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PM मोदी से पवार की मुलाकात से उपजे सवाल और उनके जवाब में छिपे सियासी संदेश

साल 2019 के नवंबर में 20 तारीख को शरद पवार संसद में प्रधानमंत्री मोदी अचानक मिले थे. तब भी अटकलों का बाजार काफी गर्म था. लेकिन उसके बाद जो महाराष्ट्र में हुआ, उसने राजनीतिक जगत में सबको हैरान कर दिया.

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PM मोदी से पवार की मुलाकात के मायने. PM मोदी से पवार की मुलाकात के मायने.

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुखिया शरद पवार जब भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलते हैं तो राजनीतिक गॉसिप का बाजार गर्म हो जाता है. कभी-कभी लगता है कि शरद पवार खुद अपने बारे में ‘ये कुछ भी कर सकते हैं’ वाली चर्चा खुशी से सुनते होंगे. राजनीति में अपना अगला कदम क्या होगा? ये किसी को पता न चलने देना बहुत बड़ी खूबी होती है और पवार ने इस खूबी का सालों-साल बखूबी इस्तेमाल किया है. 

2019 में 20 नवंबर को जब पवार संसद में प्रधानमंत्री से इसी तरह अचानक मिले थे, तब भी अटकलों का बाजार गर्म था. लेकिन उसके बाद जो महाराष्ट्र में हुआ उसने सबको चौंका दिया था. तब जब शरद पवार को वहां खड़े पत्रकारों ने पूछा था कि जब महाराष्ट्र में शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी की बातचीत चल रही है, तब वो अचानक प्रधानमंत्री से मिलने क्यों आए हैं? पवार ने तब ये कहकर सभी को चकमा दिया था कि पुणे में होने वाले किसी कार्यक्रम का आमंत्रण देने वह प्रधानमंत्री से मिले थे.

इंटरव्यू में किया था ये खुलासा

हालांकि, ये बाद में पता चला कि दरअसल उसी वक्त एनीसीपी और बीजेपी की भी बातचीत चल रही थी, और पवार ने खुद महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी सरकार बनने के बाद एक इंटरव्यू में बताया कि उस दिन संसद में जब वो प्रधानमंत्री से मिले थे, तब दरअसल वो उन्हें ये बताने गए थे कि एनसीपी-बीजेपी सरकार नहीं बन सकती.

एनसीपी चीफ पवार ने 20 नवंबर 2019 को अधिकृत तौर पर जो कहा, वो असलियत में कुछ और था. वहीं, उनकी बातों में अंतर कुछ महीनों बाद पता चल पाया. यही बात उनकी राजनीति का हिस्सा रही है, जिससे कइयों को पवार की राजनीति उलझन में डाल देती है.

संजय राउत के लिए PM मोदी से मुलाकात

लेकिन इस बार बात कुछ और थी. इस बार पवार ने दो टूक कह दिया कि वो प्रधानमंत्री से मिले ये बताने के लिए कि शिवसेना नेता और सांसद संजय राउत पर चल रही प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी की कार्रवाई गलत है और सरकार के खिलाफ बोलने के लिए अगर ये कार्रवाई हो रही है तो वो ठीक नहीं है. इस बार पवार की प्रधानमंत्री से मुलाकात महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी के नेताओं पर हो रही ईडी की कार्रवाई की पृष्ठभूमि में हो रही थी. संजय राउत से जुड़ी हुई संपत्ति ईडी द्वारा जब्त होने के बाद हो रही थी. पवार की इस भेंट से तीन सवाल निकलते हैं.
 
1)    प्रधानमंत्री ने इससे पहले ईडी की कार्रवाई का खुलेआम समर्थन किया था. ऐसे में पवार क्या सोचकर प्रधानमंत्री से मिले? क्या इससे संजय राउत पर हो रही कार्रवाई पर असर पड़ेगा? 
2)    इससे पहले एनीसीपी के ही अनिल देशमुख और नवाब मलिक पर कार्रवाई हुई, तब पवार प्रधानमंत्री से क्यों नहीं मिले? 

3) आमतौर पर ऐसी बातचीत का खुलासा न करने वाले पवार इस बार खुलकर क्यों बोले?

मतलब पवार ऐसा नहीं चाहते थे

पहले प्रश्न पर लग रहा है कि पवार शिवसेना को ये संदेश देना चाहते हैं कि वो उनके साथ हैं और जिस तरह का आरोप लग रहा है कि ईडी की कार्रवाई की वजह से महा विकास अघाड़ी सरकार में दरार पड़ेगी या कोई पार्टी डरकर बीजेपी से हाथ मिला लेगी, तो पवार ऐसा नहीं करना चाहते.

PM मोदी के करीबी

अपनी पार्टी के नेताओं पर हुई कार्रवाई के वक्त पवार ने ऐतराज तो जताया लेकिन जानबूझ कर प्रधानमंत्री से मिलने या उनसे हुई इस संबंध में बातचीत को सार्वजनिक नहीं किया. उन्हें शिवसेना या कांग्रेस को ये मैसेज नहीं देना था कि प्रधानमंत्री से अच्छे रिश्ते होने का उपयोग उन्होंने अपने पार्टी के नेताओं को बचाने के लिए किया. क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी विपक्ष के कुछ गिने-चुने नेताओं के ही करीबी माने जाते हैं, जिनमें पवार का नाम सबसे ऊपर है.

यूपीए के समय से दोस्ती

दरअसल, यूपीए सरकार के वक्त जब कांग्रेस के मंत्री गुजरात की मोदी सरकार से दूरी बनाए हुए थे, तब पावर ने कृषि मंत्री के रूप में ऐसा नहीं किया. इसी वजह से माना जाता है कि मोदी और पवार में तमाम राजनीतिक मतभेदों के बावजूद नजदीकी रही है. खुद मोदी ने इस बात का कई बार इजहार किया है. लेकिन इसी वजह से और 2019 के उस राजनीतिक एपिसोड की वजह से पवार और एनसीपी पर हमेशा संदेह जताया जाता है कि इस व्यक्तिगत नजदीकी का नतीजा राजनीतिक दोस्ती ना हो जाए. खुद पवार ने कई बार इस तरह के संकेत दिए लेकिन ऐसा कभी हुआ नहीं.

बीजेपी के साथ आने का कोई मन नहीं

इसलिए इस बार जो बातचीत प्रधानमंत्री के साथ हुई वो उन्होंने खुलकर सबके सामने रखी. उन्हें ये दिखाना था कि प्रधानमंत्री से उनके रिश्ते कितने भी अच्छे हों, उनकी राजनीति बीजेपी के साथ काम करने की नहीं रहेगी. बीजेपी को भी पवार को ये बात जतानी थी कि तमाम कार्रवाइयों के बावजूद अब उनका बीजेपी के साथ आने का कोई मन नहीं है. अपनी राजनीति के आखिरी पड़ाव पर वो उन सभी आशंकाओं को सच साबित नहीं करना चाहते, जिनको लेकर उनकी राजनीतिक छवि पर कई बार सवाल उठाए गए.

शिवसेना-कांग्रेस का विश्वास जीतने की कोशिश 

बहरहाल, पवार और मोदी की मुलाकात के बावजूद ईडी की कार्रवाई कम या खत्म होने की संभावना कम ही नजर आ रही है. लेकिन इस बार या कहें पहली बार इस बातचीत को ना छिपाकर शरद पवार ने महाविकास अघाड़ी की सहयोगी शिवसेना और कांग्रेस का विश्वास जीतने की कोशिश की है.   

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