कौन है ओशो? यह सवाल आज भी लाखों लोगों के मन में उठता है कोई ओशो को
संत-सतगुरू के नाम से जानता है तो कोई भगवान के नाम से. कोई इन्हें संबुद्ध रहस्यदर्शी के नाम से संबोधित
करता है तो किसी की नजर में ओशो एक 'सेक्स गुरु' का नाम है. स्वीकार और
इंकार के बीच, प्रेम और घृणा के बीच ओशो खूब उभरे हैं. नेटफ्लिक्स पर आई ओशो के जीवन पर आधारित सीरीज 'वाइल्ड वाइल्ड कंट्री' भी खूब चर्चा में है. शादी और प्रेम के सवालों के ओशो ने बेहद दिलचस्प जवाब दिए हैं.
ओशो ने
कई विषयों पर अपने विचार रखे हैं. उनसे सहमत और असहमत होना अलग बात है लेकिन अलग-अलग तरह के विचारों को पढ़ने से ही हम यह समझ पाते हैं कि हमारे लिए क्या सही है और क्या गलत. चलिए जानते हैं शादी और प्रेम के सवालों पर ओशो ने क्या जवाब दिए हैं.
क्या सोलमेट का कॉन्सेप्ट शादी से ज्यादा अच्छा है?
ओशो कहते हैं, आप
पूछते हैं कि क्या शादी से ज्यादा सोलमेट का कॉन्सेप्ट ज्यादा अच्छा है?
कॉन्सेप्ट मायने नहीं रखता है. मायने यह रखता है कि आपकी अंडस्टैंडिंग कैसी
हैं. आप शादी की जगह शब्द बदलकर सोलमेट कर दें लेकिन आप वही रहेंगे. आप
सोलमेट के तौर पर भी वही सब करेंगे जो शादी के नाम पर होता रहा है. कुछ भी
बदलने वाला नहीं है केवल शब्द बदलेगा. लेबल बदल जाएगा लेकिन लेबलों में
बहुत ज्यादा विश्वास मत करिए.
शादी क्यों असफल हो जाती है?
सबसे पहली बात तो हमने शादी को बहुत ऊंचे
पैमाने पर लाकर रख दिया है. हमने इसे स्थायी चीज बनाने की कोशिश की, कुछ
बेहद पवित्र. बगैर पवित्रता की ABCD जाने बिना, बिना कुछ अद्भुत अनुभव किए
बिना. हमारे इरादे अच्छे थे लेकिन हमारी समझ बहुत छोटी, बिल्कुल ना के
बराबर. इसलिए शादी स्वर्ग बनने के बजाए नर्क बनकर रह गई. पवित्र रहने के
बजाए भ्रष्ट के स्तर से भी नीचे चली गई.
और यही आदमी की बेवकूफी
है, बहुत पुरानी बेवकूफी. जब भी कभी वह मुसीबत में फंसता है वह शब्द बदल
देता है. शादी की जगह सोलमेट शब्द बदलने से आप खुद को नहीं बदल पाएंगे.
समस्या आप है, शब्द नहीं. गुलाब गुलाब ही रहेगा चाहे आप इसे कोई भी नाम दे
दीजिए. तुम कॉन्सेप्ट बदलने के लिए कह रहे हो, खुद को बदलने के लिए नहीं. (द
न्यू डान, टॉक 20)
शादी लड़ाई का अखाड़ा बन गई है-
शादियां इसलिए टूट रही हैं क्योंकि
आप खुद को उस पैमाने के अनुरूप नहीं बदल पाए जिसकी आपने अपेक्षाएं पाल रखी
थी, शादी के रिश्ते को जिस ऊंचे पैमाने पर रखा था. तुम क्रूर थे, ईर्ष्या
से भरे हुए, आकर्षण और लस्ट से भरे हुए, तुम्हें खुद पता ही नहीं था कि
प्यार होता क्या है. प्यार के नाम पर तुमने हर वो काम किया जो प्रेम के
विपरीत है- पजेशन करने की कोशिश, प्रभुत्व जमाने की कोशिश, शक्तिशाली होने
की कोशिश...
शादी एक ऐसा युद्धक्षेत्र बन गया है जिसमें दो लोग
सर्वोच्चता के लिए लड़ रहे हैं. आदमी अपने तरीके से और औरत अपने तरीके से.
