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11 जनवरी 1945... वो दिन, जब सिमरधा ने अंग्रेजों के सामने नहीं झुकाया सिर, लाठियां और कोड़े खाए

11 जनवरी 1945. उत्तर प्रदेश में झांसी जिले के गरौठा इलाके का सिमरधा गांव. अंग्रेजों के फरमान के खिलाफ एक गांव का सामूहिक विद्रोह इतिहास में दर्ज है. उस दिन इस गांव में बगावत की आग ऐसी सुलगी कि चूल्हे नहीं जले, घर खाली रहे और अंग्रेजों ने बर्तन-भाडे़ तक बाहर फेंक दिए. आतंक से सहमे लोग खेत-खलिहानों में छिपे रहे. अंग्रेजी जुल्म के खिलाफ यह द्वितीय विश्व युद्ध के लिए 'न पाई, न भाई' देने के ऐलान का नतीजा था.

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साल 1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सिमरधा कांड में भूमिका निभाने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया था.
साल 1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सिमरधा कांड में भूमिका निभाने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया था.

11 जनवरी 1945 की यह गौरव गाथा ग्राम सिमरधा को आज भी गौरवान्वित करती है. आजादी की जंग में इस गांव के स्वतंत्रता सेनानियों ने जान की परवाह नहीं की. हालात ऐसे बने कि घरों में चूल्हे तक नहीं जले, पूरा गांव खाली हो गया, लोग खेतों और फसलों के बीच छिप गए, लेकिन आजादी तक पहुंचने की आग उनके दिलों में बुझी नहीं.

11 जनवरी को सिमरधा के लिए सिर्फ एक तारीख नहीं है. यह वह दिन है, जिसे गांव आज भी सबसे काले दिन के रूप में याद करता है, लेकिन इसी दिन ने सिमरधा को इतिहास में अमर भी कर दिया. इस दिन अंग्रेजी हुकूमत ने वो जुल्म किया, जिसे सुनकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं.

अंग्रेजों के जुल्मों का गवाह है सिमरधा

उस दौर में पूरा देश अंग्रेजों के खिलाफ तन-मन से आजादी की अलख जगाने में जुटा था. बुंदेलखंड की धरती पहले से ही बगावत की आग में तप रही थी. सिमरधा भी उसी आग का एक बड़ा केंद्र था.

अंग्रेजी हुकूमत ने इंकलाब की आवाज दबाने के लिए पंडित काशीप्रसाद द्विवेदी समेत दर्जनों नौजवानों को तोड़ने की हरसंभव कोशिश की, लेकिन भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों का बलिदान और साहस अंग्रेजी अत्याचारों पर भारी पड़ा.

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simardha kand

'अंग्रेज वार कांड' और न पाई-न भाई का ऐलान

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने फरमान जारी किया कि हर गांव से, हर घर एक पाई और एक भाई लिया जाएगा. पाई चंदे के रूप में और भाई अंग्रेजी सेना में भर्ती के लिए.

सिमरधा ने इस फरमान को मानने से साफ इंकार कर दिया. गांव के लोगों ने पंडित काशीप्रसाद द्विवेदी के नेतृत्व में कहा- न पाई देंगे, न भाई देंगे.

यही वाक्य अंग्रेजों के लिए बगावत का ऐलान बन गया.

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11 जनवरी 1945. जब अंग्रेज हैवान बन गए

गांव वालों द्वारा चंदा ना देने से बौखलाए अंग्रेज अफसर तहसीलदार और सिपाहियों के साथ सिमरधा पहुंचे. यहां प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों को पकड़कर गांव की ही एक नीम के पेड़ से बांध दिया गया.

पंडित काशीप्रसाद दुबे, मुन्नीलाल मिश्रा, सीताराम तिवारी, बैजनाथ तिवारी, गेंदनलाल पटारिया, स्वामी प्रसाद लोधी, झुंडलाल चौबे, शालिगराम तिवारी, श्रीपत तिवारी, हरचरन लोधी, रज्जू रंगरेज, पुल्ताई दादा, भगोले दाऊ समेत कई सेनानियों पर घंटों लाठियां और हंटर बरसाए गए.

अंग्रेजी सिपाहियों की निर्मम पिटाई में भगोले दाऊ, रज्जू रंगरेज और पुल्ताई दादा मौके पर ही शहीद हो गए. 20 से ज्यादा सेनानी मरणासन्न हो गए.

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केस, जुर्माना और हाईकोर्ट तक लड़ाई

चंदा ना देने और अंग्रेजी हुकूमत का विरोध करने पर इन सेनानियों पर केस दर्ज किया गया. मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा. कई सेनानियों को जुर्माना और जेल की सजा झेलनी पड़ी, लेकिन किसी ने अंग्रेजों के सामने घुटने नहीं टेके.

