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साइंस न्यूज़

Asteroid in Earth's Orbit: धरती की कक्षा में घूम रहा है एस्टेरॉयड, साथ लगा रहा सूरज का चक्कर

Asteroid sharing Earth's orbit
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वैज्ञानिकों ने एक ऐसा एस्टेरॉयड (Asteroid) खोजा है, जो सूरज का चक्कर लगाने के लिए धरती (Earth) की कक्षा में आता-जाता है. एक किलोमीटर व्यास का यह एस्टेरॉयड लगभग हर 10 महीने में सूरज का चक्कर पूरा कर लेता है. इस एस्टेरॉयड को वैज्ञानिकों ने 2020 XL5 नाम दिया है. इसकी खोज दिसंबर 2020 में हुई थी. (फोटोः विकिपीडिया)

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2020 XL5 एस्टेरॉयड को हवाई स्थित माउई द्वीप के ऊपर मौजूद हालियाकला चोटी पर लगे Pan-STARRS टेलिस्कोप ने खोजा था. लेकिन इसकी कक्षा निर्धारित करने के लिए वैज्ञानिकों ने SOAR (Southern Astrophysical Research) टेलिस्कोप की मदद भी ली है. यह चिली में तैनात है. तस्वीर में जो लाल घेरा दिख रहा है, यह एस्टेरॉयड वहीं पर अंतरिक्ष में सूरज का चक्कर लगाता है. (फोटोः OIRLab-NSF-Aura-J.Da Silva)

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इसके बाद स्पेन के यूनिवर्सिटी ऑफ एलीकांते के प्लैनेटरी साइंटिस्ट टोनी संताना-रोज ने इन दोनों टेलिस्कोप से मिले डेटा के अनुसार यह खोज की. उन्होंने पूरी दुनिया को बताया कि धरती की कक्षा में एक मेहमान है. एस्टेरॉयड 2020 XL5 कई हजार सालों से धरती और सूरज की गुरुत्वाकर्षण शक्ति की वजह से एक लैरेंज प्वाइंट (Lagrange point) पर टिक गया है. यानी यह धरती से जुड़ी कक्षा में सेट हो चुका है. (फोटोः गेटी)

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लैरेंज प्वाइंट वह स्थान होता है, जहां पर धरती और सूरज का गुरुत्वाकर्षण एक दम संतुलित होता है. न कम और न ज्यादा. धरती और सूरज के बीच ऐसे 5 लैरेंज प्वाइंट (Lagrange points) हैं. इन्हें L1, L2, L3, L4 और L5 कहा जाता है. इनमें से L1, L2 और L3 सूरज और धरती की सीधी रेखा में हैं. जिसे सबसे पहले स्विट्जरलैंड के गणितज्ञ  लियोनहार्ड यूलर ने खोजा था. (फोटोः गेटी)

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जेम्स वेब स्पेस टेलिस्कोप (James Webb Space Telescope) को L2 पर सेट किया गया है. जबकि DSCOVR टेलिस्कोप को L1 पर तैनात  किया गया है. यहां पर ये दोनों बिना ज्यादा ईंधन खर्च किए लंबे समय तक अंतरिक्ष की निगरानी कर सकते हैं. L4 और L5 को यूलर के स्टूडेंट जोसेफ लुई लैरेंज (Joseph-Louis Lagrange) ने 1772 में खोजा था. यह एक त्रिकोण बनाता है, जहां पर कोई भी वस्तु गुरुत्वाकर्षण शक्ति के संतुलित स्थान पर टिक जाती है. (फोटोः गेटी)

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एस्टेरॉयड 2020 XL5 को धरती का ट्रोजन साथी (Trojan Companion) है. जैसे - बृहस्पति (Jupiter) के ट्रोजन एस्टेरॉयड. बृहस्पति ग्रह की कक्षा में ऐसे दसियों हजार एस्टेरॉयड हैं, जो उसके साथ सूरज का चक्कर लगाते हैं. आधे बृहस्पति से तेज हैं और आधे उससे धीमे. बृहस्पति ग्रह की कक्षा को शेयर करने वाले पहले एस्टेरॉयड की खोज 1906 में हुई थी. अब एक एस्टेरॉयड ऐसा मिला है, जो धरती की कक्षा को शेयर करता है. (फोटोः गेटी)

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नेपच्यून (Neptune) के 23 ट्रोजन एस्टेरॉयड हैं. यूरेनस (Uranus) का 1 और मंगल ग्रह (Mars) के 9 ट्रोजन एस्टेरॉयड हैं. लेकिन 2020 XL5 एस्टेरॉयड धरती की कक्षा में सूरज का चक्कर लगाने वाला दूसरा ट्रोजन है. िससे पहले साल 2010 में खोजा गया 2010 TK7 भी धरती की कक्षा में सूरज का चक्कर लगाता है. इसका व्यास सिर्फ 300 मीटर है. जबकि, 2020 XL5 का व्यास 1.2 किलोमीटर माना जा रहा है. (फोटोः गेटी)

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वैज्ञानिकों का मानना है कि धरती के और भी ट्रोजन हो सकते हैं लेकिन उनकी अभी तक खोज नहीं हुई है. 2010 TK7 और 2020 XL5 की खोज तभी हो पाई जब इन्हें सूरज उगने से पहले के आसमान में देखा गया. या फिर ठीक सूरज अस्त होने के बाद और रात होने से पहले. इन दोनों की कक्षाएं हमेशा से स्थिर नहीं थी, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि यह धरती के बनने के समय से मौजूद है. (फोटोः गेटी)

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SOAR के डेटा के अनुसार 2020 XL5 एस्टेरॉयड कार्बन से भरा हुआ क्षुद्रग्रह है. जिसे C-type बुलाया जाता है. यानी यह ट्रोजन हमारे सौर मंडल के निर्माण के समय ही बना होगा. अगर इसकी स्टडी के लिए स्पेसक्राफ्ट भेजा जाए तो और जानकारियां भी जमा हो सकती हैं. टोनी संताना-रोज ने कहा कि 2020 XL5 का उपयोग भविष्य में स्पेस मिशन के दौरान एक हॉल्ट के तौर पर किया जा सकता है. इसके साथ ही 2010 TK7 के साथ भी ऐसा हो सकता है. (फोटोः गेटी)

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टोनी संताना-रोज कहते हैं कि अगर भविष्य में धरती के चारों तरफ और ट्रोजन मिलते हैं, जो एकतरफ थोड़े झुके हुए हो तो हम कई स्पेस मिशन में उनका उपयोग कर सकते हैं. सौर मंडल का इतिहास जान सकते हैं. उनपर रुककर अंतरिक्ष में आगे की यात्रा कर सकते हैं. वहां से टेकऑफ और लैंडिंग भी आसान होगी, क्योंकि वहां ग्रैविटी कम होगी. साथ ही माइनिंग करके वहां से खनिज लाए जा सकते हैं. यह रिपोर्ट हाल ही में The Conversation और Space.com में प्रकाशित हुई है. (फोटोः गेटी)