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World Mental Health day: एकांत से गहरी प्रसन्नता की ओर

जब आप पाते हैं कि जीवन व्यर्थ है, तो आप में एक खालीपन का भाव पैदा होता है. यह या तो आपको अवसाद की ओर ले जाता है, या वही शून्य आपके लिए उच्च चेतना की ओर बढ़ने का माध्यम बन सकता है.

जानें क्या बोले श्री श्री रविशंकर जानें क्या बोले श्री श्री रविशंकर

एक बार एक सज्जन एक डॉक्टर के पास गए और शिकायत की कि उनके साथ कुछ बेहद गलत हो रहा है. उसके पूरे शरीर में तकलीफ हो रही थी और वह बहुत दुखी था. परंतु उसके सारे टेस्ट सामान्य आए. डॉक्टर ने उन्हें कहा, "आपको तो कोई दिक्कत नहीं है, आप सर्कस देखने जाइए और जोकर का खेल देखिए, उसे देखकर आप प्रसन्न होंगे. उस भद्र पुरुष ने कहा, "डॉक्टर साहब मैं सर्कस का वही जोकर हूं."

जब आप पाते हैं कि जीवन व्यर्थ है, तो आप में एक खालीपन का भाव पैदा होता है. यह या तो आपको अवसाद की ओर ले जाता है, या वही शून्य आपके लिए उच्च चेतना की ओर बढ़ने का माध्यम बन सकता है.

आज बहुत से लोग एकाकीपन महसूस करते हैं. यूनाइटेड किंगडम ने अकेलेपन के लिए एक मंत्रालय की स्थापना की क्योंकि यहां आबादी का एक महत्वपूर्ण प्रतिशत अकेला और उदास महसूस करता है. दुनियाभर की कई एजेंसियों ने अब वैश्विक स्तर पर महामारी के रूप में उभर रही अकेलेपन पर ध्यान देना शुरू कर दिया है.

एकांत का अर्थ
  
हमारे वेद पश्चिम की तुलना में एकाकीपन की बहुत अलग व्याख्या करते हैं. संस्कृत में Solitude शब्द के लिए अर्थ है एकांत, यानी कि 'एकाकीपन का अंत'. अकेलापन किसी और की संगति में रहने से ही खत्म नहीं हो सकता है. कोई भी दो अधूरे व्यक्ति पूर्णता का भाव नहीं ला सकते हैं. पूर्णता को प्राप्त करने का एकमात्र तरीका आपके अंदर है. यह तभी समाप्त हो सकता है जब आप अपने वास्तविक प्रकृति को खोज लेंगे. इस स्वयं का स्वभाव संतोष, आनंद उत्थान और उल्लास का है. जब तक आप अपने आत्मनिरीक्षण के माध्यम से यह महसूस नहीं करते कि आप कौन हैं, आपकी चेतना की प्रकृति क्या है, प्रसन्नता आपके लिए एक दूर की कौड़ी बनी हुई रहेगी. सच्चे अर्थों में स्वयं से सवाल; जो कि चिंतन और मनन की ओर ले जाती है, खुशी की इस खोज में नितांत आवश्यक है.

अनासक्ति से सच्चा आनंद

छठी सदी के भारतीय दार्शनिक और विचारक आदि शंकराचार्य कहते हैं कि क्षणभंगुर चीजों के प्रति अनासक्ति और आंतरिक चेतना के साथ संबंध ही सच्ची प्रसन्नता देता है. वास्तव में तो वह यह भी पूछते हैं, "वह कौन सा आनंद है जिसे वैराग्य नहीं लाता?"

आप एक बिल्कुल अलग आयाम से जुड़कर दुखों को अलविदा कह सकते हैं, जो वस्तुत: मैं कहूंगा कि एक सघन मौन है, आनंद की अनुभूति है, जहां अनंतकाल की झलक, ये आपके अंदर विद्यमान है? बस आपको इसकी खोज करनी है. लेकिन कैसे?

