scorecardresearch
 

मां का पोस्टमार्टम कराने अकेले पहुंचा 8 साल का मासूम..., AIDS से गई पिता की जान तो सबने मोड़ा मुंह

एटा में आठ साल का बच्चा अपनी मां नीलम के शव को लेकर अकेला ही पोस्टमार्टम कराने पहुंचा, मासूम ने बीमार मां की दिन-रात देखभाल की, जबकि परिवार ने मदद नहीं की. पिता की मौत के बाद बच्चा पूरी तरह अकेला था. जिसने भी मासूम की हिम्मत देखी वह रो पड़ा.

Advertisement
X
मां का पोस्टमार्टम कराने अकेले पहुंचा मासूम (Photo: itg)
मां का पोस्टमार्टम कराने अकेले पहुंचा मासूम (Photo: itg)

उत्तर प्रदेश में एटा जनपद से ऐसी हृदयविदारक घटना सामने आई है जो सिर्फ कोई खबर नहीं बल्कि समाज और सिस्टम के लिए आईना है. जो दिखाता कि रिश्तों की बेरुखी, मजबूरी की हद और एक मासूम की अदम्य हिम्मत कैसे सामने आती है. जैथरा थाना क्षेत्र के ग्राम नगला धीरज में आठ साल का बच्चा अपनी 45 वर्षीय मां नीलम का शव लेकर जिला मुख्यालय के वीरांगना अवंतीबाई मेडिकल कॉलेज में पोस्टमार्टम कराने पहुंचा तो हर किसी की आंखें भर आईं.

पिता की एचआईवी से मौत, मां थी बीमार

नीलम गंभीर बीमारी से जूझ रही थीं और उनका इलाज एटा के मेडिकल कॉलेज में चल रहा था. इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई. पिता की एचआईवी से मौत के बाद यह बच्चा पूरी तरह अकेला रह गया था. मां के निधन के समय न तो कोई रिश्तेदार उसके साथ आया और न ही कोई परिजन मदद के लिए मौजूद था. मजबूरी में बच्चा ही मां के शव के पास खड़ा रहा और खुद हिम्मत जुटाकर पोस्टमार्टम कराने पहुंच गया.

जायदाद पर नजर रखे है परिवार

बच्चे ने बताया कि परिवार के अन्य सदस्य, विशेषकर चाचा और रिश्तेदार, उसकी जायदाद पर नजर रखे हुए थे और इसलिए किसी ने इलाज के दौरान एक रुपये की भी मदद नहीं की. मासूम ने आठ दिनों तक अपनी मां की सेवा की, फर्रुखाबाद के लोहिया अस्पताल, कानपुर के हैलेट अस्पताल और दिल्ली तक मां का इलाज कराया. दिन-रात वह मां का सहारा बना रहा, लेकिन किस्मत ने मां को उससे छीन लिया.

Advertisement

पुलिस कराएगी अंतिम संस्कार

मामले की जानकारी मिलते ही थाना जैथरा प्रभारी रितेश ठाकुर ने तुरंत हस्तक्षेप किया. पुलिस ने बताया कि मौत बीमारी के कारण हुई है और अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी पुलिस संभालेगी. साथ ही बच्चे को हरसंभव मदद और सुरक्षा का भरोसा दिया गया है.

सोशल और प्रशासनिक दृष्टि से यह मामला गहरी संवेदनशीलता का सबक देता है. यह केवल एक अकेले बच्चे की हिम्मत की कहानी नहीं है, बल्कि यह समाज और परिवार में मौजूद रिश्तों की असंवेदनशीलता, और कमजोर बच्चों के प्रति जिम्मेदारी की कमी को उजागर करता है. अब सवाल यह है कि इस बच्चे का भविष्य कौन संवार पाएगा. क्या केवल संवेदनाएं जताने से काम चल जाएगा, या प्रशासन और समाज मिलकर इस मासूम के जीवन को नई दिशा देंगे? एटा का यह बच्चा न केवल अपनी मां की सेवा में निष्ठावान था, बल्कि उसकी हिम्मत ने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया.

 

 

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Advertisement