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तो जोशीमठ की वास्तविक कहानी क्या है?

1972-73 में पूरा शिमला शहर 7 फीट धंस गया था. कई इमारतों में बड़ी दरारें आ गईं और स्कूल बंद कर दिए गए. धंसाव का दोष सीवरेज के पानी की निकासी ठीक से न होने को दिया गया. ठीक ऐसे ही अब जोशीमठ में जमीन दरकने की घटना के बाद एनटीपीसी को निंदा की जा रही है. लेकिन जोशीमठ की वास्तविक कहानी क्या है?

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शांतनु गुहा रे
शांतनु गुहा रे

जोशीमठ उत्तर भारत के ऊपरी इलाके में देवताओं का मिलनद्वार माना जाता है, जिसके धंसने का दोष पहाड़ों को काटकर बनाई गई सुरंगों को दिया जा रहा है. 

बिना किसी वैज्ञानिक कारण के राज्य स्वामित्व की कंपनी एनटीपीसी की निंदा की जा रही है. यह कुछ इसी तरह है जैसे बहुत से लोग आकस्मिक बाढ़ के लिए पहाड़ों के देवता को दोष देते हैं. 

तो हम इसे लेकर गंभीर क्यों नहीं हैं? गौरतलब है कि करणप्रयाग में धंसाव देखा जा रहा है, जो जोशीमठ से बहुत दूर है और इस बात का प्रमाण है कि राजस्व स्वामित्व के एनटीपीसी प्रोजेक्ट को जोशीमठ धंसाव से कोई लेना-देना नहीं है.  

मैं अपनी बात को आगे बढ़ाता हूं. 1972-73 में पूरा शिमला शहर 7 फीट धंस गया. कई इमारतों में बड़ी दरारें आ गईं और स्कूल बंद कर दिए गए. उस समय वहां किसी तरह की सुरंग का काम नहीं हुआ था और धंसाव का दोष सीवरेज के पानी की निकासी ठीक से न होने को दिया गया.  

जोशीमठ का धंसाव भी कुछ ऐसी ही घटना है, 1976 में गढ़वाल के कमिश्नर एमसी मिश्रा की रिपोर्ट में इसका पूर्वानुमान दिया गया था. किंतु इसके बारे में समझ न होने की वजह से इसका दोष सुरंग को दिया जा रहा है. स्थानीय लोग आक्रोश में हैं और उन्होंने जोशीमठ में एनटीपीसी के खिलाफ मोर्चा खोला है, वे पोस्टर लगाकर एनटीपीसी को शहर से बाहर करने की मांग कर रहे हैं.  

अब इसरो की रिपोर्ट के मुताबिक 12 दिनों के अंदर शहर 5.4 सेंटीमीटर धंस गया है. इसरो द्वारा जारी सैटेलाइटचित्रों से साफ है कि जोशीमठ 12 दिन के अंदर 5.4 सेंटीमीटर धंस गया है, यह घटना 2 जनवरी 2023 को शुरू हुई. साफ है कि जोशीमठ भू-धंसाव की बड़ी चुनौती से जूझ रहा है.  

इसरो के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर द्वारा किए गए अध्ययन के मुताबिक अप्रैल से नवम्बर 2022 के दौरान भू-धंसाव की गति धीमी थी, इस दौरान जोशीमठ 8.9 सेंटीमीटर धंस गया. लेकिन 27 दिसम्बर 2022 से 8 जनवरी 2023 के बीच इस गति में तेजी आई और मात्र 12 दिन में शहर की ज़मीन 5.4 सेंटीमीटर धंस गई. नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर की रिपोर्ट और चित्रों के अनुसार पूरा शहर धंस रहा है. इस रिपोर्ट के बाद यूरोप की स्पेस एजेंसी के सैटेलाइटसेंटीनल-1 एसएआर की रिपोर्ट भी पेश की गई हैं. उसमें भी यही बात दिखी. 

रिपोर्ट के अनुसार पूरा शहर, जिसमें सेना का हैलीपैड और नरसिम्हा मंदिर भी शामिल है, संवेदनशील जोन में है.

तपोवन विष्णुगद हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट (4X130MW) नदी पर संचालित एक परियोजना है, जिसका निर्माण उत्तराखण्ड के चमोली ज़िले में जोशीमठ की नदी धौलीगंगा पर किया जा रहा है. परियोजना की विस्तृत रिपोर्ट शुरुआत में यूपी सिंचाई विभाग द्वारा 1992 में तैयार की गई. यह परियोजना 2004 में उत्तराखंड सरकार द्वारा एनटीपीसी लिमिटेड को सौंपी गई. वापकोस लिमिटेड ने डीपीआर में संशोधन किया और सभी अनुमोदन मिल गए.  

