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भारत में ऐसे हुई ताजियादारी की शुरुआत, जानें शिया-सुन्नी में क्यों है मतभेद

ताजियादारी को लेकर शिया और सुन्नी समुदाय के लोगों में मतभेद हैं. सुन्नी समुदाय में ताजियादारी को निषेध बताया गया है. सुन्नी लोग ताजियादारी को इस्लाम का हिस्सा नहीं मानते हैं.

मुसलमान मुहर्रम की नौ और दस तारीख को रोजे रखते हैं और मस्जिदों-घरों में इबादत करते हैं. मुसलमान मुहर्रम की नौ और दस तारीख को रोजे रखते हैं और मस्जिदों-घरों में इबादत करते हैं.

मुहर्रम मुसलमानों का कोई त्योहार नहीं है, बल्कि सिर्फ इस्लामी हिजरी सन्‌ का पहला महीना है. पूरी दुनिया के मुसलमान मुहर्रम की नौ और दस तारीख को रोजा रखते हैं और मस्जिदों-घरों में इबादत करते हैं. मुहर्रम के महीने में इमाम हुसैन की शहादत के गम में लोग मातम मनाते हैं. वहीं बात करें ताजिया की तो यह परंपरा भारत से ही शुरू हुई थी.

भारत में ताजिए की शुरुआत बादशाह तैमूर लंग ने की थी. तैमूर लंग तुर्की योद्धा था और विश्व विजय उसका सपना था. फारस, अफगानिस्तान, मेसोपोटामिया और रूस के कुछ भागों को जीतते हुए तैमूर 1398 में भारत पहुंचा. उसने दिल्ली को अपना ठिकाना बनाया और यहीं उसने खुद को सम्राट घोषित कर दिया. तैमूर लंग शिया संप्रदाय से था.

तैमूर लंग ने मुहर्रम के महीने में इमाम हुसैन की याद में दरगाह जैसा एक ढांचा बनवाया और उसे तरह-तरह के फूलों से सजवाया. इसे ही ताजिया का नाम दिया गया. इसके बाद ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती जब भारत आए तो उन्होंने अजमेर में एक इमामबाड़ा बनवाया और उसमें ताजिया रखने की एक जगह भी बनाई. भारत के बाद पाकिस्तान और बंगालदेश में भी ताजिया बनाने की शुरूआत की. मुहर्रम का चांद निकलने की पहली तारीख से ताजिया रखने का सिलसिला शुरू होता जिसे 10 मुहर्रम को दफ्न कर दिया जाता है.

ताजियादारी को लेकर शिया और सुन्नी समुदाय के लोगों में मतभेद हैं. सुन्नी समुदाय में ताजियादारी को निषेध बताया गया है. सुन्नी लोग ताजियादारी को इस्लाम का हिस्सा नहीं मानते हैं. हालांकि देश के कई राज्यों में सुन्नी समुदाय का एक बड़ा तबका ताजियादारी करता है. साथ ही वो लोग इमाम हुसैन के गम में शरबत बांटने, खाना खिलाने और लोगों की मदद करने को जायज  मानते हैं. सुन्नी समुदाय के अनुसार इस्लाम में सिर्फ मुहर्रम की 9 और 10 तारीख को रोजा रखने का हुक्म है. लेकिन उसका भी ताल्लुक इमाम हुसैन की शहादत से नहीं है.

वहीं शिया समुदाय में ताजियादारी को लेकर कोई मतभेद नहीं है. शिया मुस्लिम इसे कर्बला के शहीदों को श्रद्धांजलि देने का एक तरीका मानते हैं. हुसैन की याद में शिया समुदाय के लोग ताजियादारी करते हैं. मुहर्रम की दसवीं तारीख को ताजियों को सुपुर्द-ए-खाक किया जाता है. शिया समुदाय दो महीने आठ दिन के समय को गम में बिताते हैं. 

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