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एक युग खत्म... साइना नेहवाल की चुपचाप विदाई ने खेल जगत को सन्न कर दिया

साइना नेहवाल के अंतरराष्ट्रीय करियर का पर्दा एक चुपचाप विदाई के साथ गिर गया...बिना शोर, बिना समारोह, बस एक शांत ऐलान जिसने खेल जगत को सन्न कर दिया. भारतीय बैडमिंटन में स्वर्णिम युग का पर्याय रहीं साइना ने अपने अकेले दम पर उस दौर में रास्ता बनाया जब बैडमिंटन भारत में मुख्यधारा नहीं था.

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साइना नेहवाल ने बैडमिंटन को कहा अलविदा.
साइना नेहवाल ने बैडमिंटन को कहा अलविदा.

भारत की दिग्गज बैडमिंटन खिलाड़ी और देश में इस खेल की सबसे पहचान बनाने वाली शख्सियतों में शामिल साइना नेहवाल ने अपने संन्यास का ऐलान कर दिया. लंबे समय से चली आ रही घुटने की गंभीर समस्या और रिकवरी न हो पाने की स्थिति ने आखिरकार उन्हें ऐसा फैसला लेने पर मजबूर कर दिया. सोशल मीडिया की बजाय एक पॉडकास्ट के दौरान साइना ने कहा कि उनके घुटनों में अत्यधिक डीजेनरेशन हो चुका है, जिस कारण उच्च स्तरीय प्रशिक्षण संभव नहीं रह गया था.

साइना का यह ऐलान एक ऐसे अध्याय का अंत है जिसने भारतीय बैडमिंटन की कथा ही बदल दी. 21 साल लंबे करियर में ओलंपिक पदक, विश्व चैम्पियनशिप का मंच, विश्व नंबर-1 रैंकिंग और 10 सुपर सीरीज खिताब- ये सभी उपलब्धियां इससे पहले भारतीय खिलाड़ियों के लिए दुर्लभ ही थीं.

खामोश रिटायरमेंट, पर गहरा असर

साइना ने रिटायरमेंट की घोषणा ऐसे समय की जब वह पिछले कई महीनों से अंतरराष्ट्रीय सर्किट से बाहर थीं. उनकी आखिरी प्रतिस्पर्धी उपस्थिति सिंगापुर ओपन 2023 में रही थी. इसके बाद बार-बार चोट लौटने और सर्जरी की सलाह ने उनकी वापसी की संभावनाओं को लगभग खत्म कर दिया.

सबसे दिलचस्प यह रहा कि साइना ने इस फैसले को किसी बड़े मंच, प्रेस कॉन्फ्रेंस या सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए नहीं बताया. यह उस तरह की नाटकीय विदाई नहीं थी जो अक्सर दिग्गजों को मिलती है. बल्कि यह एक चुपचाप लिया गया फैसला था, ठीक वैसे ही जैसे साइना ने अपने करियर में ज्यादातर बातें कीं- खेल के जरिए, बयान के जरिए नहीं.

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'...क्योंकि अब शरीर साथ नहीं दे रहा था'

पॉडकास्ट में साइना ने स्वीकार किया कि उन्होंने कई महीने तक यह परखने की कोशिश की कि क्या शरीर रिटर्न करने की स्थिति में है. लेकिन घुटने की गंभीर स्थिति और लगातार दर्द ने इस कोशिश को असंभव बना दिया. उन्होंने कहा, 'मैंने हमेशा चोटों से लड़कर वापसी की है, लेकिन इस बार शरीर ने साफ संकेत दे दिए.'

ओलंपिक पदक और उस दौर की याद

साइना के करियर का सबसे चमकदार पन्ना लंदन ओलंपिक 2012 में आता है, जहां उन्होंने भारत के लिए बैडमिंटन में पहला ओलंपिक पदक (कांस्य) जीता. इस पदक की खनक ने भारतीय बैडमिंटन को नए दौर में प्रवेश करवाया. इसी दौर में पीवी सिंधु, किदांबी श्रीकांत, एचएस प्रणॉय जैसे खिलाड़ियों ने भी वैश्विक मंच पर अपनी पहचान मजबूत की.

खेल विशेषज्ञों की राय में, 'यदि सिंधु ने भारत के बैडमिंटन को ऊंचाई पर बनाए रखा है, तो उस ऊंचाई तक उसे पहुंचाने वाली खिलाड़ी का नाम साइना है.'

चोटों से जंग और मजबूरी की विदाई

रियो 2016 ओलंपिक से ठीक पहले लगी घुटने की चोट ने साइना के करियर को बुरी तरह प्रभावित किय. सुधार के बाद उन्होंने 2017 और 2018 में शानदार वापसी की, जिसमें कॉमनवेल्थ गेम्स गोल्ड और विश्व चैम्पियनशिप ब्रॉन्ज शामिल रहे. लेकिन घुटने ने फिर साथ छोड़ना शुरू कर दिया.

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टीम इंडिया के एक पूर्व साथी खिलाड़ी ने टिप्पणी की, 'साइना किताब बंद नहीं करना चाहती थीं, लेकिन पन्ने पलटने को उनके हाथ में भी ज्यादा विकल्प नहीं बचे थे.'

भारत के लिए एक विरासत पीछे छोड़ गईं साइना

साइना सिर्फ एक खिलाड़ी नहीं, बल्कि एक जनरेटर थीं- भारतीय बैडमिंटन में विश्वास का, आत्मसम्मान का और महत्वाकांक्षा का.

24 अंतरराष्ट्रीय खिताब,वर्ल्ड नंबर-1 रैंकिंग,ओलंपिक और विश्वस्तरीय मेडल और सबसे अहम-  एक पूरी पीढ़ी को रैकेट उठाने की वजह.

आज भारत में हर बड़ी बैडमिंटन अकादमी में छोटे-छोटे बैग लेकर पहुंचने वाली बच्चियों की आंखों में जो चमक दिखती है, उसमें कहीं न कहीं साइना की कहानी ही दर्ज है.

साइना का रिटायरमेंट भारतीय खेल कैलेंडर से एक नाम कम कर गया है, लेकिन भारतीय खेल संस्कृति में एक विरासत जोड़ गया है. अब जबकि उनके रैकेट ने दीवार का सहारा पकड़ लिया है, यह देश उस खिलाड़ी को सलाम कर रहा है, जिसने यह साबित कर दिया कि बेटियां पदक नहीं, परिवर्तन लाती हैं.

 

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