बालक चंद्रगुप्त मौर्य को अखंड भारत का सम्राट बनाने वाले आचार्य चाणक्य को महान रणनीतिकारों में शामिल किया जाता है. उनकी नीतियों का अनुसरण कर मनुष्य अपने जीवन को सफल बना सकता है और दैनिक जीवन की परेशानियों से भी निजात पा सकता है. चाणक्य नीति के छठे अध्याय के 10वें श्लोक में आचार्य चाणक्य ने उन परिस्थितियों के बारे में बताया है, जिसमें व्यक्ति दूसरों के कारण मुसीबत में पड़ता है और उसे बेवजह परेशानी का सामना करना पड़ता है...
राजा राष्ट्रकृतं पापं राज्ञ: पापं पुरोहित:।
भर्ता च स्त्रीकृतं पापं शिष्यपापं गुरुस्तथा।।
इस श्लोक में चाणक्य चार प्रकार की परिस्थितियों का जिक्र करते हैं. सबसे पहले वो कहते हैं कि किसी भी देश की जनता सामूहिक रूप से कोई गलत काम करती है तो उसका परिणाम राजा या शासन को भोगना पड़ता है. इसलिए राजा का यह कर्तव्य है कि वो जनता पर नजर रखे ताकि वो कुछ भी गलत न कर पाए.
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ऐसे ही अगर सरकार के मंत्री या सलाहकार अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाते हैं और राजा तक सही जानकारी नहीं पहुंचाते हैं तो राजा गलत निर्णय लेता है. ऐसी स्थिति में राजा और उसके पूरे मंत्री परिषद को नुकसान उठाना पड़ता है. जबकि जवाबदेह राजा का सलाहकार, मंत्री या फिर पुरोहित होता है.
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चाणक्य कहते हैं कि पति के गलत कार्यों से पत्नी परेशान होती है और पत्नी के गलत कामों की सजा पति को मिलती है. परेशानियों से बचने के लिए दोनों को एक दूसरे का ख्याल रखना चाहिए.
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आचार्य अंत में कहते हैं कि शिष्य के गलत कर्मों का बुरा फल उसके गुरु को मिलता है. ऐसे में गुरु की ये जिम्मेदारी है कि वो अपने शिष्य को किसी भी गलत रास्ते पर जाने से रोकें. शिष्य के रास्ता भटकने पर उसका जिम्मेदार गुरु ही होता है.
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