ताजमहल परिसर के भीतर 'पूजा आरती' व 'नमाज' अदा करने को लेकर हिंदू और मुस्लिम समूहों के बीच जारी रस्साकशी आगरा में टूरिज्म के लिए चिंता का कारण बन रही है. टूरिज्म क्षेत्र के दिग्गजों को डर है कि यह विवाद आगरा में सांप्रदायिक दंगों को भड़का सकता है.
दरअसल, यह पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश के बाद खड़ा हुआ जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने पिछले सप्ताह ताजमहल के दरवाजे पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश व अधिसूचना को चस्पा किया था.
इसमें स्थानीय मुस्लिमों को केवल शुक्रवार दोपहर बाद नमाज अदा करने की इजाजत दी गई थी, जिस वक्त यह जनता के लिए बंद होता है. लेकिन स्थानीय लोग इस रोक को हटाना चाहते हैं, ताकि वह रोजाना नमाज अदा कर सकें और शहर से बाहरी लोगों को भी नमाज अदा करने की इजाजत मिले.
वहीं, दूसरी ओर ताजमहल को शिव मंदिर बताने वाले हिंदू संगठन यहां पूजा-आरती करने की धमकी दे रहे हैं. उनका कहना है कि यदि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी लोग यदि नमाज अदा कर रहे हैं तो वो यहां पूजा करेंगे. इसी के चलते एक महिला ने स्मारक के इर्द-गिर्द गंगा जल छिड़का जिससे यह विवाद और भी बढ़ गया.
इस विवाद को लेकर ताजमहल इंतेजामिया कमिटी के चीफ सैयद इब्राहिम हुसैन जैदी का कहना है कि यदि ताजमहल के इतिहास को देखा जाए तो 1632 में जब ताजमहल बना था. तब से ही यहां नमाज अदा हो रही है. लेकिन अब यहां लोग विवाद खड़ा कर रहे हैं.
1966 में आर्कियोलॉजी सर्वे ऑफ़ इंडिया ने इमाम साबिक अली को यहां नमाज अदा करने के लिए नियुक्त किया था. वो लंबे समय तक नमाज अदा भी करते रहे, लेकिन उनका स्वास्थ्य खराब होने के बाद उनके बेटे सैयद सादिक अली यहां नमाज अदा करते हैं.
मुस्लिम समुदाय की मांग यह है कि यदि शुक्रवार को स्थानीय मुसलामानों को नमाज पढ़ने की अनुमति दी गई है तो बाहरी मुस्लिमों को भी इसकी इजाजत दी जाए.