घरेलू हिंसा (Domestic Violence) एक ऐसी सामाजिक बुराई है, जो आज भी हमारे समाज में गहराई से मौजूद है. यह हिंसा केवल शारीरिक मारपीट तक सीमित नहीं होती, बल्कि मानसिक, भावनात्मक, आर्थिक और यौन उत्पीड़न के रूप में भी सामने आती है. घरेलू हिंसा का शिकार प्रायः महिलाएं होती हैं, लेकिन कई मामलों में बच्चे, बुज़ुर्ग और पुरुष भी इससे प्रभावित होते हैं.
घरेलू हिंसा को रोकने के लिए कानूनी और सामाजिक दोनों स्तरों पर प्रयास आवश्यक हैं. भारत में घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 जैसे कानून मौजूद हैं, लेकिन इनके प्रति जागरूकता बढ़ाना उतना ही जरूरी है. पीड़ितों को चुप रहने के बजाय मदद लेने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए. परिवार, समाज और शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है, ताकि सम्मान, समानता और संवाद की संस्कृति विकसित हो सके.
घरेलू हिंसा की शुरुआत अक्सर छोटे-छोटे विवादों से होती है, जो समय के साथ गंभीर रूप ले लेते हैं. दहेज की मांग, नशे की लत, आर्थिक तनाव, अशिक्षा, पितृसत्तात्मक सोच और गुस्से पर नियंत्रण न होना इसके प्रमुख कारण हैं. मानसिक हिंसा जैसे ताने देना, अपमान करना, डराना या सामाजिक रूप से अलग-थलग कर देना भी उतनी ही नुकसानदेह होती है जितनी शारीरिक हिंसा.