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15 साल से बंद था लड़के का मुंह, सोते समय रुक जाती थी सांस, एम्स में मिली नई जिंदगी

गोरखपुर एम्स (All India Institute of Medical Sciences) में दंत रोग विभाग ने एक जटिल सर्जरी की. 20 साल के एक लड़के की खोपड़ी की हड्डी (Skull Bone) निचले जबड़े की हड्डी (Jaw Bone) से पूरी तरह से जुड़ गई थी. इसकी वजह से पिछले 15 साल से उसका मुंह नहीं खुल रहा था. वो केवल तरल पदार्थ पर ही निर्भर था.

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ऑपरेशन करते एम्स के डॉक्टर
ऑपरेशन करते एम्स के डॉक्टर

यूपी के गोरखपुर एम्स (अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान) में दंत रोग विभाग ने एक जटिल सर्जरी की. 15 साल से एक लड़का मुंह न खुलने और नींद में थोड़ी-थोड़ी देर में सांस रुकने की समस्या से ग्रसित था. इस पर वो एम्स पहुंचा और डॉक्टरों को दिखाया. उसकी हालत देखकर जांच के बाद डॉक्टरों ने ऑपरेशन का फैसला लिया. 

जानकारी के मुताबिक, जिले के रहने वाले 20 साल के लड़के का 15 साल से मुंह नहीं खुल रहा था. इसके साथ ही नींद में थोड़ी-थोड़ी देर में सांस रुक जाती थी. लड़के के परिजनों ने उसे कई डॉक्टरों को दिखाया लेकिन फायदा नहीं मिल रहा था. इस बीच लड़के ने एम्स के दंत रोग विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर एवं मैक्सिलोफेशियल सर्जन डॉ. शैलेश कुमार को दिखाया. 

जबड़े की हड्डी से जुड़ गई थी खोपड़ी की हड्डी

उसकी जांच और स्कैन के बाद ये पता चला की वो एक जटिल किस्म की बीमारी से ग्रसित है. उसकी खोपड़ी की हड्डी निचले जबड़े की हड्डी से पूरी तरह से जुड़ गई थी. इसकी वजह से पिछले 15 साल से उसका मुंह नहीं खुल रहा था. वो केवल तरल पदार्थ पर ही निर्भर था. इस वजह से उसका स्वास्थ्य भी बुरी तरह प्रभावित हो रहा था.

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डॉ. शैलेष ने बताया कि ऐसे मरीजों को बेहोश करने की प्रक्रिया काफी ‌कठिन होती है. लेकिन, एनेस्थीसिया टीम की डॉ. अंकिता काबी, डॉ. प्रियंका एवं डॉ. विजिता ने मरीज को बेहोश करने में विशेष भूमिका निभाई. इसके बाद पांच घंटे तक सर्जरी चली. सर्जरी पूरी तरह से सफल रही. 

एम्स निदेशक ने टीम को ऑपरेशन के लिए बधाई दी

दरअसल, एम्स की निदेशक डॉ. सुरेखा किशोर को विभाग ने इस युवक के बारे में जानकारी दी थी. इस पर उन्होंने मरीज का ऑपरेशन करने का निर्देश दिया था. एम्स निदेशक ने डॉ. शैलेश कुमार और उनकी टीम को सफल ऑपरेशन के लिए बधाई दी है. निदेशक ने बताया कि इस तरह का पहला ऑपरेशन एम्स में हुआ है. अब तक इस तरह के ऑपरेशन के ल‌िए मरीजों को दिल्ली और लखनऊ जाना पड़ता था.

ऑपरेशन में सहयोग करने वाली टीम में सीनियर रेजीडेंट डॉ. अनुराधा एवं एनेस्थीसिया विभाग के सीनियर रेजीडेंट्स का भी योगदान रहा. डॉ. शैलेष ने बताया कि दक्षिण भारत की तुलना में उत्तर भारत में इस तरह की समस्या मरीजों में ज्यादा मिलती है. इसका प्रमुख कारण डॉक्टर को समय पर न दिखाना है. सही समय पर अगर मरीजों को दिखा दिया जाए तो ऑपरेशन की जरूरत नहीं पड़ती.

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