लेकिन स्थिति एक ही है. अब तो मनोवैज्ञानिक शादी को दो लोगों की घनिष्ठ
शत्रुता के रूप में देख रहे हैं. दो दुश्मन एक ही छत के नीचे प्यार के
दिखावे के साथ रह रहे हैं और प्यार पाने की उम्मीद कर रहे हैं. कोई भी
प्रेम देने को तैयार नहीं है. किसी के पास है ही नहीं... आप कैसे किसी को
प्रेम देंगे जबकि वह आपके पास आपके अंदर है ही नहीं. ओशो (द न्यू डान टॉक
20)
शादी एक डिलेमा (संशय) है-
शादी के बिना कोई दिक्कत नहीं होगी, कोई
हंसी भी नहीं होगी. होगी तो केवल शांति. धरती पर निर्वाण की प्राप्ति हो
जाएगी. शादी कई चीजों को चलाए रखती है- धर्म, राज्य, राष्ट्र, युद्ध,
साहित्य, मूवीज, विज्ञान और सब कुछ शादी नामक संस्था पर ही निर्भर करता है.
शादी
का सीधा मतलब है कि आप अकेले रहने में सक्षम नहीं हैं, आपको किसी दूसरे की
जरूरत है. बिना किसी दूसरे के आपको अर्थहीन महसूस होने लगता है और किसी और
के साथ होने पर दुख में पड़ जाते हैं. शादी वास्तव में एक डिलेमा ही है.
अगर अकेले हैं तो दुखी है और अगर किसी का साथ है तो भी दुखी है. शादी आपको
सिखाती है कि वास्तव में आपको अंदर से किसी बदलाव की जरूरत है ताकि आप
अकेले भी खुश रह सके और किसी के साथ में भी आनंदित. तब शादी शादी नहीं रह
जाएगी, यह कोई बंधन नहीं रह जाएगा. तब यह एक शेयरिंग हो जाएगी तब यह प्यार
होगा. इसमें आजादी होगी और दूसरे के पनपने के लिए जरूरी आजादी.
शादी जब बंधन बन जाती है तो जीवन को नरक बना देती है-
सामान्य शादी एक
अनजाना बंधन है. आप अकेले नहीं रह सकते हैं इसलिए दूसरों पर निर्भर हो जाते
हैं. दूसरा खुद अकेले रहने में सक्षम नहीं है इसलिए वह आप पर निर्भर हो
जाता है. हम उस शख्स से नफरत करने लगते हैं जिस पर हम निर्भर हो जाते हैं.
कोई भी किसी पर निर्भर नहीं होना चाहता है. हमारी सबसे बड़ी ख्वाहिश होती
है कि हमें आजादी मिले. निर्भरता आजादी के बिल्कुल विपरीत है. यही वजह है
कि कपल्स लगातार आपस में लड़ते रहते हैं. उन्हें यह भी पता नहीं होता है कि
वे लड़ क्यों रहे हैं. इस पर उन्हें ध्यान लगाने की जरूरत पड़ेगी कि वे
क्यों लड़ रहे हैं. हर चीज लड़ने का एक बहाना है. अगर आप उस वजह को बदल
देंगे तो दूसरी वजह बन जाएगी. अगर कोई वजह नहीं बचेगी तो आप वजह बना लेंगे
लेकिन लड़ाइयां तब भी बची रहेंगी. (ओशो ताओ: द गोल्डन गेट, वाल्यूम 2, टॉक
9)
शादी के बिना खत्म हो जाएगा बहुत कुछ-
धर्म इसलिए
अस्तित्व में नहीं है क्योंकि भगवान है बल्कि इसलिए कि शादी है. शादी इतनी
मुसीबतें पैदा कर देती है, इतने दुख पैदा कर देती है कि किसी को भी ध्यान
लगाने की जरूरत पड़ने लगती है. ध्यान शादी का एक सह-उत्पाद है. शादी के
बिना कौन ध्यान करेगा?
बिना शादी के कोई निर्वाण नहीं होता, बुद्ध
ने दुनिया नहीं छोड़ी होती. महावीर पर्वतों की तरफ ना भागे होते. शादी के
बिना कोई बुद्ध और महावीर नहीं होते. सोचिए, इतिहास कितना सीधा सरल होता
बिल्कुल बेस्वाद. मैं शादी के खिलाफ नहीं हू. बिना शादी के 99 प्रतिशत
चुटकुले दुनिया से गायब हो जाते तो मैं शादी के खिलाफ कैसे हो सकता हूं.
