2026 की शुरुआत हो चुकी है और इस साल साइबर फ्रॉड के केसेज भी तेजी से बढ़ेंगे. इसलिए आपको ये पता होना चाहिए कि ये लिंक पर क्लिक करवा कर आखिर कैसे साइबर क्रिमिनल्स लोगों की गाढ़ी कमाई में सेंध लगा रहे हैं.
ये किसी फिल्म की कहानी नहीं है. न कोई हैकर अंधेरे कमरे में बैठा दिखता है, न ही ग्रीन स्क्रीन पर मैट्रिक्स फिल्म वाले कोड. आज का साइबर अटैक बहुत शांति से, बहुत सामान्य तरीके से और बिल्कुल भरोसे के लहज़े में होता है. एक फोन कॉल आती है, एक मैसेज दिखता है और कुछ ही मिनटों में बैंक अकाउंट से लेकर डिजिटल पहचान तक सब कुछ हाथ से निकल जाता है. कई बार आपको पता चलता है, लेकिन कई बार आपको लंबे समय बाद पता चलता है.
अटैक की शुरुआत आपके डर से...
भारत में सामने आ रहे ज़्यादातर साइबर अटैक और ऑनलाइन फ्रॉड इसी पैटर्न पर काम कर रहे हैं. इसमें सबसे पहले निशाना बनाया जाता है इंसान की सबसे बड़ी कमजोरी को, डर और भरोसे को.
आपका डेटा क्रिमिनल्स को मिलता कहां से है?
इस अटैक की शुरुआत कहीं और से हो चुकी होती है, जहां विक्टिम को पता भी नहीं चलता. मोबाइल नंबर, ईमेल, नाम, कभी-कभी बैंक का नाम या हाल ही में की गई किसी खरीदारी की जानकारी पहले ही ठगों तक पहुंच चुकी होती है. ये डेटा कभी किसी फेक ऐप से, कभी किसी वेबसाइट के डेटा लीक से और कभी कॉल सेंटर की लीड लिस्ट के ज़रिए इकट्ठा किया जाता है.
जब सही जानकारी मिल जाती है, तब कॉल आता है. सामने वाला खुद को बैंक अधिकारी, पुलिस, CBI या टेक सपोर्ट बताता है. आवाज़ में कॉन्फिडेंस होता है और बात बिल्कुल प्रोफेशनल लगती है. कहा जाता है कि आपके अकाउंट में संदिग्ध गतिविधि पाई गई है, आपके नाम पर शिकायत दर्ज हुई है या फिर आपका सिम और बैंक अकाउंट बंद किया जा सकता है. कई मामलों में लालच भी दिया जाता है, रिफंड, इनाम या ऑफर का झांसा.
पैनिक मोड...
यहीं से दिमाग पर अटैक शुरू हो जाता है. पैनिक में आ कर वो शख्स सवाल पूछने की बजाय सामने वाले की बात मानने लगता है. उसे कहा जाता है कि समस्या तुरंत सुलझाने के लिए एक ऐप डाउनलोड करना होगा या फिर एक लिंक पर क्लिक करना होगा. ये ऐप और लिंक देखने में बिल्कुल असली जैसे होते हैं, लेकिन असल में ये ठगों को फोन का पूरा कंट्रोल दे देते हैं.
जैसे ही स्क्रीन शेयर ऑन होता है या OTP बताया जाता है, गेम खत्म हो जाता है. बैंक अकाउंट से पैसे निकलने लगते हैं, UPI से ट्रांजैक्शन हो जाते हैं और कई मामलों में तो विक्टिम के नाम पर लोन तक ले लिया जाता है. ये सब कुछ इतनी तेजी से होता है कि जब तक इंसान संभलता है, अकाउंट खाली हो चुका होता है.
पढ़े लिखे डॉक्टर से लेकर इंजीनियर तक फंस रहे हैं...
सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि इन मामलों में ज़्यादातर विक्टिम पढ़े-लिखे और टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करने वाले लोग होते हैं. ठग किसी सिस्टम को नहीं, इंसान के भरोसे को हैक करते हैं. डर का माहौल बनाकर सोचने का समय ही नहीं दिया जाता.
इन साइबर अटैक के पीछे काम कर रहे लोग अक्सर VPN, फर्जी सिम कार्ड और इंटरनेशनल सर्वर का इस्तेमाल करते हैं. कॉल कहीं और से आती है, पैसा किसी और देश में ट्रांसफर होता है और डिजिटल निशान किसी तीसरी जगह पर छुपा होता है. इसी वजह से इन्हें पकड़ना बेहद मुश्किल हो जाता है.
नुकसान सिर्फ पैसे तक सीमित नहीं रहता. कई लोग शर्म या डर की वजह से शिकायत तक नहीं करते. मानसिक तनाव बढ़ता है और कई मामलों में इसका असर परिवार और प्रोफेशनल ज़िंदगी पर भी पड़ता है.
साइबर एक्सपर्ट्स लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि कोई भी बैंक, पुलिस या सरकारी एजेंसी फोन पर OTP या स्क्रीन शेयर नहीं मांगती. लेकिन ठगों की चाल इतनी चालाक होती है कि लोग इस सच्चाई को भूल जाते हैं.