आठ-दस साल पहले की बात है, मैं अपने एक मित्र के साथ उसका पासपोर्ट बनवाने दिल्ली के पासपोर्ट दफ्तर गया था. तब पासपोर्ट दफ्तर में दलालों का बोलबाला था. हम दलालों के चक्कर में नहीं पड़े और नियम के मुताबिक फॉर्म भरकर लाइन में इंतजार करते रहे. हमारा काफी काम हो गया, लेकिन फीस जमा करनी बाकी थी. जब फीस जमा करने का हमारा नंबर आया, तब तक बाबू ने खिड़की बंद कर दी और कहा कि समय खत्म हो चुका है. हमें काफी दुख हुआ, लेकिन मैंने कुछ ऐसा व्यवहार किया कि उस बाबू को काफी शर्मिंदगी हुई. वह बाबू उसी दफ्तर में तीसरी मंजिल पर बनी कैंटीन में जाकर लंच करने लगा था. मैं उसके पीछे गया और उसके सामने की बेंच पर बैठ गया. मैं उससे बातें करने लगा. मैंने उसे पैसे की जगह रिश्ते बनाने की नसीहत दी. उस दिन बाबू ने मुझसे मेरा फोन नंबर भी लिया. आगे क्या हुआ, जानने के लिए सुनिए पूरी कहानी... 943129