प्रागैतिहासिक काल में एक जातीय समूह लंबे समय तक अपने मृतकों को ताबूतों में बंदकर पहाड़ों पर लटकाया करते थे. वैज्ञानिकों ने सालों इस पर रिसर्च करने के बाद दावा किया है कि जिस प्राचीन लोगों के बीच यह प्रथा प्रचलित थी उनके वंशज आज भी जीवित हैं.
डेली स्टार की रिपोर्ट के मुताबिक, शोधकर्ता उस प्रागैतिहासिक समूह को देखकर हैरान रह गए जो अपने मृतकों को "लटकते ताबूतों" में छोड़ देते थे. इससे भी चौंकाने वाली बात यह मिली कि उनके वंशज आज भी जीवित हैं.
दक्षिण-पश्चिमी चीन में रहने वाली बो जनजाति के बारे में माना जाता है कि वे सदियों पहले अपने मृतकों को ताबूतों में रखकर पहाड़ों से लटका देते थे. अब, मानवविज्ञानियों ने एक चौंकाने वाली खोज की है कि जनजाति की ये प्रथाएं कई शताब्दियों तक, यहां तक कि आधुनिक समय के अपेक्षाकृत निकट तक भी जारी रहीं.
रिसर्च में उस प्राचीन जनजातीय समूह और उसके वंशजों के बीच गुप्त आनुवंशिक संबंध का पता चला, जो उस पुराने क्षेत्र में रहते हैं, जहां प्रागैतिहासिक समूह रहता था. इससे उस भूमि पर रहने वाले लोगों के जीवन और उनकी प्रागैतिहासिक परंपराओं से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवालों के जवाब खोजने में भी मदद मिली है.
वैज्ञानिकों ने पता लगाया था कि प्राचीन सभ्यता के लोग मृतकों को ऊंचे पहाड़ों पर ले जाकर उनके ताबूतों को चट्टानों से लटका देते थे. लाइव साइंस के अनुसार , शोधकर्ताओं ने आनुवंशिक अध्ययन किए और पाया कि इन विचित्र अंत्येष्टि प्रथाओं को निभाने वाले लोग आज भी किसी न किसी रूप में उस इलाके में जीवित हैं.
पिछले महीने एक शोध में हुआ खुलासा
पिछले महीने नेचर कम्युनिकेशंस पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन में कहा गया है कि लटकते हुए ताबूत पर रिसर्च के परिणाम इस दफन प्रथा की आनुवंशिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जड़ों के बारे में बहुमूल्य जानकारी प्रदान करते हैं. ऐसा माना जाता है कि ये परंपराएं नवपाषाण युग से चली आ रही थीं. कुछ सौ साल तक यह परंपरा चलती रही थी.
चीन और दक्षिणपूर्व एशिया के आसपास के पहाड़ों पर ऐसे सैकड़ों ताबूत पाए गए हैं और प्रत्येक मामले का पूरी तरह से दस्तावेजीकरण करने का प्रयास 1995 में शुरू हुआ था. तब केवल ये अनुमान था कि बो जनजाति के लोग इस प्रथा के लिए जिम्मेदार थे. इस परंपरा के पीछे की सच्चाई और शुरुआत को लेकर शोधकर्ताओं को ठोस सबूत नहीं मिले थे.
अपनी जांच के दौरान, लटकते ताबूतो में छोड़े गए 11 लोगों के डीएनए की जांच की गई. इससे इनकी आनुवंशिकी के इतिहास का पता चला. ये शव 2,000 वर्ष पहले के थे. थाईलैंड जैसे देशों से भी ऐसी प्रथा के तहत लटकते ताबूत से मिले अन्य नमूने एकत्र किए गए, जिनसे पता चला कि उनमें दर्जनों समान डीएनए संरचनाएं थीं, जो इस बात का प्रमाण हैं कि यह प्रथा पीढ़ियों से चली आ रही थी.
शोध के परिणामों से पता चलता है कि अलग-अलग जगह मिले लटकते ताबूतों के नमूनों का डीएनए आधुनिक बो जातीय समूह से मिलता है, जो लगभग 4,500 वर्ष पूर्व इस क्षेत्र से जुड़े हुए थे. यह नवपाषाण काल था. जब मानव जाति औजारों के लिए पत्थरों का उपयोग करना छोड़कर कांसे जैसी धातु की ओर अग्रसर हो रही था.
आंकड़ों से पता चला है कि बो जनजाति और उनके पूर्वज आधुनिक म्यांमार, चीन, लाओस और थाईलैंड के अधिकांश भूभाग में निवास करते थे. शोधकर्ताओं ने अध्ययन में कहा कि ठोस आनुवंशिक निशान एक साझा उत्पत्ति और सांस्कृतिक निरंतरता के ठोस प्रमाण प्रदान करते हैं जो आधुनिक राष्ट्रीय सीमाओं से परे है.
ताबूत का जमीन पर गिरना शुभ माना जाता था
चीन, दक्षिणपूर्व एशिया और ताइवान में लटकते ताबूतों वाले स्थल अपेक्षाकृत आम हैं. क्योंकि यहां यह शव को पहले दफनाने का एक लोकप्रिय तरीका हुआ करता था. हालांकि, इस तरह की दफन परंपरा के अंतिम आधिकारिक दस्तावेज मिंग राजवंश के समय के हैं, जो 1368 से 1644 के बीच के हैं.
ताबूतों को लटकाने वाले स्थलों की ऊंचाई इतनी अधिक क्यों है. इसका पता लगाने के लिए आगे शोध किया जा रहा है. वैज्ञानिकों का दावा है कि ये स्थल जितने ऊंचे होते थे, मृतकों के लिए उतने ही शुभ माने जाते थे. इसके अलावा, जिनके ताबूत जमीन पर गिरते थे, उन्हें अधिक भाग्यशाली या उनके परिवार के लिए शुभ माना जाता था.