इजरायल की जनता 6 महीने के अंदर दूसरी बार आम चुनाव के लिए अपने वोट का इस्तेमाल करेगी. यहां पर 17 सितंबर को वोट डाले जाएंगे. ये मतदान तब हो रहा है जब अप्रैल में हुए चुनाव के बाद प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू गठबंधन सरकार बनाने में असफल रहे थे. बेंजामिन नेतन्याहू अगर इस बार फिर जीत हासिल कर लेते हैं तो वो पांचवीं बार प्रधानमंत्री बनेंगे.
दक्षिणपंथी लिकुड पार्टी का नेतृत्व करने वाले नेतन्याहू के सामने पूर्व सैन्य प्रमुख बेनी गैंट्ज़ हैं. गैंट्ज ने इजरायल के पूर्व वित्त मंत्री और टीवी पर्सनालिटी यैर लापिड के साथ सेंट्रिस्ट ब्लू एंड वाइट गठबंधन का नेतृत्व किया.
इजरायल के चुनाव पर भारत की भी नजर
इजरायल के चुनाव पर भारत की भी नजर है. केंद्र की मोदी सरकार बेंजामिन नेतन्याहू के फिर से पीएम बनने की कामना करती होगी. क्योंकि अगर नेतन्याहू फिर से पीएम बनते हैं तो रिश्तों को नए सिरे से बनाने की जरूरत नहीं होगी.
पीएम मोदी और बेंजामिन नेतन्याहू की दोस्ती पूरी दुनिया जानती है. दोनों देशों के संबंध बहुत अच्छे हैं. दोनों देशों के हालिया वर्षों में आर्थिक, सैन्य, सामरिक संबंध बहुत ऊंचे स्तर पर पहुंच गए हैं. पीएम नरेंद्र मोदी ने 2019 लोकसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत हासिल की थी, तब वैश्विक नेताओं में सबसे पहले बेंजामिन नेतन्याहू ने ही उन्हें बधाई दी थी.
वहीं इजरायल में आम चुनावों के बीच एक बैनर भी खूब वायरल हुआ. बैनर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके समकक्ष बेंजामिन नेतन्याहू साथ दिख रहे थे. इजरायल के पत्रकार अमीचाई स्टेन ने इस बैनर की तस्वीर पोस्ट की थी. यह बैनर एक बिल्डिंग के बाहर लगा था.
आइए जानते हैं इजरायल चुनाव से जुड़ी बड़ी बातें
9 अप्रैल को हुए चुनाव में नेतन्याहू की लिकुड पार्टी ने 120 में से 36 सीटों पर कब्जा किया. जो गैंट्ज़ की ब्लू एंड वाइट पार्टी से एक अधिक थी. नेतन्याहू को सरकार बनाने के लिए जनादेश तो मिला, लेकिन गठबंधन की सरकार ज्यादा दिन नहीं चल पाई और मई महीने में संसद को भंग कर दिया गया.
17 सितंबर को होने वाला चुनाव पार्टियों को सरकार बनाने का दूसरा मौका देगा. इजरायल के एक राजनीतिक विश्लेषक के मुताबिक, इस बार भी कुछ ज्यादा बदलने वाला नहीं है. माना जा रहा है कि नतीजे अप्रैल में हुए चुनाव की तरह ही होंगे.
इजरायल के स्थानीय मीडिया ने पिछले हफ्ते 2 पोल सर्वे किए थे. इसके मुताबिक, लिकुड पार्टी को 32 सीट मिल रही हैं जो ब्लू और वाइट से सिर्फ एक ज्यादा है.
इजरायल में कभी भी कोई एक पार्टी अकेले सरकार बनाने में सफल नहीं रही है. ऐसे में यहां पर गठबंधन की सरकार बनाना आम बात है. सबसे अधिक सीटें जीतने वाली पार्टी के नेता को आमतौर पर नई सरकार बनाने के लिए इजरायल के राष्ट्रपति निमंत्रण देते हैं.
अगर नेता 61 सीटें हासिल करने के लिए ज्यादा से ज्यादा पार्टियों को एकसाथ लाने में असफल रहता है तो ऐसे में राष्ट्रपति किसी और मौका देते हैं. इस वजह से पार्टी का नेता जो चुनाव जीता हो जरूरी नहीं है कि वही प्रधानमंत्री बनेगा.
प्रधानमंत्री बनने के लिए नेतन्याहू को दक्षिणपंथी गुटों के समर्थन की ज़रूरत है, जिससे वह 61 सीटों के साथ सरकार बनाने में सफल रहें. वहीं गैंट्ज़ को बहुमत पाने के लिए सेंटर-लेफ्ट ब्लॉक्स और अरब ज्वाइंट लिस्ट के समर्थन की जरूरत होगी. लेकिन इजरायली मीडिया के हाल के पोल के मुताबिक नेतन्याहू को 56 सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि गैंट्ज की पार्टी को 55 सीटें मिल सकती हैं.
विश्लेषकों के मुताबिक न तो नेतन्याहू और न ही गैंट्ज़ गठबंधन सरकार बनाने में सफल होंगे.
इजरायल के मतदाताओं में फिलिस्तीनियों की भी अच्छी खासी संख्या है. इसमें मुस्लिम, ईसाई और ड्रूज़ शामिल हैं. इनमें से ज्यादातर पारंपरिक रूप से अरब जॉइंट लिस्ट को वोट डालते हैं. बता दें कि अरब जॉइंट लिस्ट अरब के 4 दलों का चुनावी गठबंधन है. अप्रैल में हुए मतदान से पहले ये दो समूह में विभाजित हो गए थे. लेकिन इस बार सभी एकसाथ हैं.
इजरायल-फिलिस्तीनी शांति प्रक्रिया को इस बार के चुनावी बहस में प्रमुखता से जगह नहीं मिली है. विश्लेषकों का कहना है कि यह मुद्दा बहुत विवादास्पद है. विश्लेषकों के मुताबिक हालांकि इजरायल को फिलिस्तीनियों के साथ स्थायी शांति बनाने का अवसर मिला. इस मुद्दे को राजनीतिक दलों और उनके अभियान संदेश में हल्के ढंग से बताया गया.
नेतन्याहू का भविष्यजुलाई माह में बेंजामिन नेतन्याहू सबसे लंबे समय तक इजरायल के प्रधानमंत्री पद पर रहने वाले नेता बने. उन्होंने देश के संस्थापक रहे डेविड बेन-गुरियन को पछाड़ा. इस बार का चुनाव नेतन्याहू के लिए भी सबसे अहम है. वह न केवल वर्षों में अपने सबसे कठिन प्रतिद्वंद्वी के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं, बल्कि भ्रष्टाचार के आरोपों में शामिल होने के आरोपों का भी सामना कर रहे हैं.