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'यूरोप की इकॉनमी पर भी असर डाल रहा ईरान युद्ध...', राजदूत ने बताया क्या है जर्मनी का रुख

नई दिल्ली में इंडिया टुडे कॉन्क्लेव 2026 के दूसरे दिन जर्मनी, इटली और स्पेन के राजदूतों ने ईरान के परमाणु हथियारों को लेकर अपनी राय व्यक्त की. जर्मनी के राजदूत Dr Philipp Ackermann ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय चाहता है कि ईरान के पास परमाणु हथियार न हों.

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इंडिया टुडे कॉन्क्लेव 2026 में डॉ. फिलिप एकरमैन ने की शिरकत
इंडिया टुडे कॉन्क्लेव 2026 में डॉ. फिलिप एकरमैन ने की शिरकत

नई दिल्ली में हो रहे इंडिया टुडे कॉन्क्लेव 2026 का शनिवार को दूसरा दिन है. इस मौके पर देश-विदेश के राजनीतिक एक्सपर्ट, प्रतिनिधि, पॉलिटिकल लीडर, खिलाड़ी और  अभिनेता एक मंच पर जुड़ रहे हैं और तमाम जरूरी मुद्दे पर अपनी राय रख रहे हैं. 

इसी दौरान कार्यक्रम के एक खास सेशन 'AMBASSADORS’ DEBRIEF Europe & America: The Diplomatic Frontline' में भारत में जर्मनी के राजदूत  Dr Philipp Ackermann, भारत में इटली के राजदूत Antonio Bartoli और भारत में स्पेन के राजदूत Juan Antonio March Pujol ने शिरकत की.

इस दौरान विचार मंच पर सवाल निकलकर आया कि जर्मनी भी अमेरिका की तरह नहीं चाहता कि ईरान परमाणु शक्ति बने, लेकिन उसने इस युद्ध में सीधे सैन्य भागीदारी देने से इनकार कर दिया है. साथ ही जर्मनी ने यह भी कहा है कि ईरानी राज्य का पूरी तरह ढह जाना भी सही नहीं होगा. ऐसे में ईरान और इस युद्ध को लेकर जर्मनी का रुख क्या है?  इस सवाल पर जर्मनी के के राजदूत Dr Philipp Ackermann ने कहा कि लगभग पूरी दुनिया की राय है कि ईरान के पास परमाणु हथियार नहीं होने चाहिए. इसमें भारत, रूस, चीन समेत कई देश शामिल हैं। इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने मिलकर ऐसे समझौते बनाए थे, जिनका मकसद ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना था.

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इसी कोशिश के तहत 'Joint Comprehensive Plan of Action' (JCPOA) समझौता किया गया था, लेकिन डोनॉल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल में अमेरिका इस समझौते से बाहर हो गया. इसके बाद हालात धीरे-धीरे बिगड़ते गए और आज की स्थिति उसी का नतीजा है. जर्मनी के राजदूत Dr Philipp Ackermann ने कहा कि इस युद्ध का असर यूरोप की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है. ऊर्जा और ईंधन की कीमतें बढ़ गई हैं. यूरोप पहले से ही ऊर्जा संकट से जूझ रहा था और अब इस युद्ध के कारण आर्थिक सुधार की रफ्तार धीमी पड़ सकती है.

उन्होंने यह भी कहा कि यूरोप के लिए सबसे बड़ी चिंता अभी भी रूस-यूक्रेन युद्ध है. इसमें भी लगातार लोगों की जान जा रही है, लेकिन अचानक दुनिया का ध्यान इस संघर्ष से हटकर ईरान के युद्ध पर चला गया है. जर्मनी ने यह भी कहा कि अमेरिका ने रूसी तेल की खरीद को लेकर कुछ प्रतिबंधों में ढील दी है, जिससे यूरोप सहमत नहीं है. उनका मानना है कि ऐसे कदम युद्ध खत्म करने की कोशिशों को कमजोर कर सकते हैं.

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