जमीयत उलमा-ए-हिंद के प्रमुख मौलाना अरशद मदनी ने दावा किया है कि ज्ञानवापी परिसर के अंदर हिंदू भक्तों द्वारा जिन मूर्तियों की पूजा की जा रही है, उन्हें बाहर से लाया गया हैं. मदनी ने पूछा कि अगर मस्जिद होती तो जो मूर्ति तहखाने में लाई गई हैं, वो बाहर से नहीं लाई गई होतीं. यहां शुरू से ही मूर्ति होतीं, लेकिन यहां शुरू से ही कोई मूर्ति नहीं है. फिर ऐसा कैसे हो सकता है कि यहां मंदिर था और उसकी जगह पर मस्जिद बना दी गई है?
आजतक से बात करते हुए उन्होंने दावा किया कि जो बातें कही जा रही हैं कि वहां मूर्तियां हैं और मंदिर के निशान हैं, ये वो जगहें हैं जो मस्जिद से अलग हैं. जहां मस्जिद है, वहां मंदिर था इसका कोई सबूत नहीं है. उन्होंने कहा कि मथुरा हो या ज्ञानवापी. वहां कभी मंदिर नहीं था. यह इस्लाम की आस्था के खिलाफ है.
मदनी ने एएसआई सर्वे की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि यहां मूर्तियां लाई गई हैं और पूजा की गई है. इससे पहले यहां कोई मूर्तियां नहीं थीं, यह कैसे कहा जा सकता है कि मूर्ति रखी हुई हैं? इसका मतलब ये है कि सर्वेक्षण रिपोर्ट सही नहीं है. सर्वेक्षण रिपोर्ट गलत है.
सर्वे के दौरान एएसआई को साइट पर 12वीं से 17वीं शताब्दी तक के संस्कृत और द्रविड़ दोनों भाषाओं में शिलालेख मिले हैं. एक संस्कृत शिलालेख में रुद्र की बात की गई है, जो भगवान शिव का दूसरा नाम है और इसमें श्रावण महीने का उल्लेख भी है, जो इसे 17वीं शताब्दी का बताता है. एएसआई को साइट पर हिंदू देवताओं विष्णुजी और हनुमानजी की मूर्तियां भी मिलीं थीं. इनमें से कुछ मूर्तियां जो जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं, अब सीलबंद तहखाने के अंदर उनकी पूजा की जा रही है.
हिंदू पक्ष के वकील विष्णु शंकर जैन ने कहा था कि भगवान नंदी जहां पर विराजमान हैं, उसके ठीक सामने व्यास परिसर का तहखाना है. यहां 1993 तक पूजा होती थी, लेकिन नवंबर 1993 में तत्कालीन यूपी की सरकार ने इसे अवैध रूप से बंद करा दिया था. साथ ही पूजा करने वाले पुजारियों को हटा दिया गया था.