चैत्र नवरात्रि के साथ सनातनी परंपरा के हिंदू नववर्ष की शुरुआत होती है. यानी इस दिन विक्रम संवत का नया साल शुरू होता है. विक्रम संवत ग्रहों चाल और नक्षत्रों की स्थिति पर आधारित काल गणना है, इसलिए चैत्र प्रतिपदा यानी वर्ष के पहले दिन ग्रह शांति के भी उपाय किए जाते हैं. चैत्र प्रतिपदा, जिसे चैत्र की पड़वा या प्रथमा भी कहते हैं, इसी दिन से वासंती नवरात्र की शुरुआत होती है. जिसमें शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा की पूजा नौ दिनों तक की जाती है. देवी पूजा अपने आप में ग्रह दोष दूर करने और उन्हें शांत करने का उपाय है.
ऐसे में देवी का पूजन ग्रह शांति, स्थान शांति, भूमि और आकाश की शांति के साथ ही वायु-जल की शांति के लिए की जाती है. ताकि ये सभी तत्व जिनसे मिलकर दुनिया बनी है, वह सभी लोगों का कल्याण करें.यही वजह है कि देवी मां दुर्गा की पूजा में जिन वस्तुओं का प्रयोग होता है वह सभी पॉजिटिविटी को बढ़ाती हैं और निगेटिविटी को खत्म करती हैं. इसलिए देवी पूजा में गंगा जल से भरे कलश, जौ, अक्षत, नारियल का बहुत महत्व है.
कलश का महत्व
नवरात्रि पूजा में कलश स्थापना का बहुत महत्व है. कलश को मंगल कलश कहते हैं और यह मंगलकारी भगवान गणेश का प्रतीक है. कलश में भरा गया जल गंगा जल है और क्षीरसागर का प्रतीक है, जिसमें स्वयं भगवान विष्णु मां लक्ष्मी के साथ रहते हैं. कलश पर रखा नारियल या कोई भी गोल फल महादेव शिव का प्रतीक है. इसी तरह इसके आधार में खुद सृष्टि के निर्माता ब्रह्मा हैं जिनकी उपस्थिति सभी आदित्य देवताओं और इंद्र आदि देवों की उपस्थिति का प्रतीक है. इस तरह यह कलश त्रिदेवों-देवियों और सभी देवताओं के प्रतीक के रूप में स्थापित है.
कैसा होना चाहिए कलश
मिट्टी का कलश सबसे अच्छा होता है. मिट्टी के प्रयोग से बुध ग्रह की दशा ठीक होती है. यह हमारे जीवन में बुद्धि और बोलने की शक्ति देने वाले हैं. सोने या पीतल के कलश के प्रयोग से हमारे गुरु ग्रह शुद्ध होते हैं. जो हमारे ज्ञान को बढ़ाते हैं. चांदी का कलश हो तो वह चंद्र ग्रह को मजबूत करता है, मानसिक शांति और सुख लाता है.
कलश मंदिर की उत्तर पूर्व दिशा में स्थापित करें. कलश में सुपारी व सिक्का डालकर जल से भर दें. कलश पर आम की कोपलों के पत्ते शुभ गिनतियो में रखें, जैसे 9, 11, 21 आदि. अशोक के पत्ते भी रखे जा सकते हैं जो आपके शोक और कष्ट को दूर करने वाला है. इसके ऊपर जटाधारी नारियल कलावा बांधकर कलश के ऊपर रखे. नारियल खुद शिवजी का प्रतीक हैं. नारियल के अलावा कोई भी गोल फल भी रखा जा सकता है.
जौ का महत्व
कलश के आसपास जवारे (जौ) भी बोए जाते है. जवारे शुरुआत का प्रतीक हैं. पौराणिक मान्यतानुसार, सृष्टि के निर्माण के बाद पहली फसल जौ थी, इसलिए इसे ब्रह्मा का प्रतीक मानकर पूजा जाता है. जौ का तेजी से अंकुरित होना घर में सुख, समृद्धि और अच्छी फसल का संकेत माना जाता है. अगर यह घनी और हरी है, तो वर्ष भर खुशहाली रहती है. यह माता के आशीर्वाद के रूप में बोई जाती है और इसे 'जयंती' भी कहते हैं. जयंती देवी दुर्गा का ही एक नाम है. इसलिए जौ एक तरह से माता की शक्ति ही है.
अक्षत का महत्व-
कलश के नीचे चावल की ढेरी (अक्षत) रखना मां लक्ष्मी और अन्नपूर्णा की कृपा को आमंत्रित करना है. यह पूजा को 'अक्षत' यानी अखंड और पूर्ण बनाता है. अक्षत हमारे जीवन, स्वास्थ्य और हमारी समृद्ध को अक्षत यानी जिसे कोई नुकसान न पहुंचा सके, बनाता है. घर के भंडार भरे रहें. तिजोरियां कभी खाली न हों और इससे आगे बढ़कर किसी के जीवन में मानसिक खोखलापन न आए, अक्षत इसके लिए पूजा में बहुत जरूरी माना जाता है.