scorecardresearch
 

‘Hello Sir, This Is Microsoft…’ और फिर खाली हो गया बैंक अकाउंट, भारत से चल रहा ग्लोबल फ्रॉड

भारत में कई तरह के साइबर क्राइम चल रहे हैं जिनमे से एक कॉल सेंटर फ्रॉड है. दरअसल ये फर्जी कॉल सेंटर्स लोगों को असली ही लगते हैं. सपोर्ट के नाम पर लोगों से लाखों-करोड़ों की ठगी की जा रही है.

Advertisement
X
खतरनाक होता जा रहा है कॉल सेंटर स्कैम (Photo: Pixabay)
खतरनाक होता जा रहा है कॉल सेंटर स्कैम (Photo: Pixabay)

रात का वक्त है. अमेरिका के एक छोटे से शहर में रहने वाला बुज़ुर्ग अपने लैपटॉप पर काम कर रहा है. अचानक स्क्रीन पर वॉर्निंग आती है कि आपका सिस्टम हैक हो चुका है. तुरंत माइक्रोसॉफ्ट सपोर्ट से संपर्क करें, वरना आपका बैंक अकाउंट खतरे में है. डर के मारे वह बिना सोचे-समझे स्क्रीन पर दिख रहे नंबर पर कॉल कर देता है.

फोन के दूसरी तरफ से बेहद सधी हुई अंग्रेज़ी में आवाज़ आती है  'Hello sir, this is Microsoft Technical Support' यहीं से शुरू होता है वह खेल, जिसने बीते कुछ सालों में अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में हज़ारों लोगों को ठगा है. जांच एजेंसियों की पड़ताल में बार-बार सामने आया है कि ऐसे कई ऑपरेशनों की जड़ें भारत से जुड़ी हुई हैं.

यह कोई मामूली ठगी नहीं, बल्कि एक पूरा संगठित ढांचा है, जो बिल्कुल प्रोफेशनल कॉल सेंटर की तरह काम करता है.

होती है प्रॉपर ट्रेनिंग

दरअसल, इन फर्जी कॉल सेंटर्स की बनावट किसी नॉर्मल बीपीओ जैसी ही होती है. कंप्यूटर, हेडसेट, शिफ्ट सिस्टम, टारगेट, स्क्रिप्ट और यहां तक कि ट्रेनिंग सेशन तक तय होते हैं. एजेंटों को सिखाया जाता है कि कैसे डर पैदा करना है, कैसे भरोसा जीतना है और कैसे सामने वाले को मानसिक दबाव में लाकर पैसे निकलवाने हैं.

Advertisement

एजेंट्स को ब्रिटिश ओर अमेरिकी एक्सेंट की इंग्लिश सिखाई जाती है और सभी एजेंट्स का एक इंग्लिश नाम होता. जैसे ऑस्टिन, क्रिस्टीन, मार्कस और जॉर्ज. आपको भी ऐक्सेंट सुन कर एक बार को भरोसा हो जाएगा कि वो ब्रिटिश या अमेरिकी ही हैं. 

इस पूरे मॉडल की शुरुआत अक्सर एक फर्जी पॉप-अप या नकली अलर्ट से होती है. यूज़र जैसे ही किसी वेबसाइट पर जाता है या कुछ सर्च करता है, अचानक मैसेज आता है कि उसका सिस्टम वायरस से इन्फेक्टेड है या अकाउंट खतरे में है. कई मामलों में सर्च रिज़ल्ट में ही नकली हेल्पलाइन नंबर ऊपर दिखा दिए जाते हैं. पीड़ित जब कॉल करता है, तो सामने बैठा व्यक्ति खुद को माइक्रोसॉफ्ट, अमेज़न, बैंक या टेक्निकल सपोर्ट से जोड़कर बात करता है.

रिमोट ऐप का मिसयूज

इसके बाद अगला कदम होता है पीड़ित के कंप्यूटर पर कंट्रोल लेना. AnyDesk या TeamViewer जैसे रिमोट एक्सेस टूल इंस्टॉल करवाए जाते हैं. जैसे ही एक्सेस मिलता है, स्कैमर जानबूझकर कमांड चलाकर या फर्जी सिस्टम एरर दिखाकर यह यकीन दिलाने की कोशिश करता है कि कंप्यूटर बुरी तरह हैक हो चुका है. कई बार नकली बैंक लॉग या झूठे ट्रांजैक्शन भी दिखाए जाते हैं.

