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संजय सिन्हा सुना रहे हैं अपने अखबार के दिनों की कहानी

संजय सिन्हा सुना रहे हैं अपने अखबार के दिनों की कहानी

संजय सिन्हा सुना रहे हैं अपने अखबार के दिनों की कहानी कि किस प्रकार उनके एक दोस्त ने मासिक पत्रिका की शुरुआत की. संजय सिन्हा बता रहे हैं कि कैसे उन्होंने ये सारी बात जानते हुए अपने साथी से ऐसा करने और इसमें दफ्तर के साथी को न जोड़ने की बात कही थी लेकिन कैसे उनके दोस्त ने उनकी बात को नहीं माना. वे आगे बताते हैं कि कैसे एक दिन जब उनके दफ्तर में किसी तकनीकी वजह से काम रुका हुआ था तो उनके दोस्त के साथी ने जोश ही जोश में सारा भेद खोल दिया और कैसे उनके दोस्त की नौकरी जाती रही...

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