जीवन की नियमावली

किसी भी मशीन का तब तक ठीक तरह से प्रयोग नहीं किया जा सकता जब तक उसकी निर्देश पुस्तिका को पढ़ कर उस मशीन को चलाने का सही तरीका ना पता चल जाए.  आध्यात्मिक-ज्ञान जीवन के लिए निर्देश पुस्तिका जैसी है. जिस प्रकार कार चलाने के लिए हमें स्टेयरिंग घुमाना, पहिया, क्लच और ब्रेक आदि का प्रयोग करना आना चाहिए, ,उसी प्रकार अपने मन को दृढ़ व स्थिर रखने के लिए आवश्यक है कि हम अपनी जीवन शक्ति ऊर्जा के मूल सिद्धांतों को जानें. प्राणायाम का संपूर्ण विज्ञान ही यही है. जब हमारे प्राण या जीवन शक्ति में उतार-चढ़ाव होता रहता है, तो हमारा मन भी भावनाओं के असीम प्रवाह के माध्यम से ऊपर और नीचे जाता रहता है.

मन को मन के स्तर पर ही नियंत्रित नहीं किया जा सकता. यही वजह है कि परामर्श या मनोचिकित्सा शुरू में एक व्यक्ति को मदद करता प्रतीत होता है, लेकिन लंबे समय में यह पूर्ण उपचार प्रदान करने में सक्षम नहीं होता है. केवल सकारात्मक विचार थोप देने से ही इसका इलाज संभव नहीं हो पाता, बल्कि मामला और पेचीदा होकर बिगड़ जाता है. अवसाद दूर करने की दवाइयां केवल आरंभ में असर करती हैं, बाद में उस बीमारी से दूर करने की जगह पर धीरे-धीरे व्यक्ति को उन दवाइयों का ही आदी बना देती हैं. 

यहीं पर श्वसन की प्रक्रिया का रहस्य ज्ञान वास्तव में जीवन को बदलने में सहायता करता है. श्वसन प्रक्रिया जैसे कि सुदर्शन क्रिया का ज्ञान जीवन शक्ति को संतुलित करता है और इसके फलस्वरूप मन भी स्थिर होता जाता है. ध्यान के अभ्यास से प्रकट हुआ आंतरिक आयाम हमें गहराई से समृद्ध करता है और इसका प्रभाव धीरे-धीरे जीवन के सभी पहलुओं पर फैलता जाता है. जैसे जैसे शरीर में प्राण तत्व की बढ़ोतरी होती है, व्यक्ति परिवर्तन का अनुभव करते हैं, यह बदलाव का एक साक्षात अनुभव होता है, इसके लिए किसी जबरदस्ती के मानसिक व्यायाम की आवश्यकता नहीं पड़ती. व्यक्ति अधिक प्रसन्न और सृजनशील हो जाता है, उसका अपने मन और भावनाओं सुदृढ़ नियंत्रण हो जाता है. 

अवसाद से बाहर निकलने का एक और अच्छा माध्यम है सेवा की भावना को विकसित करना. ये सोचना कि 'मैं समाज के लिए क्या कर सकता हूं.' बड़े उद्देश्य की तरफ अपना ध्यान लेकर जाने से जीवन की संपूर्ण दिशा ही बदल जाती है, और इससे व्यक्ति 'मेरे बारे में कौन सोचता है' के चक्र से बाहर निकल जाता है. विश्व के जिन समाजों में सेवा के मूल्य सिखाए जाते हैं, त्याग, बलिदान और सामाजिक सहयोग की भावनाएं जहां बस जाती है, उस समाज में तनाव और आत्महत्या के विचार कभी नहीं पनपते. सिख समुदाय इसका बेजोड़ उदाहरण है.

जीवन प्रसन्नता और पीड़ा का मिश्रण है. पीड़ा अपरिहार्य है लेकिन कोई पीड़ित होगा ये वैकल्पिक है. जीवन के प्रति व्यापक दृष्टिकोण रखने से आपको दुख भरे समय में आगे बढ़ने की शक्ति मिलती है. आप ये एहसास करिए कि इस सृष्टि को आपकी अत्यंत आवश्यकता है. अपनी अनंत संभावनाओं के साथ यह जीवन एक उपहार है, यह प्रसन्नता का फव्वारा है जो केवल हमें ही नहीं भिगोता, बल्कि हमारे साथ और बहुत सारे लोगों को भी यह आनंद से भिगो देता है. 

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