डर धीरे-धीरे इतना बढ़ा दिया जाता है कि सामने वाला सोचने की हालत में नहीं रहता. फिर कहा जाता है कि अगर तुरंत कार्रवाई नहीं की गई तो बैंक अकाउंट फ्रीज़ हो जाएगा या कानूनी कार्रवाई हो सकती है. यहीं से पैसा निकालने का खेल शुरू होता है.

Advertisement

पेमेंट के तरीके भी सोच-समझकर चुने जाते हैं. अक्सर गिफ्ट कार्ड, वायर ट्रांसफर या क्रिप्टोकरेंसी के ज़रिए पैसे मंगवाए जाते हैं, क्योंकि इन्हें ट्रैक करना मुश्किल होता है. कई मामलों में पैसा पहले म्यूल अकाउंट्स में जाता है और फिर अलग-अलग रास्तों से बाहर निकाल लिया जाता है. यही वजह है कि ठगी सामने आने के बाद भी रिकवरी बेहद मुश्किल हो जाती है.

ब्रिटिश ऐक्सेंट की भी ट्रेनिंग

जांच एजेंसियों की रिपोर्ट बताती हैं कि भारत में पकड़े गए कई अवैध कॉल सेंटर्स पूरी तरह विदेशों को टारगेट कर रहे थे. छापों के दौरान स्क्रिप्ट, कॉल लॉग, VPN, इंटरनेशनल नंबर और ट्रेनिंग मटीरियल तक बरामद हुआ है. कई मामलों में एजेंटों को बाकायदा यह सिखाया गया था कि विदेशी नागरिकों से कैसे बात करनी है, किस शब्द का इस्तेमाल करना है और कहां भावनात्मक दबाव बनाना है.

यही वजह है कि अब यह सिर्फ साइबर अपराध नहीं रहा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराध का रूप ले चुका है. भारत की एजेंसियां जैसे CBI और ED समय-समय पर ऐसे नेटवर्क पर कार्रवाई कर रही हैं. दूसरी ओर अमेरिका और अन्य देशों की जांच एजेंसियां भी भारतीय एजेंसियों के साथ सूचनाएं साझा कर रही हैं. बड़ी टेक कंपनियां अपने स्तर पर ऐसे फर्जी नेटवर्क को ब्लॉक करने और टेक सपोर्ट स्कैम को रोकने के दावे करती रही हैं.

Advertisement

लेकिन समस्या सिर्फ कार्रवाई से खत्म नहीं हो रही. वजह साफ है, यह मॉडल सस्ता है, तेज़ है और मुनाफा बहुत ज़्यादा देता है. थोड़े से पैसे में पूरा सेटअप खड़ा हो जाता है. डिजिटल टूल्स, वीपीएन और फर्जी पहचान के चलते असली मास्टरमाइंड तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है. ऊपर से डर की मनोविज्ञान इंसान को इतनी जल्दी तोड़ देता है कि वह सवाल पूछने का वक्त ही नहीं ले पाता.

सरकारी आंकड़े भी इशारा करते हैं कि साइबर फ्रॉड के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है. इसी वजह से भारत में 1930 हेल्पलाइन और साइबर क्राइम पोर्टल को मजबूत किया गया है. अधिकारियों का साफ कहना है कि जैसे ही धोखाधड़ी का शक हो, तुरंत रिपोर्ट करना बेहद जरूरी है, क्योंकि देरी होने पर पैसा वापस मिलना लगभग नामुमकिन हो जाता है.

असल सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि कितने कॉल सेंटर पकड़े गए. असली सवाल यह है कि जब तक इस पूरे सिस्टम, यानी लीड जनरेशन, पेमेंट चैनल और डिजिटल प्लेटफॉर्म, पर एक साथ सख्त कार्रवाई नहीं होगी, तब तक यह धंधा नए नाम और नए तरीकों से चलता रहेगा.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Advertisement