बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले 13वें आम चुनाव से पहले आए एक ताज़ा ओपिनियन पोल ने देश की सियासी तस्वीर लगभग साफ कर दी है. देशव्यापी सर्वे में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) को प्रचंड बहुमत की ओर बढ़ते हुए दिखाया गया है.
आगामी राष्ट्रीय चुनावों को लेकर 'एमिनेंस एसोसिएट्स फॉर सोशल डेवलपमेंट' (EASD) द्वारा जारी किए गए हालिया ओपिनियन पोल ने चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए हैं. सर्वे के अनुसार, करीब 70 प्रतिशत मतदाता चाहते हैं कि अगली सरकार खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) बनाए.
जमात-ए-इस्लामी दूसरे नंबर पर है. सर्वे में 'जमात-ए-इस्लामी' 19 प्रतिशत समर्थन के साथ दूसरे सबसे लोकप्रिय दल के रूप में उभरा है. अन्य दलों की स्थिति काफी कमजोर नजर आ रही है. नई बनी 'नेशनल सिटीजन पार्टी' (NCP) को महज 2.6 प्रतिशत और जातीय पार्टी को 1.4 प्रतिशत वोट मिलने का अनुमान है.
अवामी लीग के समर्थकों ने छोड़ा हसीना का साथ
सर्वे का सबसे चौंकाने वाला पहलू शेख हसीना की पार्टी 'अवामी लीग' के पूर्व समर्थकों का रुख है. आंकड़ों के मुताबिक, अवामी लीग के पुराने वोटर्स में से 60 प्रतिशत अब बीएनपी को वोट देने के इच्छुक हैं, जबकि 25 प्रतिशत ने जमात-ए-इस्लामी का हाथ थामने की बात कही है.
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क्षेत्रीय स्तर पर राजशाही और चटगांव डिवीज़न में बीएनपी का दबदबा सबसे ज्यादा (74%) है. वहीं, महिला मतदाताओं के बीच भी पार्टी काफी लोकप्रिय है, जहां 71 प्रतिशत महिलाएं बीएनपी के समर्थन में खड़ी हैं.
सर्वे के अनुसार, 77% मतदाताओं को भरोसा है कि BNP अगली सरकार बनाएगी वहीं 74% लोग मानते हैं कि उनके क्षेत्र में भी BNP उम्मीदवार जीतेंगे
पोल से यह भी पता चलता है कि उन मतदाताओं में भी महत्वपूर्ण बदलाव आया है जिन्होंने पहले अवामी लीग (AL) का समर्थन किया था. सर्वे किए गए पूर्व अवामी लीग वोटर्स में से 60 प्रतिशत ने कहा कि वे आने वाले चुनाव में BNP को वोट देने के इच्छुक हैं, जबकि 25 प्रतिशत ने जमात-ए-इस्लामी को समर्थन दिया. बाकी 15 प्रतिशत ने संकेत दिया कि वे दूसरी राजनीतिक पार्टियों को वोट देंगे.
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कुल मिलाकर, सर्वे से एक ऐसे राजनीतिक माहौल की तस्वीर सामने आती है जिस पर BNP का दबदबा है, और कई क्षेत्रों में जमात-ए-इस्लामी मुख्य वैकल्पिक शक्ति के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर रही है, क्योंकि राष्ट्रीय चुनावों से पहले वोटर्स की पसंद लगातार बदल रही है. यह सर्वे 20 दिसंबर से 1 जनवरी के बीच किया गया. इस दौरान 300 संसदीय क्षेत्रों के करीब 20,495 लोगों से बातचीत की गई.