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क्यों जनवरी से मई-जून में चली जाएगी मकर संक्रांति... साइंटिफिकली समझिए

मकर संक्रांति हमेशा 14 जनवरी को नहीं रहेगी. पृथ्वी के प्रीसेशन के कारण सूर्य का मकर राशि में प्रवेश हर 72 साल में 1 दिन पीछे खिसकता है. 1700+ सालों में 24 दिन का शिफ्ट हो चुका है. हजारों साल बाद यह मई-जून में पड़ सकती है. यह वैज्ञानिक कारण है कि त्योहार की तारीख धीरे-धीरे बदल रही है.

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मकर संक्रांति पिछले 1700 सालों में 24 दिन खिसकी है. भविष्य में भी इसकी तारीख खिसक जाएगी. (File Photo: Getty)
मकर संक्रांति पिछले 1700 सालों में 24 दिन खिसकी है. भविष्य में भी इसकी तारीख खिसक जाएगी. (File Photo: Getty)

मकर संक्रांति भारत का एक प्रमुख और शुभ त्योहार है, जो हर साल 14 या 15 जनवरी को मनाया जाता है. यह दिन सूर्य के मकर राशि में प्रवेश का प्रतीक है, जिससे उत्तरायण की शुरुआत मानी जाती है- यानी सूर्य उत्तर दिशा की ओर बढ़ना शुरू करता है.

लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह तारीख हमेशा जनवरी में ही नहीं रहेगी? हजारों साल बाद यह मई या जून में भी आ सकती है. इसके पीछे पृथ्वी की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है- एक्सियल प्रीसेशन. यानी धरती का धीमे-धीमे डगमगाना. इसकी वजह से ही मकर संक्रांति की तारीख बदल जाएगी. 

मकर संक्रांति क्या है और इसका महत्व

मकर संक्रांति पर सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है. प्राचीन काल में इसे उत्तरायण की शुरुआत माना जाता था, जब दिन लंबे होने लगते हैं और सर्दी कम होती है. यह फसल कटाई का त्योहार भी है- पंजाब में लोहड़ी, तमिलनाडु में पोंगल, असम में माघ बिहू, गुजरात में उत्तरायण जैसे नामों से मनाया जाता है. लोग पतंग उड़ाते हैं, तिल-गुड़ खाते हैं. सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं.

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तीन महत्वपूर्ण घटनाएं जो पहले एक साथ थीं

  • विंटर सॉलस्टिस (शीतकालीन संक्रांति): 21-22 दिसंबर को, जब उत्तरी गोलार्ध में सूर्य सबसे निचले बिंदु पर होता है. फिर उत्तर की ओर बढ़ना शुरू करता है.
  • उत्तरायण: सूर्य का उत्तर दिशा की ओर यात्रा. छह महीने का समय लगता है. 
  • मकर संक्रांति: सूर्य का नक्षत्रों (फिक्स्ड स्टार्स) के आधार पर मकर राशि में प्रवेश.

लगभग 285 ईस्वी में ये तीनों घटनाएं एक साथ होती थीं- सूर्य ठीक विंटर सॉलस्टिस पर मकर में प्रवेश करता था. इसलिए प्राचीन खगोलशास्त्रियों ने इन्हें एक ही उत्सव में जोड़ दिया.

Makar Sankranti Science

प्रीसेशन ऑफ इक्विनॉक्स क्या है? (पृथ्वी का डगमगाना)

पृथ्वी सिर्फ घूमती नहीं, बल्कि उसके ध्रुवीय अक्ष पर wobble होता है, जैसे कोई लट्टू धीरे-धीरे डगमगाता है. इसे प्रीसेशन कहते हैं. यह चक्र लगभग 26,000 साल में पूरा होता है. इससे तारे (जैसे मकर नक्षत्र) हमारे कैलेंडर से धीरे-धीरे सरकते हैं.

  • दर: हर 72 साल में लगभग 1 डिग्री (या 1 दिन) का शिफ्ट. 1700+ सालों में यह 24 डिग्री (24 दिन) का हो गया है.

इसलिए आज सूर्य उत्तरायण की शुरुआत 21 दिसंबर को करता है (विंटर सॉलस्टिस), लेकिन मकर राशि में प्रवेश करने में 24 दिन और लग जाते हैं- इसलिए मकर संक्रांति 14 जनवरी को पड़ती है.

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तीन घटनाएं अब अलग-अलग क्यों?

  • विंटर सॉलस्टिस: हमेशा 21-22 दिसंबर (ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार, जो मौसमी टिल्ट पर आधारित है).
  • उत्तरायण की शुरुआत: दिसंबर में.
  • मकर संक्रांति: सिद्धांत कैलेंडर (नक्षत्रों पर आधारित) के कारण जनवरी में.

भारतीय कैलेंडर सिद्धांत (sidereal) है- नक्षत्रों से मापा जाता है, जबकि पश्चिमी कैलेंडर ट्रॉपिकल है- सूर्य के टिल्ट से.

भविष्य में क्या होगा?

प्रीसेशन की वजह से मकर संक्रांति हर साल थोड़ा आगे खिसक रही है. हजारों साल बाद (लगभग 9000 साल बाद मई-जून में) यह गर्मियों में पड़ सकती है. तब यह दक्षिणायन (सूर्य दक्षिण की ओर) का प्रतीक बन सकती है, लेकिन परंपरा के अनुसार महत्व बरकरार रहेगा.

परंपरा और विज्ञान का मेल

मकर संक्रांति अब सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि संस्कृति, विज्ञान और इतिहास का सुंदर मिश्रण है. हम 14 जनवरी को उत्तरायण मनाते हैं, जबकि असली उत्तरायण दिसंबर में शुरू हो चुका होता है. जलवायु परिवर्तन और ब्रह्मांड की गति हमें याद दिलाती है कि सब कुछ बदलता है, लेकिन उत्सव की भावना स्थिर रहती है.

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