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आस्था का महाकेन्द्र बनता जा रहा है सिमरिया का महाकुंभ

महाकुंभ को लेकर देश के कई अखाड़े के महंत यहां महाकुंभ में हिस्सा ले रहे हैं. अब तक लाखों लोग यहां कुम्भ स्नान कर चुके हैं.

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सिमरिया महाकुंभ
सिमरिया महाकुंभ

बिहार के बेगूसराय जिले के सिमरिया धाम में तुलार्क महाकुंभ का आयोजन चल रहा है. 17 अक्टूबर से शुरू हुआ ये महाकुंभ 16 नवंबर तक चलेगा. इसके पहले 2011 में यहां विवादों के बीच अर्धकुंभ का आयोजन किया गया था. सिमरिया धाम में आदिकाल से ही कल्पवास मेले का आयोजन होते आया है जहां पूरे कार्तिक मास में बिहार व देश-विदेश के श्रद्वालु आते हैं और एक महा तक पर्ण कुटिर बना कर यहां गंगा सेवन करते हैं. महाकुंभ को लेकर देश के कई अखाड़े के महंत यहां महाकुंभ में हिस्सा ले रहे हैं. अब तक लाखों लोग यहां कुम्भ स्नान कर चुके हैं.

क्या है मान्यता

कहा जाता है कि देश में बारह कुंभ स्थली हैं. वर्तमान समय में चार जगहों पर कुंभ का आयोजन होता है और बाकी के आठ कुंभ स्थली गौण हैं. कथा कुंभ पर्व को लेकर कहा जाता है कि महर्षि कश्यप के साथ दक्ष प्रजाति की दो कन्या कद्रू व विनीता के साथ शादी हुई. दोनों पत्नियों के बीच ईर्ष्या से ग्रसित बाजी लगती है. इसमें विनीता के दो पुत्र अरुण व गरुड़ हैं. अरुण सूर्य भगवान के रथ सारथी हैं और गरुड़ अपनी मां विनीता के दासत्व मुक्ति हेतु सौतेली मां कद्रू से उपाय पूछते हैं. कद्रू अपने पुत्र नागवृन्द को अमर करने हेतु देवलोक में रखे अमृतघट लाने की मांग करती है. गरुड़ अपनी मां को मुक्ति के लिये अमृतघट लाने देवलोक जाते हैं और अमृतघट लेकर चल देते हैं. यह दृश्य देवराज की पत्नी शचि देख लेती है और अपने पति इन्द्र को गरुड़ से लड़ाई के लिये बाध्य करती है. दोनों में घनघोर युद्व होता है, युद्व के दौरान जहां-जहां अमृत घट रखा जाता है, वह स्थान कुंभस्थली के रूप में विख्यात होता है. यह लड़ाई बारह दिनों तक चलती है जो मानव के बारह वर्ष होता है. इसलिये जिन-जिन जगहों पर अमृत घट रखा गया वहां बारह वर्ष के बाद कुंभ का योग होता है. इसी आधार पर जैसे एक राशि सूर्य- चंन्द्र एवं गुरू का योग हो, वहीं मुहूर्त कुंभ योग होता है.

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सिमरिया में सूर्य, चंद्र, गुरू और योग का तुला संक्रांति का योग बनता है जिससे यहां कार्तिक में महाकुंभ का योग बताया गया है. वस्तुत: समुद्र मंथन की कथा पुराण एवं योग पुराण में प्राप्त नहीं है. रामायण के बालकाण्ड 45 ध्14ध् 39 के अनुसार, जनकपुर जाने के दौरान भगवान राम को गुरू विश्वामित्र ने कहा कि यहीं वह देश है जहां पूर्वकाल में समुद्र मंथन किया गया था. समुद्र मंथन में सहायक सामग्रियों मन्दराचल पर्वत, वासुकीनाग, विषपाई, भगवान शिव, कच्छप चक्रावति, क्षीरोदधि सिन्धु, सगरमाथा एवं ऋृग्वेद मंडल 10, सूक्त 136 मंत्र 5 में वर्णित तथ्यों में ज्ञात होता है कि आदिकुंभ स्थली मिथिला की सीमातट पर अवस्थिति सिमरियाधाम ही है. इसलिये यहां महाकुंभ का आयोजन किया गया है.

महाकुंभ केवल आध्यात्मिक अवचेतना का आधार मात्र ही नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय संरचना का ऐतिहासिक केन्द्र बिन्दु है जो देश के अनेकता में एकता का विलक्षण बंधन कुंभ महापर्व से होता है. सिमरिया सिद्ध आश्रम के स्वामी चिदात्मनजी महाराज ने 2011 में इसे शास्त्रसम्मत कहते हुए अर्ध कुंभ की शुरुआत की थी तब काफी विरोध हुआ जिसके बाद कई दिनों तक चिदात्मनजी महराज सिमरिया में अनशन भी किये थे. यहां होने वाले कल्पवास के बारे में कहा जाता है कि सीमा माता को जब भगवान राम मिथिला से विदा कर ले जा रहे थे. मिथिला के सीमा के अंत में गंगा घाट किनारे एक रात पर्ण कुटिर बना कर गुजारते हैं. जाते समय भगवान राम से सीता ने आर्शीवाद लिया था कि यहां जो एक माह तक पर्ण कुटिर बना कर गंगा सेवन करेगें उन्हें काफी पुण्य और मोक्ष प्राप्त होगा. यह जगह सिमरिया है जहां आदिकाल से ही कल्पवास होते आ रहा है.

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क्या-क्या होगा महाकुंभ में

इस महाकुंभ में तीन शाही स्नान तय हैं जो 17 अक्टूबर, 29 अक्टूबर और 08 नबबंर को होंगे. 29 अक्टूबर के शाही स्नान में अखिल भारती अखाड़ा परिषद् के अध्यक्ष नरेन्द्र गिरी के हिस्सा लेने वाले हैं. इनके अलावा, देश के कई अखाड़ों के महंत हिस्सा ले रहे हैं. सिमरिया धाम में रोजाना श्रद्वालुओं के लिये गंगा आरती का आयोजन हो रहा है. कुंभ सेवा समिति की ओर से रोज शाम को भजन, रामलीला, रासलीला, शास्त्र मंथन का आयोजन किया जा रहा है. शास्त्र मंथन में 12 दिन अलग-अलग विषयों पर मंथन में देश के बड़े-बड़े विद्वानों के द्वारा भाग लेने की बात कही गई है. महाकुंभ को भले ही सरकार व अखाड़ा परिषद् ने मान्यता नहीं दी है लेकिन जिस तरीके से साधु संत व सरकार यहां व्यवस्था कर रही है, आने वाले समय में इसे भी सरकारी व साधुओं की ओर से मान्यता मिलना तय माना जा रहा है.

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