चाणक्य को नीतिशास्त्र का महान ज्ञानी माना जाता है. उनकी नीतियां ही थीं जिसने एक साधारण से बालक चंद्रगुप्त मौर्य को भारत का सम्राट बना डाला और नंद वंश के शासन को खत्म कर दिया. चाणक्य ने अपने नीतिशास्त्र यानी चाणक्य नीति के 8वें अध्याय के एक श्लोक में मौत के समान मनुष्य के आदत के बारे में बताया है. आइए जानते हैं चाणक्य की इस नीति के बारे में..
क्रोधो वैवस्वतो राजा तॄष्णा वैतरणी नदी।
विद्या कामदुधा धेनु: सन्तोषो नन्दनं वनम्॥
गुस्सा तो साक्षात काल है, क्रोध मृत्यु के समान है. तृष्णा वैतरणी नदी के समान है. विद्या कामधेनु की तरह फल देने वाली है और संतोष नंदनवन के समान है. चाणक्य के मुताबिक संतोष सबसे बड़ी व उत्तम चीज है.
क्रोध की तुलना यमराज से की गई है, क्योंकि क्रोधी मनुष्य पाप कर डालता है. क्रोध में गुरुजनों की भी हत्या कर देता है और श्रेष्ठ पुरुषों का भी अपमान कर देता है.
तृष्णा वैतरणी नदी है, जिस प्रकार वैतरणी पार करना कठिन है, उसी प्रकार तृष्णा का छूटना भी कठिन है. लेकिन विद्या कामधेनु के समान है. विद्या से सबकुछ प्राप्त किया जा सकता है.
विद्या से विनम्रता आती है, विनम्रता से योग्यता आती है, योग्यता से धन की प्राप्ति होती है, धन से धर्म होता है और धर्म से सुख मिलता है.
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