सालभर में कुल बारह संक्रांतियां होती हैं. इनमें मकर संक्रांति को सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना गया है. मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरायण के हो जाते हैं. इसलिए इस समय किया गया जप, तप और दान अत्यंत फलदायी माना जाता है. यही कारण है कि मकर संक्रांति के दिन लोग दूर-दूर से पवित्र नदी के घाटों पर पहुंचते हैं और आस्था की डुबकी लेने के बाद दान-धर्म के कार्य करते हैं. मकर संक्रांति पर दान-स्नान के लिए पुण्यकाल को सबसे अच्छा मुहूर्त माना जाता है. आइए जानते हैं कि इस साल मकर संक्रांति पर पुण्य काल का समय क्या रहने वाला है.
मकर संक्रांति पर पुण्य काल का समय
14 जनवरी को दोपहर 03 बजकर 13 मिनट पर सूर्य मकर राशि में प्रवेश करेंगे. इसलिए मकर संक्रांति इसी दिन मनाना श्रेष्ठ होगा. इस दिन पुण्यकाल में स्नान, ध्यान और दान करना विशेष फलदायी होता है. 14 जनवरी को पुण्य काल दोपहर 3 बजकर 13 मिनट से शाम 5 बजकर 45 मिनट तक रहने वाला है. जबकि महापुण्य काल दोपहर 3 बजकर 13 मिनट से शाम 4 बजकर 58 मिनट तक रहेगा.
फिर खुलेगा शादी-विवाह का मुहूर्त
मकर संक्रांति का त्योहार कई मायने में खास माना जाता है. इस दिन सूर्य अपने पुत्र शनि की राशि में प्रवेश करते हैं और शनि-सूर्य का मिलन होता है. इस दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं. इसलिए धनु खरमास भी समाप्त हो जाता है, जिसके बाद मांगलिक और शुभ कार्यों की शुरुआत हो जाती है.
मकर संक्रांति पर क्या करें?
मकर संक्रांति पर प्रातःकाल में स्नान कर सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करें. इसके बाद सूर्य और शनि से जुड़े मंत्रों का जाप करें. यदि संभव हो तो श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ भी करें. फिर पुण्यकाल में अनाज, घी और कंबल का दान करना लाभकारी माना जाता है. इस दिन तिल और गुड़ का दान विशेष शुभ माना जाता है. इसके बाद शाम को नए अन्न से खिचड़ी बनाएं और भगवान को प्रसाद के रूप में अर्पित करें. इसके बाद खुद भी ग्रहण करें.
23 साल बाद दुर्लभ संयोग
इस बार एक और संयोग है जो मकर संक्रांति के त्योहार को खास बना रहा है. दरअसल, मकर संक्रांति के दिन ही षटतिला एकादशी भी पड़ रही है. मकर संक्रांति और षटतिला एकादशी का संयोग करीब 23 साल बाद बना है. इससे पहले यह संयोग साल 2003 में बना था. षटतिला एकादशी में तिल का छह प्रकार से प्रयोग किया जाता है. इसमें तिल मिले जल से स्नान करने की परंपरा है. साथ ही, तिलयुक्त उबटन, तिल का जल ग्रहण करना, तिल का सेवन, तिल का दान और तिल से हवन करने का भी विधान है.