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इजरायल में कैसे होते हैं चुनाव, जानें- कितना अलग है तरीका

इजरायल में कैसे होते हैं चुनाव, जानें- कितना अलग है तरीका
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इजरायल में मंगलवार को मतदान हो रहा है जिसमें प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की किस्मत का फैसला होना है. चुनाव नतीजों में नेतन्याहू या तो रिकॉर्ड कायम करते हुए पांचवें कार्यकाल की तरफ आगे बढ़ सकते हैं या फिर इजरायल की राजनीति में दशकों से बने उनके वर्चस्व का अंत हो जाएगा. नेतन्याहू की दक्षिणपंथी पार्टी लिकुड का सामना बेन्नी गैंट्ज और व्हाइट पार्टी से है.
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इजरायल में छह महीने के भीतर दूसरी बार चुनाव हो रहे हैं. आइए जानते हैं इजरायल में चुनाव किस तरह कराए जाते हैं.

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इजरायल की संसद नेसेट के लिए हर चार साल पर चुनाव होते हैं लेकिन किसी भी सरकार का एक निश्चित कार्यकाल नहीं होता है. सरकार का विश्वास मत खोने पर संसद में बहुमत या राष्ट्रपति डिक्री के जरिए समय से पहले चुनाव कराए जा सकते हैं. 120 सीटों वाली संसद अगर बहुमत से खुद को भंग करने का फैसला कर ले तो भी दोबारा से चुनाव कराए जाते हैं.
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इजरायल में भी दुनिया के बाकी देशों की तरह लोकतांत्रिक चुनाव व्यवस्था है जहां मतदान के जरिए सत्ता का शांतिपूर्ण तरीके से स्थानांतरण होता है.

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चुनावी व्यवस्था
इजरायल में आनुपातिक प्रतिनिधित्व चुनावी व्यवस्था है जिसे लिस्ट सिस्टम भी कहा जाता है. इसमें मतदाता किसी एक राजनीतिक पार्टी के लिए अपना मत डालते हैं. किसी भी राजनीतिक दल को चुनाव में जितने फीसदी वोट मिलते हैं, उसी अनुपात के हिसाब से संसद में उसकी सीटें तय होती हैं.
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उदाहरण के तौर पर, अगर किसी पार्टी को 10 फीसदी वोट हासिल होते हैं तो उसे 120 सीटों (120 का 10 फीसदी=12) में से 12 सीटें मिलती हैं. इजरायल की संसद नेसेट में सीट हासिल करने के लिए कुल मतदान का न्यूनतम 3.25 फीसदी मत हासिल करना जरूरी है. अगर कोई पार्टी इससे कम मत हासिल करती है तो उसे नेसेट में सीटें नहीं मिलती हैं.
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आम चुनाव से पहले, हर पार्टी अपने उम्मीदवारों की एक प्रिफरेंशियल सूची जारी करती है. इसी सूची में से सांसद बनाए जाते हैं. यह सूची अगले चुनाव तक वैध रहती है. अगर नेसेट के किसी सांसद की मौत हो जाती है तो पार्टी की सूची में मौजूद दूसरे शख्स को नेसेट में जगह दी जाती है.

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वोटिंग प्रक्रिया-
इजरायल में मतदान हमेशा मंगलवार को होता है. इस दिन राष्ट्रीय अवकाश भी होता है. मतदाता निर्धारित पोलिंग स्टेशन जाकर अपना मत डालते हैं. मतदान केंद्र पर पहुंचने के बाद वे अपना राष्ट्रीय पहचान पत्र दिखाते हैं और तीन अलग-अलग दलों के प्रतिनिधि मतदाता की पहचान की पुष्टि करते हैं. इसके बाद मतदाता को एक लिफाफा दिया जाता है. इसमें वे अपनी पसंदीदा पार्टी के चुनाव चिह्न की स्लिप लेकर रख देते हैं और इसे सीक्रेट बैलेट बॉक्स में डाल देते हैं. इसके बाद मतगणना का काम शुरू होता है. पोलिंग स्टेशन सुपरवाइजर और तीन पार्टियों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में बॉक्स की सील तोड़ी जाती है और बैलेट गिने जाते हैं. सीईसी की वेबसाइट पर 8 दिनों के भीतर आधिकारिक रिजल्ट घोषित कर दिए जाते हैं.
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चुनाव के बाद
इजरायल में कोई भी पार्टी 61 सीटें जीतने में कामयाब नहीं रही है इसलिए यहां हमेशा गठबंधन की सरकार ही बनती रही है. चुनाव के नतीजे घोषित होने के बाद राष्ट्रपति सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करते हैं. पार्टी के नेता के पास बहुमत साबित करने के लिए 28 दिन होते हैं हालांकि, राष्ट्रपति 14 दिनों का वक्त और दे सकता है.

अगर सबसे बड़ी पार्टी गठबंधन की सरकार बनाने में नाकाम रहती है तो राष्ट्रपति किसी दूसरी पार्टी को मौका दे सकता है. 2009 में भी ऐसा ही समीकरण देखने को मिला था जब काडिमा पार्टी के नेता जिपी लिवनी नेतन्याहू के नेतृत्व वाली लिकुड पार्टी से एक सीट ज्यादा हासिल करने के बावजूद सरकार नहीं बना पाए थे. अप्रैल 2019 के चुनावों के बाद, राष्ट्रपति ने नेतन्याहू को सरकार बनाने के लिए बुलाया था लेकिन वह गठबंधन नहीं बना सके. संसद भंग करने के पक्ष में नेसेट में मतदान हुआ जिसके बाद दोबारा चुनाव कराए गए.
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