सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह से जुड़े विवाद पर दरगाह दीवान सैयद जैनुअल आबेदीन अली चिश्ती ने प्रेस वार्ता में अपनी बात रखी. दरगाह में मंदिर होने के दावे को उन्होंने ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर खारिज किया. साथ ही उन्होंने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया.
दरगाह दीवान ने कहा कि यह दावा ऐतिहासिक और साक्ष्य आधारित नहीं है. उन्होंने हरविलास शारदा की किताब का उल्लेख करते हुए कहा कि उसमें भी केवल 'ऐसा कहा जाता है' लिखा गया है, लेकिन कोई प्रमाण नहीं दिया गया. उन्होंने यह भी बताया कि ख्वाजा साहब की मजार 150 वर्षों तक कच्ची रही, ऐसे में उसके नीचे मंदिर होने की बात संभव नहीं है.
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उन्होंने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत उचित कदम उठाया है. दीवान ने इस विवाद को राजनीतिक और आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों द्वारा उकसाया हुआ बताया.
सरकार से हस्तक्षेप की अपील
दरगाह दीवान ने कहा कि यह मामला सरकार का है, क्योंकि तीनों प्रतिवादी सरकारी निकाय हैं. ख्वाजा साहब के वंशजों को इसमें पक्षकार नहीं बनाया गया है. उन्होंने केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की अपील करते हुए कहा कि इस तरह के दावों से देश में विभाजन की भावना को बढ़ावा मिल रहा है.
ख्वाजा साहब का संदेश अमन और भाईचारे का
दरगाह दीवान ने कहा कि ख्वाजा साहब का संदेश हमेशा अमन और भाईचारे का रहा है. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से इस मामले में स्वत: संज्ञान लेने और देश में शांति बनाए रखने की अपील की. उनके मुताबिक, दरगाह न केवल भारत बल्कि पूरे विश्व के लोगों के दिलों पर राज करती है और यहां से शांति और प्रगति का संदेश दिया जाता है. उन्होंने विवादित बयानों को नफरत फैलाने का जरिया बताते हुए कहा कि सभी को मिलकर देश को तरक्की की ओर ले जाने की दिशा में काम करना चाहिए.