परियोजना के तहत तपोवन (जोशीमठ का 15 किलोमीटर अपस्ट्रीम) में कॉन्क्रीट बैराज के निर्माण की परिकल्पना दी गई, जो हेलांग गांव के नज़दीक भूमिगत पावरहाउस (जोशीमठ का 13 किलोमीटर डाउनस्ट्रीम) की ओर पानी मोड़ देगा. यह सुरंग जोशीमठ नगर की बाहरी सीमा से 1.1 किलोमीटर की दूरी पर है और ज़मीन के स्तर से तकरीबन 1.1 किलोमीटर वर्टिकल दूरी पर है (ऑली के नीचे). दिसम्बर 09 में सुरंग में पानी घुस गया और स्थानीय लोगों ने इसका आरोप परियोजना के सेलांग क्षेत्र में पानी का स्तर सूखने पर लगाया. लेकिन नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी के अनुसार सुरंग में पानी घुसने और बाहरी पानी के बीच कोई संबंध नहीं है. 

अब मैं फिर से जोशीमठ की मौजूदा समस्या पर आता हूं, यह बहुत पुरानी समस्या है और एनटीपीसी एवं तपोवन प्रोजेक्ट से भी बहुत पहले शुरू हो चुकी थी. परियोजना का काम नवम्बर 2006 में शुरू हुआ. क्षेत्र में इससे पहले 1976 में ज़मीन धंसने की वजह से एक समिति बनाई गई थी, जिसका नेतृत्व मिश्रा कर रहे थे. इस समिति ने निष्कर्ष दिया था कि प्राचीन भूस्खलन पर जोशीमठ धंस रहा है. इसमें दरारों के लिए कई संभव कारण बताए गए जैसे मिट्टी का अपरदन और रिसाव आदि.   

इतना ही नहीं, अगस्त 2022 में गठित समिति के विशेषज्ञों ने भी निष्कर्ष निकाला कि भूमिगत सैचुरेशन की वजह से ज़मीन में दरारें आ रही हैं, जिसका एक कारण यह भी है कि सीवरेज का निपटान ठीक से नहीं हो पा रहा. बारिश और घरों से आने वाला बेकार पानी ज़मीन में रिस रहा है, जिसके चलते मिट्टी में दबाव की स्थिति बढ़ रही है और मिट्टी की अपरूपण क्षमता कम हो रही है. पिछले सालों के दौरान इस नाजु़क पहाड़ी का ढलान इसकी मिट्टी धारण क्षमता से अधिक बढ़ गया है. इसके अलावा घरों का निर्माण घटिया गुणवत्ता के साथ किया गया है.  

अब एनटीपीसी ने जोशीमठ में धंसाव के मामले की जांच की. इस संदर्भ में हैड रेस टनल का मूल्यांकन किया गया, जिसमें पाया गया कि एनटीपीसी एचआरटी का जोशीमठ धंसाव से कोई लेना देना नहीं है, क्योंकि एनटीपीसी की सुरंग जोशीमठ की बाहरी सीमा से 1.1 किलोमीटर दूरी पर है. यह सुरंग तकरीबन 1 किलोमीटर का क्षेत्रफल कवर करती है.  

12 किलोमीटर की सुरंग में से 8.2 किलोमीटर का निर्माण कार्य टनल बोरिंग मशीनों के द्वारा किया गया है, जिसकी वजह से आस-पास की चट्टानों या संतुलन में कोई बाधा नहीं आई. जिसका निर्माण जोशीमठ में धंसाव क्षेत्र से 11 किलोमीटर दूर नियन्त्रित ब्लास्टिंग द्वारा किया जा रहा है.  

परियोजना संचालन में नहीं है और वर्तमान में सुरंग कार्यरत नहीं है. अक्टूबर 2020 के बाद से सुरंग में खुदाई का कोई काम नहीं हुआ है. केवल कभी-कभी डीबीएम द्वारा एचआरटी के निर्माण के लिए नियन्त्रित ब्लास्ट किए गए हैं. 

तो इसका दोष एनटीपीसी को क्यों दिया जा रहा है? विद्युत जगत की दिग्गज पर आरोप लगाने के बजाए, ज़रूरत इस बात की है कि जोशीमठ को धंसने से बचाने के लिए व्यावहारिक एवं समग्र समाधान खोजे जाएं.

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