scorecardresearch
 

मिट्टी को गंदगी न समझें

हमारी संस्कृति में एक गहरी समझ है, कि हम धरती माता से ही पैदा हुए हैं. असली मां वह मिट्टी है, जिसे हम अपने शरीर के रूप में धारण करते हैं. पर आज दुनिया में मिट्टी को मैल या गंदगी कहा जाने लगा है. 

सद्गुरु के विचार सद्गुरु के विचार

तमिल में, हम मिट्टी को ताई मन्न कहते हैं, जिसका अर्थ है धरती माता. ऐसा इसलिए है क्योंकि इस संस्कृति में एक गहरी समझ है, कि हम धरती माता से ही पैदा हुए हैं. हमारी जैविक मां केवल एक प्रतिनिधि हैं; असली मां वह मिट्टी है, जिसे हम अपने शरीर के रूप में धारण करते हैं. पर आज दुनिया में मिट्टी को मैल या गंदगी कहा जाने लगा है. 

आप मिट्टी को गंदगी कह सकते हैं, लेकिन यह मिट्टी बहुत बुद्धिमान है. क्या कभी ऐसा हुआ कि आपने एक सेब का बीज बोया हो, और गलती से एक नाशपाती निकल आया हो? नहीं, ऐसी गलती कभी नहीं हुई. वही मिट्टी सेब बन रही है; वही मिट्टी नाशपाती भी बन रही है. इसलिए जीवन की बुद्धि को कम न समझें. यह न सोचें कि आपके दिमाग में जो पागलपन चल रहा है, वही बुद्धि है; नहीं, वह बुद्धि का सबसे निचला स्तर है. अस्तित्व में हर चीज़ सुपर बुद्धिमान है. एक बार फिर से, हमारे पैरों के नीचे मौजूद अविश्वसनीय बुद्धिमानी पर ध्यान देने का समय आ गया है. 

आजकल अगर बच्चे मिट्टी में हाथ डालते हैं, तो आधुनिक माताएं कहती हैं, "तुम्हारे हाथ गंदे हो गए." नहीं, वे गंदे नहीं हुए हैं. उनके हाथ, उनके जीवन के स्रोत को छू रहे हैं. जब आप अपने जीवन के स्रोत को गंदगी समझने की गलती करते हैं, तो आपके द्वारा अपनी जड़ों को फैलाने, अपने पूर्ण स्वरूप और क्षमता तक विकसित होने, और फलने-फूलने की संभावना बहुत कम हो जाती है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि आपका शरीर इस धरती से अलग नहीं है. यह धरती का एक टुकड़ा ही है, जो पॉप-अप की तरह बाहर आ गया है. 

कमजोर मिट्टी, कमजोर शरीर

आज पर्याप्त वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि आपके शरीर की मजबूती सिर्फ मांसपेशियों की ताकत से तय नहीं होती. हमारे जीवन की बुनियादी ताकत, न केवल उस मिट्टी से तय होती है, जिससे पैदा हुआ भोजन हम खाते हैं, बल्कि उस मिट्टी से भी तय होती है, जिस पर हम चलते हैं. अगर मिट्टी कमजोर हो जाती है, तो आपके सिस्टम के वंश से जुड़े तत्व कमजोर हो जाएंगे. वास्तव में, भारत की खाद्य फसलों के साथ अभी एक बड़ी समस्या यह है - कि उनके पोषक तत्व नाटकीय रूप से कम हो गए हैं. कहा जाता है कि पिछले 25 सालों में उनमें करीब 39 फीसदी की कमी आई है. 

मिट्टी तभी स्वस्थ होगी, जब हम पेड़ों से मिले पत्ते और जानवरों के कचरे को मिट्टी में वापस डाल पाएंगे. लेकिन हमारे सारे पेड़ कट चुके हैं. उसके अलावा, हम अपने जानवरों का मारकर उनका दूसरे देशों में निर्यात कर रहे हैं. जानवरों और पेड़ों के बिना मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने का कोई तरीका नहीं है. हमने पिछले कुछ दशकों में इस पर बिलकुल ध्यान नहीं दिया है, और देश का 25% हिस्सा रेगिस्तान बनने की ओर अग्रसर है, जहां खेती बिलकुल नहीं की जा सकेगी. हमें अगले 25 वर्षों के समय में कम से कम 35 से 40% भूभाग पर वृक्ष लगाने होंगे. 1.4 बिलियन की आबादी होने की वजह से, हमें यह सोचना चाहिए कि इस देश की तब क्या स्थिति होगी, जब हम लोगों को आवश्यक पानी और भोजन उपलब्ध नहीं करा पाएंगे.