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शिशु को भी नहीं बख्शा

अंग्रेजों की हैवानियत यहीं नहीं रुकी. पंडित काशीप्रसाद द्विवेदी अंग्रेजी शासन को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए क्षेत्रीय लोगों की बटालियन तैयार कर रहे थे. इसकी भनक लगते ही अंग्रेजों ने उनके घर पर धावा बोला.

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काशीप्रसाद घर पर नहीं थे. उनकी पत्नी अपने मात्र चार दिन के नवजात शिशु को स्तनपान करा रही थीं. गुस्साए अंग्रेजों ने बच्चे को मां की गोद से छीनकर जमीन पर पटक दिया. मां बेहोश हो गई. इसके बाद अंग्रेज उस शिशु को भी अपने साथ उठा ले गए.

यह घटना सिमरधा के इतिहास की सबसे भयावह और दर्दनाक याद बन गई.

गांव खाली, चूल्हे बुझे और खेत-खलिहान में छिप गए लोग...

11 जनवरी को सिमरधा में एक भी चूल्हा नहीं जला. भय और आक्रोश के बीच पूरा गांव घर छोड़कर खेतों, फसलों और जंगलों में छिप गया. महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग जान बचाने के लिए इधर-उधर बिखर गए.

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यह दिन सिमरधा के लिए इतिहास का सबसे काला दिन कहलाया.

जुल्म के बाद और तेज हुआ आजादी का जुनून

अंग्रेजों के जुल्मों ने गांव को तोड़ा नहीं, बल्कि और जोड़ दिया. मुन्नीलाल मिश्र के नेतृत्व में बंगरा में रनमत लंबरदार के यहां बैठक हुई. जिलेभर के स्वतंत्रता सेनानी इसमें शामिल हुए.

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ये सेनानी पहले गांधी जी के चरखा आंदोलन से पूरी तरह सहमत नहीं थे, लेकिन बाद में इसी आंदोलन में कूद पड़े. गांव के कई सत्याग्रही पकड़े गए, जिन पर 100 रुपये का जुर्माना और एक वर्ष की कारावास की सजा हुई.

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अंग्रेजों की उपलब्धियां दिखाने वाला चलित सिनेमा जब गांव आया तो काशीप्रसाद द्विवेदी ने उसे तोड़ दिया. अंग्रेज अफसर कई बार उनके सामने बेबस नजर आए.

आसपास के सेनानी भी जुड़े

ढिपकई से रामसेवक रिछारिया, खड़ौरा से रामसुमित मिश्रा, तीरथराज, सिमरधा के श्रीपत सहाय तिवारी, बाबा सुमेर, बंगरा से मलखान समेत कई सेनानियों ने आंदोलन को धार दी और अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए.

गांधी जी का पत्र और अंग्रेजों की माफी

सिमरधा कांड से आक्रोशित होकर काशीप्रसाद द्विवेदी की बटालियन ने महात्मा गांधी को पत्र लिखा. गांधी जी ने जवाब में लिखा- जुल्म करने वाले एक दिन माफी मांगेंगे.

यह बात सच साबित हुई. वर्ष 1946 में ब्रिटिश कलेक्टर सतीश चंद्र सिमरधा आए और पूरे घटनाक्रम के लिए गांव से माफी मांगी.

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सम्मान मिला, स्मारक नहीं

वर्ष 1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सिमरधा कांड में भूमिका निभाने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया, जिससे इस ऐतिहासिक आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर आधिकारिक मान्यता मिली.

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गेंदनलाल पटारिया, सीताराम त्रिपाठी, स्वामी प्रसाद जैसे सेनानियों को आज़ादी के बाद ताम्रपत्र और पेंशन मिली. लेकिन जिस मैदान में अंग्रेजों ने लाठियां बरसाईं, वहां आज भी कोई स्मारक नहीं है.

गांव आज भी मांग कर रहा है कि उस ऐतिहासिक स्थल पर स्मारक बने, ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि आज़ादी की कीमत क्या थी.

झांसी में रानी लक्ष्मीबाई और चंद्रशेखर आजाद की विरासत

सिमरधा का यह विद्रोह यूं ही नहीं फूटा. इसके बीज 1857 में ही बो दिए गए थे, जब झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ पहली बड़ी लड़ाई लड़ी. झांसी में बगावत की नींव उन्होंने ही रखी.

rani lakshmi bai and chandra shekhar azad

बाद में इसी धरती ने चंद्रशेखर आज़ाद जैसे क्रांतिकारी को पनाह दी. झांसी और आसपास के जंगलों में आज़ाद ने अंग्रेजों को चुनौती दी. यही विरासत सिमरधा तक पहुंची.

11 जनवरी 1945 का सिमरधा कांड उसी लंबी लड़ाई की एक अमर कड़ी है, जिसने साबित कर दिया कि बुंदेलखंड की धरती कभी गुलामी स्वीकार नहीं करती.

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