भाला फेंक की दुनिया में कोचिंग रिश्ते आम तौर पर सालों चलते हैं, खासकर जान जेलेजनी जैसे ओलंपिक चक्र के लिए चुने गए कोच के साथ. तकनीक, फॉर्म और मानसिक तैयारी पर लंबी नजर रखने वाला यह रिश्ता अचानक टूटना चौंकाने वाला था. नीरज चोपड़ा ने सिर्फ एक साल में जेलेजनी से अलग होने का फैसला लिया... तो सवाल उठता है: यह तकनीकी, मानसिक या रणनीतिक कदम था?
सबसे पहले पृष्ठभूमि समझिए. ओलंपिक स्वर्ण के बाद पिछले चार वर्षों में नीरज ने भाला फेंक को एक नीरस यूरोपीय खेल से निकालकर भारतीय इमोशन बना दिया. लेकिन टोक्यो विश्व चैम्पियनशिप ने इस कथानक में पहली बड़ी दरार डाली. नीरज वहां 8वें स्थान पर रहे. यह उतना ही विस्मयकारी था, जितना उनके स्वर्ण का रोमांचक सफर. करीब 2,566 दिनों और 26 प्रतियोगिताओं में नीरज कभी टॉप-2 से नीचे नहीं गए थे. उसी इवेंट में 25 साल के सचिन यादव चौथे स्थान पर पहुंचे और सिर्फ 40 सेंटीमीटर से पदक चूके...माहौल बदल रहा था.
इधर JSW Sports से भी नीरज का शांत अलगाव हुआ, वही संस्था जिसने उन्हें जूनियर दिनों से साइकिल, प्रशिक्षण, विदेशों के कैंप, पोषण और एक्सपोजर तक दिया था. इसके ठीक बाद नीरज ने ‘Vel’ नाम से अपना हाई-परफॉर्मेंस फाउंडेशन लॉन्च किया- ऐसा प्लेटफॉर्म जहां वे न सिर्फ खुद पर, बल्कि अगली पीढ़ी पर निवेश करना चाहते हैं. इस कदम में एक बात स्पष्ट थी- नियंत्रण वापस नीरज के हाथ में.
जेलेजनी से अलगाव पर भी नीरज ने बेहद संतुलित बयान दिया. उन्होंने कहा कि जान की सोच, तकनीक, रिदम और मूवमेंट ने उनकी समझ को नए आयाम दिए. जवाब में जेलेजनी ने भी बता दिया कि नीरज ने उनके साथ रहते हुए पहली बार 90 मीटर बाधा पार की और बाहर टोक्यो को छोड़ दें तो वह कभी दूसरे से नीचे नहीं रहे. फिर जेलेजनी ने एक छिपी पर अहम जानकारी दी- टोक्यो से 12 दिन पहले नीरज की बैक में चोट लगी, जिसने रन-अप और ब्लॉक दोनों को प्रभावित किया. यह वही ब्लॉक फेज है जहां रन-अप की पूरी ऊर्जा भाले में बदलती है. अगर यह एक प्रतिशत भी फिसला, तो 2-3 मीटर का अंतर आ जाता है.
... लेकिन चोट पूरी कहानी नहीं है. आंकड़े ज्यादा गहरी बात बताते हैं. ओलंपिक स्वर्ण के बाद चार साल में नीरज ने 33 थ्रो 85 मीटर से ऊपर, और 40 थ्रो 85 मीटर से नीचे फेंके. 2025 में उन्होंने आखिरकार पहली बार 90 मीटर पार किया, पर उसी सीजन में स्थिरता टूट गई - तीन थ्रो 85 से ऊपर, चौदह नीचे, जिनमें नौ 82 मीटर से भी नीचे. ऐसे प्रदर्शन को जेवलिन विशेषज्ञ 'अस्थिर तकनीकी अवस्था' कहते हैं.

स्वयं नीरज ने 2025 के मध्य में स्वीकार किया था कि उनकी पुरानी और नई तकनीक मिक्स हो रही है. ब्लॉक फेज, बाईं ओर गिरने की प्रवृत्ति, और रिलीज एंगल- यह सब उनके बयान में शामिल था. यानी दिमाग और शरीर एक साथ नहीं चल रहे थे- ट्रेनिंग में कुछ, मुकाबलों में कुछ और.
इसके पीछे एक भावनात्मक पहलू भी था. क्लाउस बार्टोनीट्ज ने नीरज से यह कहकर रिश्ता खत्म किया कि अब वे अपना समय परिवार को देना चाहते हैं. लेकिन कुछ ही समय बाद वे टोक्यो में केशॉर्न वॉलकॉट के साथ नजर आए और वॉलकॉट ने गोल्ड भी जीता. नीरज ने इस पर कभी कोई कठोर बात नहीं कही, शब्दों में संजीदगी और सम्मान बनाए रखा. लेकिन उनके ठहराव, आवाज और चेहरे के भाव यह बता रहे थे कि भीतर कुछ खटक रहा है... कुछ ऐसा जो वे शायद खुलकर कह नहीं पाए.
इसी बीच वरिष्ठ पत्रकार संदीप मिश्रा ने एक दिलचस्प बात कही. उनके अनुसार नीरज उस 'एलीट एथलीट जोन' में पहुंच चुके हैं, जहां खिलाड़ी विराट कोहली की तरह चलता है, आत्मविश्वास इतना कि असफलता को अपना दोष मानना मुश्किल होता है. ऐसे में कोच अक्सर पहला झटका झेलता है. यह शिकायत नहीं - यह एलीट स्पोर्ट्स की क्रूर सच्चाई है.
तकनीकी विशेषज्ञ Michael Musselman इसे एक बड़ा जोखिम मानते हैं. उनका कहना है कि जेवलिन की तकनीक पांच साल के चक्र में परिपक्व होती है और जल्दबाजी में की गई हर बदलाव एथलीट की स्थिरता तोड़ सकता है. मगर इसी के साथ वे यह भी मानते हैं कि कभी-कभी बदलाव ही सबसे बड़ा ब्रेकथ्रू साबित होता है- जैसा केशॉर्न वॉलकॉट ने दिखाया.
इधर, भारत में एक नाम तेजी से उभर रहा है- वो है सचिन यादव. विशेषज्ञ मानते हैं कि वह लॉस एंजेलिस 2028 में स्वर्ण के लिए दावेदार हो सकता है और नीरज के लिए यह चुनौती भी है. लेकिन एक बात स्थिर है- नीरज चोपड़ा को हल्के में लेना मूर्खता है. वह सिर्फ भाला नहीं फेंकते, बल्कि शरीर, गुरुत्व, रिदम और गति के रहस्यों को पढ़ते हैं. उन्हें देखना ऐसा है जैसे कोई शिल्पकार अपने हथियारों को खुद तराश रहा हो. कुछ लोग 2026 को उनका संक्रमण मान रहे हैं, लेकिन जो नीरज की आंतरिक यात्रा समझते हैं, उन्हें यह एक नया उत्कर्ष लगता है.
कभी-कभी चैम्पियंस सिस्टम को नहीं छोड़ते - सिस्टम चैम्पियन को छोड़ने लगता है और तभी वे अपने हाथों से अपना रास्ता बनाते हैं.