इस भूमि की भावी पीढ़ियों के लिए मिट्टी और पानी की रक्षा करना सबसे महत्वपूर्ण है. अक्सर यह माना जाता है, कि शहरों और उद्योगों से आने वाले प्रदूषण को कम करना ही, पर्यावरण को अच्छा बनाए रखना है. लेकिन धरती पर सबसे बड़ी आपदा वाकई खेती से जुड़ी है. मिट्टी का कटाव ही असली मुद्दा है. कुछ दशकों में बाकी सभी चीज़ों का समाधान किया जा सकता है. पर पूरी धरती में हो रहा मिट्टी का कटाव कोई ऐसी चीज नहीं है, जिसे आप आसानी से पलट सकते हैं; इसमें 50 से 100 साल लगेंगे. 

धरती खतरे में नहीं है, हम खतरे में हैं

अगर मिट्टी का कटाव नहीं रुकता है, तो धरती मनुष्यों के रहने लायक नहीं होगी. हालांकि यह समस्या कई तरह से खुद को प्रस्तुत कर रही है, पर जैव विविधता का तबाह होना, सबसे महत्वपूर्ण पहलू है – कई प्रजातियां लुप्त हो रही हैं. पौधों, जानवरों और कीटों की लगभग दस लाख प्रजातियां विलुप्त होने की सूची में हैं, जिसका अर्थ है कि अगले 10 से 15 वर्षों के भीतर, वे शायद नहीं बचेंगी. हमें समझना चाहिए, जैसे-जैसे भूमि की जैव विविधता लुप्त होती जाएगी, मनुष्य को अत्यधिक कष्ट होगा, और इस धरती पर हमारे जीवन को बनाए रखना कठिन हो जाएगा. इस सबका आधार मिट्टी है. यदि मिट्टी जैविक तत्वों से समृद्ध है, तो ग्रह की जीवन को मदद करने की क्षमता बरकरार रहती है.

अगर हम सुधारों की बात करें, तो अगले 25 वर्ष बहुत महत्वपूर्ण हैं. अगर हम मिट्टी, नदियां, जंगल, कृषि, मानव स्वास्थ्य का ध्यान रखेंगे, तो यह हर चीज़ में मददगार होगा. अगर हम अगले 10 से 15 वर्षों में सभी सही काम कर पाते हैं, तो मेरा मानना है कि 30 से 40 वर्षों में बड़े बदलाव सकारात्मक तरीके से होंगे. 

कावेरी पुकारे इस दिशा में एक अग्रणी प्रयास है. कावेरी पुकारे का प्राथमिक फोकस, किसानों को उनकी भूमि के एक हिस्से को पेड़ों पर आधारित खेती या कृषि-वानिकी में बदलने के लिए प्रोत्साहित करके उनकी कमाई में सुधार करना है, और साथ ही, दक्षिण भारत में कावेरी नदी बेसिन की हरियाली को 33% के राष्ट्रीय आंकड़े तक पहुंचाना है. ज़्यादा पेड़ों के होने से कवरेज क्षेत्र में पर्यावरण से जुड़े लाभों की एक श्रृंखला की शुरुआत होगी - जैसे मिट्टी ज़्यादा पानी सोखेगी, पानी की गुणवत्ता सुधरेगी, मिट्टी उपजाऊ होगी और जैव विविधता में वृद्धि होगी, और मिट्टी का कटाव भी कम होगा. 

इसकी सफलता का संबंध सिर्फ कावेरी नदी और दक्षिण भारत से नहीं है; हम कावेरी पुकारे को एक बड़े पैमाने पर प्रदर्शित करने योग्य मॉडल बनाना चाहते हैं, जिसे अन्य नदियों के लिए भी दोहराया जा सकता है. यह पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण है, खासकर उष्णकटिबंधीय (ट्रॉपिकल) दुनिया के लिए. हम चाहते हैं कि दुनिया की वे सभी ताकतें जो पारिस्थितिक उत्थान के बारे में चिंतित हैं - सरकारें, एजेंसियां और गैर सरकारी संगठन - इसे सफल बनाने के लिए एकजुट हों. प्रत्येक राष्ट्र को यह रुख अपनाना चाहिए - कि मिट्टी की गुणवत्ता को ख़राब होने से रोकना, पर्यावरण को सुधारने का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है. 

सबसे बढ़कर, दुनिया के हर नागरिक को इसे एक सच्चाई बनाने के लिए साथ मिलकर काम करना होगा, क्योंकि इसी से यह तय होगा कि हम एक जिम्मेदार पीढ़ी हैं या नहीं. आइए इसे पलट दें. यह बिलकुल संभव है. 

(भारत के पचास सबसे प्रभावशाली लोगों में शामिल सद्गुरु, एक योगी, दिव्यदर्शी और बेस्ट सेलर लेखक हैं. सद्गुरु को असाधारण और विशिष्ट सेवा के लिए वर्ष 2017 में भारत सरकार द्वारा भारत के सर्वोच्च वार्षिक नागरिक पुरस्कार 'पद्म विभूषण' से सम्मानित किया जा चुका है.) 

 

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें