ईरान और अमेरिका में जंग की आहट सुनाई देने लगी है. ईरान के पास अरब सागर में अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर USS अब्राहम लिंकन पहले ही तैनात हो चुका है और अब अमेरिका ने एक और विमानवाहक पोत ईरान के लिए रवाना कर दिया है. दो अमेरिकी अधिकारियों ने न्यूज एजेंसी रॉयटर्स को बताया कि दुनिया का सबसे बड़ा विमानवाहक पोत USS गेराल्ड आर. फोड मिडिल ईस्ट के लिए रवाना हो चुका है.जिसमें हजारों सैनिक, लड़ाकू विमान, गाइडेड मिसाइल सहित कई हथियार भेजे गए हैं.
अमेरिकी अधिकारियों ने रॉयटर्स को बताया कि अमेरिकी सेना ईरान के खिलाफ हफ्तों तक चलने वाले संभावित सैन्य अभियान की तेजी से तैयारी कर रही हैं और अगर राष्ट्रपति ट्रंप हमले का आदेश देते हैं तो ये संघर्ष दोनों देशों के बीच पहले देखे गए संघर्षों से कहीं अधिक गंभीर हो सकता है.
इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ समझौता करना मुश्किल रहा है. ऐसे में ईरान में सत्ता बदलाव के विचार का समर्थन करना ही अच्छा है. ट्रंप ने कहा, 'मुझे लगता है कि ईरान में सत्ता परिवर्तन के विचार का समर्थन करना सबसे अच्छी बात होगी. 47 सालों से वो बातें करते आ रहे हैं. हमारे पास जबरदस्त ताकत है. जैसा कि आप जानते हैं एक और बहुत बड़ा विमानवाहक पोत रवाना हो रहा है तो हम देखेंगे कि क्या होता है. अगर हम इस मुद्दे को हमेशा के लिए सुलझा सकें तो ये अच्छा होगा.'
इजरायल भी होगा जंग में शामिल
अमेरिका अपना सबसे बड़ा युद्धपोत ईरान की ओर ऐसे समय में रवाना किया है जब हाल ही में व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति ट्रंप ने इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से मुलाकात की थी. इस मुलाकात में ईरान और अमेरिका के बीच ओमान की राजधानी मस्कट में हुई बातचीत पर चर्चा हुई थी. मेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस मुलाकात में ईरान पर संभावित हमले पर भी बात हुई थी, कहा जा रहा है कि अमेरिका अगर ईरान पर हमला करता है तो इजरायल भी उसमें शामिल हो सकता है.
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आपको बता दें कि अमेरिका ईरान से परमाणु कार्यक्रम को छोड़ने और मिसाइल कार्यक्रम को सीमित करने की मांग कर रहा है जबकि ईरान इसके लिए तैयार नहीं हैं. ईरान का दावा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए हैं जबकि अमेरिका ईरान पर परमाणु बम बनाने का आरोप लगता रहा है. इस मुद्दे को लेकर मस्कट में हुई बातचीत के बाद दोनों पक्षों ने आगे की बातचीत जारी रखने की बात कही थी लेकिन अमेरिका की ओर से एक और युद्धपोत ईरान की ओर रवाना करने से हालात बदल गए हैं.
ऐसे में देखना होगा कि अमेरिका ईरान पर हमला करता है तो मध्य-पूर्व में क्या कुछ बदलता है. ईरान पहले ही कह चुका है अगर अमेरिका ने ईरान पर हमला किया तो तेहरान जवाब देने में तनिक भी देरी नहीं करेगा. कुछ दिन पहले कतर के चैनल अल जज़ीरा को दिए इंटरव्यू में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा था कि अमेरिकी धरती पर हमला करने के लिए ईरान के पास सैन्य क्षमता नहीं है, लेकिन मध्य-पूर्व में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया ही जा सकता है.
ईरान के विदेश मंत्री का अहम बयान
अमेरिका से बातचीत के बाद अपने देश लौटे ईरानी विदेश मंत्री ने एक प्रेस कॉन्फ्रेस में दावा किया था अमेरिका की गैर जरूरी मांगें और अनुचित दावे ही शांति के रास्ते में असली बाधा है. उन्होंने कहा कि अगर अमेरिका का नजरिया सम्मानजनक और निष्पक्ष हो तो दोनों देशों में समझौता हो सकता है.
अराघची ने इस बात पर भी जोर दिया था कि ईरान यूरेनियम संवर्धन सहित शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा के विकास और उपयोग के अपने अधिकार को कभी नहीं छोड़ेगा. उन्होंने ये भी कहा था कि ईरान का परमाणु हथियार बनाने का कोई इरादा नहीं है और परमाणु कार्यक्रम देश के ऊर्जा जरूरतों के लिए हैं. बता दें कि पिछले साल ईरान और इजरायल के बीच चले 12 दिनों युद्ध के दौरान अमेरिका ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर भारी बमबारी की थी और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को काफी नुकसान पहुंचाने का दावा किया था. वहीं ईरान ने पलटवार करते हुए कतर में मौजूद अमेरिकी सैन्य बेस पर हमले किए थे.पूरे मध्य-मध्य-पूर्व में कतर ही वो जगह है जहां पर ईरान का सबसे बड़ा मिलिट्री बेस है.
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पुरानी है अमेरिका और ईरान में दुश्मनी
अब आपको अमेरिका और ईरान में दुश्मनी की शुरूआत के बारे में बताते हैं. 1953 में अमेरिका और ईरान की दुश्मनी उस वक्त शुरू हुई जब अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआई ने ईरान में तख्तापलट करवा दिया था. तब निर्वाचित प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्दिक़ को गद्दी से हटाकर अमेरिका ने सत्ता ईरान के शाह रज़ा पहलवी के हाथ में सौंप दी. 1953 में ईरान में अमेरिका ने जिस तरह से तख्तापलट किया उसी का नतीजा थी 1979 की ईरानी क्रांति.
इस क्रांति की वजह से ही आयतुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी सत्ता में आए और ईरान में इस्लामिक शासन की शुरू हुई. वहीं, इस क्रांति के दौरान अमेरिका ईरान के शाह रज़ा पहलवी का समर्थन करता रहा जिसकी वजह से दोनों देशों में दुश्मनी बढी. इस दुश्मनी में आग में धी डालने का काम किया तेहरान में ईरानी छात्रों के एक समूह की ओर से अमेरिकी दूतावास को अपने कब्ज़े में लेना और 52 अमेरिकी नागरिकों को 444 दिनों तक बंधक बनाकर रखना.
कहा जाता है कि इसमें ख़ुमैनी का भी मौन समर्थन था. दूतवास पर कब्जा करने वाले छात्र अमेरिका से शाह पहलवी को ईरान भेजने की मांग कर रहे थे जोकि क्रांति के दौरान देश छोड़कर अमेरिका भाग गए थे. आगे चलकर ये दुश्मनी ईरान की ओर से परमाणु हथियार बनाए जाने की कोशिश की वजह से और बढ़ी जो अब तक जारी है.
(इनपुट- रविशंकर तिवारी)