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Whistling Village: भारत का ऐसा गांव जहां के बच्चों के नाम सुनकर चौंक जाते हैं लोग!

मेघालय की पहाड़ियों में बसा कोंगथोंग गांव अपनी 500 साल पुरानी जिंगरवाई इआवबेई परंपरा के लिए मशहूर है. यहां हर व्यक्ति की पहचान एक अनोखी धुन से होती है, जिसे जन्म के समय माँ तैयार करती है. सांस्कृतिक विविधता से भरे इस विसलिंग विलेज की जादुई कहानी क्या है आइए जानते हैं.

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जिंगरवाई इआवबेई परंपरा 500 साल पुरानी है. (PHOTO:ITG)
जिंगरवाई इआवबेई परंपरा 500 साल पुरानी है. (PHOTO:ITG)

Unique Indian Whistling Village: दुनियाभर में कई अनोखी चीजें हैं, जो लोगों को चौंका देती हैं. भारत भी इस मामले में पीछे नहीं है, क्योंकि यहां पर अलग-अलग रिलीजन-कल्चर के लोग रहते हैं और हर किसी का रहन-सहन एक दूसरे से काफी अलग है. भारत के हर गांव की अपनी एक कहानी होती है, लेकिन क्या आपने ऐसे किसी गांव के बारे में सुना है, जहां पर लोगों को पुकारने के लिए उनके नाम का इस्तेमाल नहीं किया जाता है.

नॉर्थ ईस्ट के मेघालय में एक ऐसी जगह मौजूद है, जहां पर लोग नामों की बजाय एक-दूसरे को गाने की धुन से पुकारते हैं. अगर आप भी घूमने के शौकीन हैं आपको ऐसी ही यूनिक जगहों को एक्सप्लोर करना अच्छा लगता है तो आपको मेघालय की यह अनोखा गांव काफी पसंद आने वाला है. 

मेघालय की खूबसूरत पहाड़ियों के बीच बसा एक छोटा-सा गांव कोंगथोंग है, जो अपनी अनोखी परंपरा की वजह से दुनिया भर में मशहूर है. यह गांव ईस्ट खासी खाड़ी जिले में स्थित है और राज्य की राजधानी शिलॉग से लगभग तीन घंटे की दूरी पर है. यहां पहुंचना आसान नहीं, लेकिन इसकी खासियत सुनकर आपका यहां जाने का मन जरूर करने लगेगा.

कोंगथोंग की अनोखी परंपरा

इस गांव की सबसे अनोखी बात यह है कि यहां रहने वाले लोगों के सिर्फ एक नहीं, बल्कि तीन नाम होते हैं. पहला सामान्य नाम, जो सरकारी कामों के लिए इस्तेमाल होता है. दूसरा एक खास धुन या गाना, जो उनकी असली पहचान होती है. और तीसरा एक छोटा-सा सुर, जो निकनेम की तरह काम करता है.

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इस परंपरा को जिंगरवाई इआवबेई कहा जाता है, जिसका मतलब है पूर्वज मां के सम्मान में गाया गया गीत. गांव में जब किसी बच्चे का जन्म होता है तो उसकी मां उसके लिए एक खास धुन बनाती है. यह धुन 15 से 20 सेकंड तक लंबी हो सकती है और हर बच्चे के लिए बिल्कुल अलग होती है. यही धुन आगे चलकर उस बच्चे की पहचान बन जाती है.

हर इंसान की अलग धुन की कहानी

सबसे खास बात यह है कि यह धुन किसी और को कभी नहीं दी जाती. अगर उस व्यक्ति की मृत्यु हो जाए, तो उसकी धुन भी हमेशा के लिए खत्म हो जाती है. यानी हर इंसान का गीत सिर्फ उसी का होता है. पहले के समय में इन धुनों का इस्तेमाल जंगलों और पहाड़ियों में एक-दूसरे को बुलाने के लिए किया जाता था.

खासकर जब लोग शिकार या खेती के काम से दूर जाते थे, तब वो एक-दूसरे को बुलाने के लिए आवाज लगाने के बजाय यही धुन गाकर एक-दूसरे को पुकारते थे. इससे आवाज दूर तक पहुंचती थी और उस इंसान को पता भी चल जाता था कि उसको ही पुकारा जा रहा है.

गांव वालों की मान्यता 

नाम की जगह धुन से पुकारने को लेकर गांव वालों का मानना है कि इन धुनों से बुरी आत्माएं कंफ्यूज हो जाती हैं और इंसानों को नुकसान नहीं पहुंचा पातीं. इस वजह से भी यह परंपरा सिर्फ पहचान नहीं, बल्कि सुरक्षा से भी जुड़ी मानी जाती है.

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500 साल से चली आ रही परंपरा

कोंगथोंग गांव में यह परंपरा सैकड़ों सालों से चली आ रही है. माना जाता है कि यह गांव 500 साल से भी ज्यादा पुराना है. यहां की संस्कृति एक-दूसरे के जरिए पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ी है. यह गांव UNWTO के बेस्ट टूरिज्म विलेज अवार्ड के लिए भी नॉमिनेटेड हो चुका है, धीरे-धीरे यह बेस्ट टूरिस्ट प्लेस बनता जा रहा है और दूर-दूर से लोग इसकी अनोखी संस्कृति को देखने आते हैं. 

पढ़ाई और नौकरी के लिए लोग शहरों में जा बस रहे हैं, जिसकी वजह इस परंपरा के खत्म होने का खतरा भी बढ़ रहा है. मगर गांव के लोग इसे बचाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं. मेघालय के कोंगथोंग गांव की अनोखी परंपरा ही नहीं बल्कि खूबसूरत नजारे भी लोगों को अपनी अट्रैक्ट कर रहे हैं, यहां सुकून और ताजगी की चाहत में हर साल कई सारे लोगों को खींच लाती है. 

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