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पराली को खाद में बदलने वाले बायो डिकम्पोजर की बढ़ी डिमांड

वैज्ञानिकों ने बताया कि दिल्ली में सफल प्रयोग के बाद उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब के किसान भी अब पूसा इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों से बायो डिकम्पोजर की डिमांड कर रहे हैं.

दोगुनी हो गई कीमत भी दोगुनी हो गई कीमत भी
स्टोरी हाइलाइट्स
  • यूपी, पंजाब और हरियाणा से भी डिमांड
  • चार कैप्सूल की कीमत अब हुई दोगुनी

पराली को खाद में बदलने वाले बायो डिकम्पोजर की डिमांड अब बढ़ गई है. दिल्ली में साल 2020 में ऐसे कैप्सूल तैयार किए गए जिनका घोल बनाकर छिड़काव करने से खेतों की पराली कुछ हफ्तों में खाद बन गई थी. 'आजतक' ने शनिवार को भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (पूसा इंस्टीट्यूट) के माइक्रो बायोलॉजी विभाग के वैज्ञानिकों से खास बातचीत की. बातचीत के दौरान वैज्ञानिकों ने बताया कि दिल्ली में सफल प्रयोग के बाद उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब के किसान भी अब पूसा इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों से बायो डिकम्पोजर की डिमांड कर रहे हैं.

पूसा इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों के मुताबिक पिछले साल की तुलना में बायो डिकम्पोजर कैप्सूल की कीमत भी इस साल दोगुनी हो गई है. भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान की प्रधान वैज्ञानिक लिवलीन शुक्ला ने 'आजतक' को बताया कि दिल्ली में इस साल चार हजार एकड़ से ज्यादा खेत में बायो डिकम्पोजर के छिड़काव की मांग आई है. हालांकि रिसर्च इंस्टीट्यूट में अधिक मात्रा में प्रोडक्शन नहीं किया जा सकता इसलिए मांग को पूरा करने के लिए 12 कंपनियों को इसके निर्माण का लाइसेंस दिया गया है. बायो डिकम्पोजर खरीदने के लिए अब किसान डायरेक्ट कंपनियों से भी संपर्क कर सकते हैं.

कृषि वैज्ञानिक के मुताबिक पंजाब और हरियाणा की सरकार ने पूसा इंस्टीट्यूट से संपर्क किया है. हरियाणा में 1 लाख एकड़ में बायो-डिकम्पोजर के छिड़काव की मांग की गई है. वहीं, पंजाब सरकार की तरफ से तीन हजार एकड़ में ट्रायल की मांग की गई है. पंजाब की कई प्राइवेट संस्था की ओर से भी 25 हजार एकड़ में छिड़काव की डिमांड आई है. सभी राज्यों की डिमांड पूरी कर दी गई है. साथ ही, पंजाब और उत्तर प्रदेश के सभी कृषि विज्ञान केंद्रों ने बायो डिकम्पोजर कैप्सूल की मांग की थी जिन्हें सप्लाई कर दी गई है.

चार कैप्सूल से हो सकता है ढाई एकड़ में छिड़काव

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक युद्धवीर सिंह ने बताया कि 4 कैप्सूल से 25 लीटर बायो डिकम्पोजर घोल बनाया जा सकता है. 25 लीटर घोल में 500 लीटर पानी मिलाकर ढाई एकड़ खेत में छिड़काव किया जा सकता है. पराली या गन्ने के अवशेष को गलाने के लिए बायो-डिकम्पोजर का इस्तेमाल किया जाता है. धान या गन्ने की कटाई के तुरंत बाद बायो डिकम्पोजर का छिड़काव करना होता है. छिड़काव करने के बाद पराली को जल्द से जल्द मिट्टी में मिलाना या जुताई करनी होती है.

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक ने बताया कि पिछले साल 20 रुपये के मुकाबले इस साल चार कैप्सूल की कीमत 40 रुपये हो गई है. गौरतलब है कि पराली को खाद में बदलने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने चार कैप्सूल का एक पैकेट तैयार किया है. ये कैप्सूल 5 जीवाणुओं को मिलाकर बनाया गया है जो खाद बनाने की रफ्तार को तेज करता है. प्रधान वैज्ञानिक युद्धवीर सिंह के मुताबिक चार कैप्सूल से छिड़काव के लिए 25 लीटर घोल बनाया जा सकता है.

कैसे बनता है घोल

घोल बनाने के लिए सबसे पहले पांच लीटर पानी मे सौ ग्राम गुड़ उबाला जाता है और ठंडा होने के बाद घोल में 50 ग्राम बेसन मिलाकर कैप्सूल घोलना होता है. इसके बाद घोल को 10 दिन तक एक अंधेरे कमरे में रखा जाता है जिसके बाद पराली पर छिड़काव के लिए बायो-डिकम्पोजर घोल तैयार हो जाता है. इस घोल को जब पराली पर छिड़का जाता है तो 15 से 20 दिन के अंदर पराली गलनी शुरू हो जाती है और किसान अगली फसल की बुआई आसानी से कर सकता है. आगे चलकर यह पराली पूरी तरह गलकर खाद में बदल जाती है और खेती में फायदा देती है.

 

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