न संग्रह का लोभ. दही-चूड़ा भारतीय लोकसमाज में बराबरी का भोजन है. न इसमें महंगे मसाले हैं, न शाही तामझाम. आप इसमें चाहकर भी कुछ जोड़ या घटा नहीं सकते हैं.

इसे काजू दही चूड़ा, केसर दही-चूड़ा वगैरह-वगैरह नहीं बनाया जा सकता है. यही अपनी सरल, सहज, सत्य की अवस्था में दही चूड़ा ही था और दही चूड़ा ही रहेगा. बिहार में कहा जाता है, 
'मेहमान दही-चूड़ा खा ले, तो घर का हो जाता है.' यह भोजन जाति, वर्ग और हैसियत की दीवारें गिरा देता है. यही कारण है कि यह लोकसंस्कृति में समरसता का प्रतीक बन गया. 

मकर संक्रांति सूर्य की पूजा, प्रकृति के सम्मान, खेती के आदर और नवान्न की संस्कृति का त्योहार है. इसलिए दही चूड़ा इस पूजा का प्रसाद है और बिहार की लोक परंपरा इस प्रसाद को सहजता के साथ स्वीकार करती है.

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