
लखनऊ के विकासनगर स्थित आवास विकास परिषद की जमीन पर बसी अवैध बस्ती में पांच दिन पहले लगी भीषण आग के बाद अब जनजीवन दोबारा पटरी पर लौट रहा है. बेघर हुए परिवारों ने राख के अवशेषों के बीच फिर से अपने छप्पर और झोपड़ियां डालनी शुरू कर दी हैं.
सामाजिक संस्थाएं और लोग मौके पर पहुंचकर पीड़ितों को अनाज, कपड़े और अन्य जरूरी सामान मुहैया करा रहे हैं. सालों से यहीं रह रहे इन निवासियों का कहना है कि वे यहीं जीना-मरना चाहते हैं, हालांकि सरकार बेहतर विकल्प दे तो वे जाने को तैयार हैं.

राख के बीच नई उम्मीद और मदद
विकासनगर की अवैध बस्ती में अभी भी आग की तबाही के निशान मौजूद हैं, लेकिन अपनों को खोने के डर से उबरकर लोग दोबारा घर बसा रहे हैं. दान में मिले कपड़ों और राशन को लेकर आते चेहरों पर राहत की मुस्कान है. जमीन विवाद और सुरक्षा के सवाल पर निवासियों का कहना है कि वे मजबूर हैं और बरसों से इसी जगह को अपना घर मान चुके हैं.

प्रशासनिक अनदेखी और बिजली का मकड़जाल
राजधानी में सिर्फ विकासनगर ही नहीं, बल्कि वन विभाग और अन्य सरकारी जमीनों पर भी ऐसी दर्जनों अवैध बस्तियां पनप चुकी हैं. इन झुग्गियों में न केवल बिजली के अवैध कनेक्शन हैं, बल्कि डिश एंटीना और केबल टीवी के तारों का असुरक्षित जाल फैला हुआ है. सवाल यह है कि आखिर यह अवैध बस्तियां कैसे पनप पाईं. इन जगहों पर अगर आग जैसी घटना होती है तो विकासनगर जैसे ही हालात बन सकते हैं.