Kathia wheat: उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में उगाए जाने वाला कठिया गेहूं पूरे भारत में प्रसिद्ध है. यहां के किसान ऑर्गेनिक तरीके से इसकी खेती करते हैं. इस गेहूं का उपयोग लोग दलिया खाने में करते हैं. बुंदेलखंड के किसानों ने अब इसकी उत्पादकता बढ़ाने और इसे ODOP में शामिल कराने के लिए एक कार्यशाला का आयोजन किया. वर्कशाप में किसानों मे इस गेंहूं की खेती में आने वाली चुनौतियों का जिक्र किया. इस बीच जिला प्रशासन ने किसानों को कठिया गेहूं पर उचित मूल्य दिलाने का वादा किया.
इस गेहूं के उत्पादन में क्यों आई कमी
किसान अवधबिहारी कहते हैं कि कठिया गेंहू के उत्पादन कैसे बढ़ाया जाए, इसको लेकर एक मीटिंग का आयोजन किया गया है. किसान के बीच इसकी खेती दो कारणों से बंद हुई है. सबसे पहला उत्पादन में कमी आना, दूसरा नए तरीके के गेहूं आना, जिनमें कठिया गेहूं के मुकाबले उत्पादन क्षमता अधिक है. ऐसे में ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए किसान कठिया गेहूं की खेती को तरजीह नहीं देते हैं. इसके अलावा कठिया गेंहू में तमाम रस्ट भी लगता था, जिसे गेरुवा भी बोलते हैं जिससे इसका उत्पादन कम होता था गेंहू नष्ट हो जाता था. इस कारण किसानों ने इसे बोना बन्द कर दिया.
कई बीमारियों के खिलाफ असरदार
कठिया गेहूं कई बीमारियों के खिलाफ असरदार है. गैस की बीमारी के दौरान इस गेहूं के सेवन की सलाह दी जाती है. इसमें भरपूर मात्रा में कार्बोहाइड्रेट, विटामिन A, फाइबर, ऑक्सीडेंट भी मौजूद है. साथ ही इसका उपयोग उपयोग बिस्किट, सूजी, दलिया, उपमा आदि के रूप में किया जाता है. दक्षिण भारत में लोग इसको नाश्ते के रूप में प्रयोग करते हैं. इसकी उत्पादकता प्रति बीघे 2 कुंतल से 25 कुंतल तक है. बाजार में इसकी कीमकत 3500 रु प्रति कुंतल है.
दिया गया नया ब्रांड नाम
इस कार्यशाला में बांदा जिले के डीएम ने अधिकारियों ने इस गेहूं को खरीदने की बात कही थी. ऐसा करने से किसानों को गेहूं पर उचित मूल्य मिलेगा और आय भी दोगुनी होगी. कार्यशाला में इस गेंहू को "कठिया पेट की लाल दवा" नाम से नया ब्रांड नाम दिया गया. इस दौरान किसानों ने प्रशासन से इस गेहूं को ODOP प्रोडक्ट्स में शामिल करने की बात कही है.