मैं हमेशा इसके लिए खड़ा हूं. (ओशो अपने प्रवचनों में कई बार हास्य का प्रयोग करते थे)
शादी करके खुश कैसे रहा जाए?
यह असंभव है. ऐसा कभी हुआ ही
नहीं. प्राकृतिक चीजों के साथ तो ऐसा हो ही नहीं सकता है. शादी प्रकृति के
खिलाफ है. शादी को मानव ने रचा है, जरूरत से जन्म हुआ है इसका. हालांकि अब
यह जरूरत भी खत्म हो गई है. अतीत में यह एक बुराई थी लेकिन अब इसका त्याग
किया जा सकता है. प्रेम और नियम विरोधी प्रत्यय हैं.
शादी प्रेम को
कानूनी बनाने की कोशिश है. यह हमारे डर की वजह से है. यह भविष्य को लेकर
एक सोच है, कल को लेकर एक डर है जो शादी करने पर मजबूर करता है. मनुष्य
हमेशा से अतीत और भविष्य की सोचता रहा है. अतीत और भविष्य के चक्कर में वह
अपने वर्तमान को बर्बाद करता रहा है. जबकि सच्चाई केवल वर्तमान है. अतीत को
मर जाना है और उसे मरने देना चाहिए.
आप मुझसे खुशहाल शादीशुदा
जिंदगी का रहस्य पूछ रहे हैं. यह राज तो कोई नहीं जान सका. जीसस को अगर यह
रहस्य पता होता तो वह बिना शादी किए क्यों रहते. वे भगवान की गहराई जान ले
गए लेकिन शादी की थाह उनको भी ना लग पाई.
मैंने कभी परफेक्ट मैरिज के बारे में नहीं सुना-
वे कहते हैं कि
परफेक्ट शादियां स्वर्ग में बनी होती हैं. वहां से कोई वापस नहीं आता इसलिए
शायद यह सच हो सकता है लेकिन किस तरह की शादियां परफेक्ट होती होंगी?
उसमें कोई तनाव नहीं होता होगा, स्त्री और पुरुष में अपनी कोई
इंडिविजुअलिटी नहीं होती होगी. वो कभी टकराते नहीं होंगे, उनकी कभी लड़ाई
नहीं होती होगी. वे एक-दूसरे के लिए बहुत ही स्वीट होते होंगे लेकिन ज्यादा
मिठाई से डायबिटीज हो जाती है.
शादी एक प्लास्टिक का फूल है-
आप शादी के बारे में शायद पूरी तरह से
जागरूक नहीं दिखते हैं. प्रेम रचनात्मक है और शादी विनाशक. प्रेम किसी पर
निर्भर नहीं होता. एक पल को है दूसरे पल नहीं लेकिन इंसान को स्थायी चीजें
चाहिए, वह परमानेंसी को लेकर ऑब्सेस्ड है. उसे गारंटी और सुरक्षा चाहिए.
वह एक चीज पर टिके रहना चाहता है. इसलिए शादी विश्वसनीय है और इसलिए उसने
शादी बनाई. शादी एक प्लास्टिक का फूल है. प्रेम असली गुलाब का फूल है, सुबह
में खिलता है और शाम तक मुरझा जाता है. कोई नहीं जानता कि गुलाब का फूल कब
गायब हो जाएगा. लेकिन प्लास्टिक का फूल हमेशा रहेगा कुछ भी आए, धूप,
बारिश. प्लास्टिक दुनिया में स्थायी चीज है.
शादी ने वेश्यावृत्ति को जन्म दिया-
वेश्या और पत्नी में क्या अंतर है?
एक अस्थायी व्यवस्था है और दूसरी थोड़ी स्थायी व्यवस्था. शादी स्थायी तरह
की वेश्यावृत्ति, थोड़ी ज्यादा गहरी भावनात्मक वाली. लेकिन दोनों बहुत अलग
नहीं है. इसीलिए शादी और वेश्यावृत्ति दोनों का अस्तित्व साथ बना हुआ है.
अगर
आप इसकी गहराई में जाएंगे तो पाएंगे कि शादी ने वेश्यावृत्ति को पैदा किया
है. वेश्यावृत्ति दुनिया से कभी गायब नहीं होगी जब तक शादी रहेगी. यह शादी
का साया है. यहां तक कि वेश्याएं शादी को बचा रही है. यह एक सुरक्षा
पैमाने की तरह है कि कोई कभी-कभार वेश्या के पास चला जए एक बदलाव के लिए और
अपनी शादी और परमानेंसी को भी बचाए रखे.